फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

शाहीन बाग आंदोलन: सहमतियों- असहमतियों के बीच सड़कों पर तैयार होता समय का दस्तावेज

विज्ञापन
रत्नेश मिश्र - फोटो : शाहीन-बाग प्रदर्शन
विज्ञापन

संवादहीनता हमेशा संदेह को जन्म देती है और 'संदेह' किसी भी बात को 'बतंगड़' में बदल देता है। इसी बात-बतंगड़ को तोड़-मरोड़कर अगर जनता के बड़े भाग तक प्रसारित कर दिया जाए तो उसे बरगलाया भी जा सकता है, उसकी मानसिकता को बदला जा सकता है। लेकिन सत्य हमेशा निरंकुशता से लड़ता रहा है और देर-सबेर ही सही सामने आता ही रहा है। अक्सर होता यह भी है कि जिन आंखों से आप इस खूबसूरत दुनिया को देखते हैं, उन्हीं आंखों से सच दिखाई नहीं देता। 'सत्य' को देखने के लिए आंखों को आपकी सोच-समझ, मेहनत, तर्क-वितर्क इत्यादि के मदद की भी ज़रूरत होती है। बहरहाल कई तरह की सहमतियों-असहमतियों, गलत-सही प्रचारों के बीच शाहीन बाग आंदोलन अपनी रचनात्मक अभिव्यक्तियों के सहारे चल रहा है। 

विज्ञापन

महीने भर से अधिक समय से चल रहे शाहीन बाग़ आंदोलन को इतिहास किस नज़रिए से देखेगा इसका अंदाजा तो नहीं लगाया जा सकता लेकिन यह प्रतिरोध अपने समय और समाज का दस्तावेज कालिंदीकुंज की सड़कों पर लिख रहा है। गणतंत्र दिवस के दिन शाहीन बाग में चल रहे आंदोलन को नज़दीक से देखने का अवसर मिला। शाम 5 बजे 'जसोला विहार' मेट्रो स्टेशन के गेट नं-2 से उतर कर हम धरना स्थल की ओर पैदल निकले । 

धरना स्थल तक पहुंचने के लिए मेट्रो से 300 मीटर सीधे जाने के बाद बाएं मुड़ना होता है और यहीं पर पुलिस ने पहला बैरिकेट लगा रखा है। तक़रीबन 8-10 पुलिस वाले वहां मौज़ूद थे, वहां पर कोई पूछताछ या रोक-टोक किसी ने नहीं की,  हमें बाएं मुड़ना था लेकिन सड़क के दाहिनी ओर काॅर्नर पर एक चाय-पान की दुकान दिखी और हमने तय किया कि पहले एक-एक चाय पी लेते हैं फिर आगे बढ़ते हैं। 

शाहीन-बाग - फोटो : रत्नेश मिश्र
चाय पीते-पीते दुकानदार से गप-शप शुरू हुई तो पता चला वे मोहम्मद हसन हैं, जो शाहीन बाग के ही रहने वाले हैं। उनके साथ में उनका बेटा अशफ़ाक भी था जिसकी उम्र 20-22 साल रही होगी, और वो थोड़ी देर पहले ही दुकान पर पिता का हाथ बंटाने आया था। 

अशफ़ाक पत्राचार से स्नातक की पढ़ाई करता है और वेबसाइट डेवलपर का कोर्स भी किया है, वह दुकान बंद होते ही धरने पर चला जाता है। पढ़ाई-आंदोलन और दुकान के अपने प्रबंधन के बारे में कहता है-'भइया, अगर देश के लिए कुछ बेहतर हो रहा है तो थोड़ी तकलीफ सही जा सकती है'। 

हम उस लड़के से वेबसाइट डिजाइन के बारे में कुछ बातें करने लगे तो हसन मिंया ने चाय की केतली गैस से उतारकर एक तरफ़ रखते हुए अपनी बेटी का विजिटिंग काॅर्ड देते हुए कहा कि- अगर इस तरह का कोई काम हो तो कृपया मेरी बेटी को ही फोन करें। घर के इस तरह के निर्णय वही लेती है और वह इस समय धरना स्थल पर है। वहां पर इतनी ही बातें हुईं। फिर हम आगे बढ़ गए,थोड़ी दूर और जाने पर एक और बैरिकेट लगा हुआ है जिस पर कुछ पुलिस वाले भी थे।

धरना स्थल से पहले बायीं तरफ़ एक गेट है जिसे पार कर गली से होकर धरना स्थल तक पहुंचा जा सकता है। गेट पर 4 पुरुष और 2 महिला वालेंटियर मौज़ूद थे। गेट के अंदर प्रवेश कर मोहल्ले की गली से होते हुए धरना स्थल तक जाने वाले हर आदमी-औरत की तलाशी वहां ली जाती है।

फिर आप गली पार कर धरना स्थल के मुख्य स्टेज के पीछे पहुंचते हैं। स्टेज के सामने सड़क के दोनों ओर एक बाउंड्री बनाई गई है, जिसे रस्सी से घेरा गया है, बाउंड्री के अंदर दोनों ओर महिलाएं बैठी हैं और बीच में एक पतला सा रास्ता है, वालेंटियर के आने जाने वालों के लिए। स्टेज के पीछे का हिस्सा मीडिया वालों के लिए है, कोई भी मीडिया कर्मी वहां किसी से बातचीत कर सकता है। 

