मनुष्य अपने जीवन में बहुत कुछ हासिल करना चाहता है। उसे लगता है कि लोग उसे एक महान व्यक्ति के रूप में देखें। इस इच्छा को पूरा करने के लिए वह तमाम उपक्रम करता है। लेकिन, मैं अक्सर सोचता हूं कि अगर किसी मनुष्य को महान बनने के लिए अपने वैभव का प्रदर्शन करना पड़े, तो क्या उसकी महानता वास्तव में उसके भीतर मौजूद है? महानता वह नहीं है, जिसे मनुष्य दूसरों को दिखाने का प्रयास करता है।
महानता तो वह है, जो उसके आचरण में बिना किसी आडंबर के दिखाई देती है। एक व्यक्ति साधारण वस्त्र पहनता है। छोटे-से घर में रहता है। दूसरों को दिखाने के लिए उसके पास कुछ नहीं है। फिर भी, यदि उसके हृदय में सत्य के प्रति निष्ठा, व्यवहार में विनम्रता और निर्णयों में न्याय का भाव है, तो वह उस व्यक्ति से कहीं अधिक महान है, जो अपने वैभव के कारण सम्मानित तो दिखाई देता है, लेकिन जिसके चरित्र में ईमानदारी का अभाव है।
मनुष्य का स्वभाव विचित्र है। वह दिखाई देने वाली चीजों से ज्यादा प्रभावित होता है। वह भूल जाता है कि चमकती हुई वस्तु और मूल्यवान वस्तु हमेशा एक-सी नहीं होतीं। सोना मिट्टी में पड़ा हो, तब भी सोना ही रहता है, और किसी साधारण धातु पर सोने का आवरण चढ़ा दिया जाए, तो भी उसका असली स्वरूप नहीं बदलता। ठीक इसी तरह मनुष्य का चरित्र भी उसके पद, प्रतिष्ठा या संपत्ति से नहीं बनता।
मनुष्य की वास्तविक परीक्षा तो तब होती है, जब उसके सामने कोई ऐसा व्यक्ति हो, जो उससे हर मामले में कमजोर और असहाय हो। वह उसके साथ कैसा व्यवहार करता है, इसी से उसके चरित्र का वास्तविक परिचय मिलता है। चरित्र की महानता इस बात में नहीं है कि हम अपने से कमजोर लोगों पर कितनी दया करते है, बल्कि इसमें है कि हम उन्हें कितना सम्मान देते हैं। मेरा विश्वास है कि शिक्षा मनुष्य को अज्ञान, अंधविश्वास और अन्याय से मुक्त करने की शक्ति रखती है। पर, यदि शिक्षित व्यक्ति ही दूसरों को तुच्छ समझने लगे, यदि उसकी विद्वत्ता उसे अहंकारी बना दे, तो उसे अपनी शिक्षा के उद्देश्य पर पुनर्विचार करना चाहिए।
इसी तरह सादगी का अर्थ केवल साधारण कपड़े पहनना या कम साधनों में जीवन बिताना नहीं है। उसका संबंध तो मनुष्य की आंतरिक स्वतंत्रता से है। वास्तव में वही व्यक्ति सादा है, जिसे अपने महत्व को सिद्ध करने के लिए दूसरों की प्रशंसा की जरूरत नहीं होती। ऐसा व्यक्ति अपने जीवन का मूल्य दूसरों की दृष्टि से निर्धारित नहीं करता। वह जानता है कि प्रशंसा और निंदा परिस्थितियों के साथ बदलती रहती हैं। इसलिए, मनुष्य को अपनी प्रतिष्ठा की चिंता करने से पहले अपने चरित्र की चिंता करनी चाहिए। प्रतिष्ठा वह है, जो दूसरे लोग हमें देते हैं और चरित्र वह है, जिसे हम अपने कर्मों से गढ़ते हैं।
सूत्र- अच्छे इन्सान बनिए
जीवन में महान बनने के लिए दूसरों को अपनी महानता दिखाने के बजाय अपने आचरण से उसका परिचय दें। अपने से कमजोर व्यक्ति को भी उतना ही सम्मान दें, जितना किसी प्रभावशाली व्यक्ति को। लोगों की प्रशंसा के लिए नहीं, अपने विवेक और सही सिद्धांतों के अनुसार जीवन जिएं। प्रतिष्ठा लोग देते हैं, पर चरित्र आपके कर्म बनाते हैं।