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भारत में बढ़ रहे हैं बाघ और गुलदार, खुशियां मनाएं या गम?

सार

महाराष्ट्र में ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व, पेंच टाइगर रिजर्व और संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान जैसे कई संरक्षित क्षेत्रों के साथ महाराष्ट्र में बाघों और तेंदुओं दोनों की काफी आबादी है। इसीलिए वह राज्य मानव-वन्यजीव संघर्षों के लिहाज से सर्वाधिक संवेदनशील राज्यों की सूची में शामिल किया गया है।
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महाराष्ट्र वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार पिछले 10 वर्षों में महाराष्ट्र में मानव वन्यजीव संघर्ष में हर साल औसतन 35 लोगों की मौत हुई है। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में बाघों और गुलदारों की गणना की एक झलक देशवासियों को दिखाई थी जिसमें बाघों की संख्या में 42 प्रतिशत वृद्धि के साथ 2014 के 2226 के मुकाबले 3167 हो जाने और गुलदारों की संख्या 60 प्रतिशत वृद्धि के साथ 2014 के 7,910 के मुकाबले 2018 में 12,852 हो जाने का खुलासा हुआ है। नवीनतम आकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में 3,421 तेंदुए, उत्तराखण्ड में लगभग 2500, कर्नाटक में 1,783 तेंदुए और महाराष्ट्र में 1,690 तेंदुए दूसरे राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा पाए गए हैं।

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यद्यपि बाघों की गणना के आंकड़े पहले ही तत्कालीन वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर 28 जुलाई 2020 को जारी कर चुके थे। फिर भी बड़ी बिल्लियों की बिरादरी का बढ़ना स्वस्थ और सम्पन्न वन्यजीव की निशानी मानी जाती है। इसीलिए सम्भवतः यह खुशखबरी प्रधानमंत्री के मुंह से दुबारा दिलवाई गई। वास्तव में यह सूचना वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों के लिए तो बड़ी खुशखबरी अवश्य हो सकती है। लेकिन महाराष्ट्र, उत्तराखण्ड और कर्नाटक जैसे मानव वन्यजीव संघर्ष वाले एक दर्जन के करीब राज्यों के निवासियों के लिए यह खबर खुशी के बजाय चिन्ता पैदा करने वाली अवश्य है। 

महाराष्ट्र में मानव वन्यजीव संघर्ष सर्वाधिक 

महाराष्ट्र में ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व, पेंच टाइगर रिजर्व और संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान जैसे कई संरक्षित क्षेत्रों के साथ महाराष्ट्र में बाघों और तेंदुओं दोनों की काफी आबादी है। इसीलिए वह राज्य मानव-वन्यजीव संघर्षों के लिहाज से सर्वाधिक संवेदनशील राज्यों की सूची में शामिल किया गया है। आकड़े बताते हैं कि जिन राज्यों में बाघ और तेंदुए अधिक पाए गए हैं वहीं इन जीवों द्वारा सर्वाधिक लोग मारे गए हैं। मसलन महाराष्ट्र में सबसे अधिक बाघ और तेंदुऐ पाए गए तो वहीं सर्वाधिक मानव मौतें भी हुई हैं।

महाराष्ट्र वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार पिछले 10 वर्षों में महाराष्ट्र में मानव वन्यजीव संघर्ष में हर साल औसतन 35 लोगों की मौत हुई है। महाराष्ट्र में इस संघर्ष में हर साल औसतन 350 लोग घायल होते हैं। वहां मानव वन्यजीव संघर्ष की वजह से सबसे ज्यादा 98 लोगों की मौत साल 2022-2023 (जनवरी 2023 तक) में हुई, इसके बाद 2021-2022 में 86 और 2020-2021 में 82 लोगों की मौत हुई।

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डक्कन हेराल्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2022 से लेकर 13 फरवरी 2023 तक कर्नाटक में 5 लोग बाघों और चार गुलदारों द्वारा मारे गए। उत्तराखण्ड में तो हालत और भी खराब है। यहां जनवरी से लेकर 3 मई 2023 तक की केवल 4 माह की अवधि में ही 5 लोग बाघों द्वारा और 3 गुलदारों द्वारा मारे गए हैं। 

उत्तराखण्ड में गुलदारों और बाघों ने 572 लोग मारे

भारत में बाघों और गुलदारों के हमलों से 10 राज्य प्रभावित घोषित किए गए हैं जिनमें उत्तराखण्ड राज्य महाराष्ट्र के बाद दूसरे स्थान पर तथा कर्नाटक तीसरे स्थान पर आता है। इसी प्रकार उत्तराखण्ड में भी बाघों और गुलदारों की भारी संख्या के चलते इस राज्य को दूसरे नम्बर पर रखा गया है। उत्तराखण्ड में औसतन 45 लोग प्रतिवर्ष वन्य जीवों द्वारा मारे जाते हैं।