प्रबंधन की दृष्टि से विरोध-प्रदर्शन अत्यधिक लोकतांत्रिक और गरिमामय है जो प्रतिरोध की संस्कृति को कलात्मकता, नई ऊंचाई और नई जन तांत्रिकता दे रहा है। कविता, संगीत, चित्रकला, नाटक, संस्थापन कला और अन्य तरह की रचनात्मकता इस आंदोलन दूसरे अन्य आंदोलनों से अलग करती है।  दूर-दूर से लोग यहां विरोध प्रदर्शन देखने आ रहे हैं, बहुतों के हाथ में तिरंगे थे।

आंदोलन कई स्तरों पर सक्रिय है,धरना स्थल पर महिलाएं बैठी हुई हैं और सामने स्टेज पर लगातार कोई न कोई वक्ता आता रहता है और अपने विचार रखता है। भाषण के अलावा- 'तेरी मिट्टी में मिल जावां' जैसे देशभक्ति गीत गाए जा रहे थे, शेरो-शायरी भी हो रही थी। स्टेज पर बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा लगी हुई है, जिसके बगल में बीते दिन गणतंत्र दिवस-ज़िंदाबाद का एक बैनर भी लगाया गया था। 

शाहीन-बाग - फोटो : रत्नेश मिश्र
धरना स्थल से थोड़ा और आगे बढ़िए तो सड़क के दाहिनी तरफ फ़ातिमा शेख और साबित्रीबाई फूले पुस्तकालय बनाया गया है। सड़क, जो कालिंदीकुंज की तरफ जाती है उस पर आगे बढ़ते जाइए तो जगह-जगह पर लोग सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ नारे लगाते मिलेंगे। धरना स्थल से सटी हुई सड़क पर नारे लगाता हुआ जो पहला समूह दिखा, उसमें एक 10-11 का बच्चा एक आदमी के कंधे पर बैठा था और वही नारे लगवा रहा था। बच्चा बहुत पहले से नारे लगवा रहा था और बहुत देर तक लगाता रहा। एक तो बच्चा था दूसरे बहुत देर से नारे लगवाने के कारण उसका गला बैठ गया था, थोड़ा कान लगाने पर नारा समझ में आया। 'पानी कम है, हमसे लो', हम क्या चाहते-आज़ादी ! सीएए से आज़ादी ! एनआरसी से आज़ादी !  

ऐसे ही कई स्लोगन्स और शेरो-शायरी ओवर ब्रिज की दीवारों पर भी टंगे थे। ऊपर ब्रिज की दीवार पर एक जगह सफेद पेंट से लिखा है- 'Faridabad(फरीदाबाद)'। Faridabad में शुरुआत के Far की जगह ZIN कर देने से Faridabad हो गया Zindabad(ज़िंदाबाद)और उसके ऊपर लिखा गया है-INQUILAB (इंकलाब)। तो हो गया-INQUILAB (इंकलाब)-Zindabad(ज़िंदाबाद)। इसके बगल में ही एक बैनर लगा हुआ है जिस पर लिखा हुआ है- 'जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं/यहां हैं...यहां हैं...यहां हैं। सड़क पर अदभुत चित्रकारी की गई है, जिस पर तरह-तरह के स्लोगन्स लिखे हुए हैं।

सड़क पर ही 'व्हाट्सएप्प यूनवर्सिटी' का एक प्रतीकात्मक चित्र खींचा गया है, जिसमें 2 मोटी किताबों के ऊपर रखे हुए कमल के बीच से एक कलम निकली हुई है। उसके ऊपर व्हाट्सएप्प का 'आइकन' बना हुआ है, फिर आगे लिखा हुआ है-University। विरोध प्रदर्शन में शामिल एक महिला से बात हुई जिसने अपना नाम भी शाहीन ही बताया (उन्होंने कहा- शाहीन बाग की शाहीन)। शाहीन ने कहा- हम वज़ीर-ए-आज़म से यह दरख़्वास्त करते हैं कि एनआरसी और सीएए कानून वापस लें, इसके अलावा हमारा उनसे कोई विरोध नहीं है। वे हमारे भी वज़ीर-ए-आज़म हैं। 
विज्ञापन

कुल मिलाकर इस विरोध प्रदर्शन से आप सहमत या असहमत हो सकते हैं लेकिन वहां विरोध में शामिल लोगों की प्रतिबद्धता, संयम और रचनात्मकता अद्भुत है। सीएए और एनआरसी कानून के समर्थन में भी कई जगह रैलियां निकलीं हैं लेकिन लोकतंत्र में असहमत स्वरों का बहुत महत्व होता है। असहमतियों की अभिव्यक्ति के लिए लोगों ने जो तरीके अपनाए हैं वो अत्यधिक रचनात्मक हैं।  

लेकिन प्रतिरोध की यह संस्कृति सरकार को कब तक रास आएगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। मामला अदालत में भी है, जनता की मुश्किलों का हवाला दिया जा रहा है, हालांकि धरना स्थल जिस सड़क पर है, उसके बगल वाली सड़क से आवागमन हो सकता है और प्रदर्शन में शामिल कुछ लोगों ने बताया कि स्कूल बस और एम्बुलेंस जा रही हैं।

होने को कुछ भी हो सकता है लेकिन जो सबसे ज़रूरी है, वह राजनीतिक पहल। वह अभी तक नहीं हुई है और उसके आसार भी नहीं दिख रहे हैं। तरह-तरह की अफ़वाहें फैली हुई हैं, यह भी कहा जा रहा है कि शाहीन बाग़ को भरमाया गया है। भरमाई हुई जनता का भरम भी सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच संवाद से ही दूर होगा। सरकार को न सिर्फ आधिकारिक बयानों बल्कि हर स्तर पर बातचीत करनी चाहिए और उन्हें आश्वस्त करना चाहिए। 

 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें  blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें