बड़ती जनसंख्या के दबाव से वन्यजीवों का पर्यावास भी विखंडित हो रहा है।
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खेतों और बस्तियों से दिन दहाड़े उठा रहे हैं मानवभक्षी
उत्तराखण्ड में गत 13 अप्रैल को एक 73 वर्षीय किसान बीरेंद्र सिंह अपनी पत्नी के साथ पौड़ी जिले के कालागढ़ टाइगर रिजर्व की सीमा से सटे रिखणीखाल ब्लॉक के डल्ला गांव में अपनी गेहूं की फसल काट रहे थे और इसी दौरान एक बाघ ने उन पर हमला कर दिया था। मदद के लिए पत्नी के चिल्लाने के बावजूद जानवर किसान को खींच ले गया।
बाद में ग्रामीणों को कुछ दूर पर व्यक्ति का क्षत-विक्षत शव मिला। उसके तुरन्त बाद दूसरी घटना में, जो दल्ला से बमुश्किल 35 किमी दूर हुई, 75 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक रणवीर सिंह का आधा खाया हुआ शव 15 अप्रैल को नैनीडांडा ब्लॉक के सिमली गांव में उनके घर के पास मिला था। वन विभाग के मुताबिक, बीते दस सालों में गुलदार ने पौड़ी जिले में करीब 45 लोगों की जान ली है। गुलदारों के सर्वाधिक हमले पौड़ी रेंज में ही हुए हैं क्योंकि सर्वाधिक मानव पलायन इसी जिले में हुआ है। प्रदेश में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।
आखिर क्यों आ रही इस संघर्ष की नौबत
धरती को हर तरह के जीवों और पादपों के लिए माकूल बनाए रखने के लिए जितने जरूरी इन्सान हैं उतने ही जरूरी बाघ से लेकर कीड़े-मकोड़े और सांप जैसे जीव भी अत्यन्त जरूरी हैं। प्रकृति की जीवों और पादपों की ऋंखला में थोड़ी से गड़बड़ी या असन्तुलन आ जाए तो मानव वन्यजीव संघर्ष की ऐसी स्थिति स्वाभाविक ही है।
दरअसल, बड़ती जनसंख्या के दबाव से वन्यजीवों का पर्यावास भी विखंडित हो रहा है। यह मानव दबाव वन्यजीवों को भोजन, पानी या आश्रय की तलाश में मानव बस्तियों में जाने के लिए मजबूर करता है। जलवायु परिवर्तन से भी जानवरों के व्यवहार और प्रवास के पैटर्न में बदलाव अनुभव किया जा रहा है, जो जानवरों को नए और अप्रत्याशित तरीकों से इंसानों के संपर्क में ला रहा है। उदाहरण के लिए, उत्तरी ध्रुव में ध्रुवीय भालू तेजी से मनुष्यों के संपर्क में आ रहा है, क्योंकि उनका प्राकृतिक आवास पिघल रहा है।
बढ़ती मानव आबादी के भरण पोषण के लिए कृषि विस्तार के प्रयोजन से जैसे-जैसे मानव कृषि के लिए भूमि को साफ करता है, वे अक्सर जानवरों के प्राकृतिक आवासों को नष्ट कर देते हैं। यह जानवरों को आसपास के कृषि क्षेत्रों में भोजन और आश्रय लेने के लिए मजबूर करता है, जिससे किसानों और पशुपालकों के साथ संघर्ष हो जाता है। जैसे-जैसे शहरों और कस्बों का विस्तार होता है, वे अक्सर प्राकृतिक आवासों का अतिक्रमण करते हैं और वन्यजीवों को विस्थापित करते हैं। इससे जानवरों को शहरी क्षेत्रों में भोजन और आश्रय की तलाश करनी पड़ती है, जिससे मनुष्यों के साथ संघर्ष हो जाता है।
कुल मिलाकर, मानव-पशु संघर्ष जटिल मुद्दे हैं जिसका समाधान करने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। नीति निर्माताओं, संरक्षणवादियों और स्थानीय समुदायों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे मनुष्यों और जानवरों दोनों की जरूरतों को संतुलित करने वाले स्थाई समाधान खोजने के लिए मिलकर काम करें।
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