वन विभाग के आंकड़ों के अनसार सन् 2000 में राज्य गठन से लेकर 3 मई 2023 तक उत्तराखण्ड में 503 लोग गुलदारों द्वारा मारे जा चुके हैं। इसी तरह इसी अवधि में 69 लोग बाघों द्वारा मारे जा चुके हैं और बड़ी संख्या में लोग घायल हो चुके हैं। जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, राजाजी नेशनल पार्क और नंदा देवी नेशनल पार्क सहित एक बड़े वन क्षेत्र और कई संरक्षित क्षेत्रों के साथ राज्य में जानवरों और मनुष्यों के बीच संघर्ष के मामले अक्सर देखे जाते हैं।

उत्तराखण्ड वन विभाग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार इस साल जनवरी से लेकर 3 मई तक गुलदारों ने 3 लोगों को निवाला बनाया और 14 को घायल किया। इसी प्रकार बाघों ने 5 लोगों को अपना निवाला बनाया। गुलदार सोशल मीडिया पर दिन दहाड़े बस्तियों में लोगों और मवेशियों का पीछा करते नजर आ सकते हैं।

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बड़ती जनसंख्या के दबाव से वन्यजीवों का पर्यावास भी विखंडित हो रहा है। - फोटो : अमर उजाला

खेतों और बस्तियों से दिन दहाड़े उठा रहे हैं मानवभक्षी

उत्तराखण्ड में गत 13 अप्रैल को एक 73 वर्षीय किसान बीरेंद्र सिंह अपनी पत्नी के साथ पौड़ी जिले के कालागढ़ टाइगर रिजर्व की सीमा से सटे रिखणीखाल ब्लॉक के डल्ला गांव में अपनी गेहूं की फसल काट रहे थे और इसी दौरान एक बाघ ने उन पर हमला कर दिया था। मदद के लिए पत्नी के चिल्लाने के बावजूद जानवर किसान को खींच ले गया।

बाद में ग्रामीणों को कुछ दूर पर व्यक्ति का क्षत-विक्षत शव मिला। उसके तुरन्त बाद दूसरी घटना में, जो दल्ला से बमुश्किल 35 किमी दूर हुई, 75 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक रणवीर सिंह का आधा खाया हुआ शव 15 अप्रैल को नैनीडांडा ब्लॉक के सिमली गांव में उनके घर के पास मिला था। वन विभाग के मुताबिक, बीते दस सालों में गुलदार ने पौड़ी जिले में करीब 45 लोगों की जान ली है। गुलदारों के सर्वाधिक हमले पौड़ी रेंज में ही हुए हैं क्योंकि सर्वाधिक मानव पलायन इसी जिले में हुआ है। प्रदेश में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। 

आखिर क्यों आ रही इस संघर्ष की नौबत 

धरती को हर तरह के जीवों और पादपों के लिए माकूल बनाए रखने के लिए जितने जरूरी इन्सान हैं उतने ही जरूरी बाघ से लेकर कीड़े-मकोड़े और सांप जैसे जीव भी अत्यन्त जरूरी हैं। प्रकृति की जीवों और पादपों की ऋंखला में थोड़ी से गड़बड़ी या असन्तुलन आ जाए तो मानव वन्यजीव संघर्ष की ऐसी स्थिति स्वाभाविक ही है।

दरअसल, बड़ती जनसंख्या के दबाव से वन्यजीवों का पर्यावास भी विखंडित हो रहा है। यह मानव दबाव वन्यजीवों को भोजन, पानी या आश्रय की तलाश में मानव बस्तियों में जाने के लिए मजबूर करता है। जलवायु परिवर्तन से भी जानवरों के व्यवहार और प्रवास के पैटर्न में बदलाव अनुभव किया जा रहा है, जो जानवरों को नए और अप्रत्याशित तरीकों से इंसानों के संपर्क में ला रहा है। उदाहरण के लिए, उत्तरी ध्रुव में ध्रुवीय भालू तेजी से मनुष्यों के संपर्क में आ रहा है, क्योंकि उनका प्राकृतिक आवास पिघल रहा है।

बढ़ती मानव आबादी के भरण पोषण के लिए कृषि विस्तार के प्रयोजन से जैसे-जैसे मानव कृषि के लिए भूमि को साफ करता है, वे अक्सर जानवरों के प्राकृतिक आवासों को नष्ट कर देते हैं। यह जानवरों को आसपास के कृषि क्षेत्रों में भोजन और आश्रय लेने के लिए मजबूर करता है, जिससे किसानों और पशुपालकों के साथ संघर्ष हो जाता है। जैसे-जैसे शहरों और कस्बों का विस्तार होता है, वे अक्सर प्राकृतिक आवासों का अतिक्रमण करते हैं और वन्यजीवों को विस्थापित करते हैं। इससे जानवरों को शहरी क्षेत्रों में भोजन और आश्रय की तलाश करनी पड़ती है, जिससे मनुष्यों के साथ संघर्ष हो जाता है। 

कुल मिलाकर, मानव-पशु संघर्ष जटिल मुद्दे हैं जिसका समाधान करने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। नीति निर्माताओं, संरक्षणवादियों और स्थानीय समुदायों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे मनुष्यों और जानवरों दोनों की जरूरतों को संतुलित करने वाले स्थाई समाधान खोजने के लिए मिलकर काम करें। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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