तकनीक का सबसे सकारात्मक पहलू है कि यह बड़ी-बड़ी मशीनों की मोहताज नहीं होती, बल्कि मनुष्य की विचारशीलता और नवोन्मेष से जन्म लेती है। तकनीक जब शोध व प्रयोग का रूप लेती है, तो वह प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहती।
जब मैं अपने व्याख्यानों में भारत के वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास पर चर्चा करता हूं, तो मेरा ध्यान हमेशा इस बात पर रहता है कि तकनीक और विज्ञान कोई दूर की वस्तुएं नहीं हैं। ये हमारी जिज्ञासा, अवलोकन क्षमता और प्रकृति को गहराई से समझने की इन्सानी इच्छा का ही परिणाम हैं।
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1921 में भूमध्य सागर के नीले जल को देखकर मेरे मन में उठे एक साधारण से सवाल कि समुद्र और आकाश नीले क्यों दिखते हैं? ने मुझे और मेरे साथियों को वर्षों के गहन शोध की ओर प्रेरित किया। जब हमने ‘रमन प्रभाव’ की खोज की, तो हमारे पास कोई बहुत महंगी या आयातित प्रयोगशाला तकनीक नहीं थी। हमने बहुत ही सरल और किफायती उपकरणों का उपयोग करके इस महान भौतिक सिद्धांत को साबित किया। तकनीक का सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू यही है कि यह बड़ी-बड़ी मशीनों की मोहताज नहीं होती, बल्कि मनुष्य की विचारशीलता और नवोन्मेष से जन्म लेती है।
तकनीक जब शोध और प्रयोग का रूप लेती है, तो वह केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहती। प्रकाश के बिखराव और उसके स्पेक्ट्रम से जुड़े उन शुरुआती अध्ययनों ने आगे चलकर ‘रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी’ जैसी तकनीक को जन्म दिया। आज यह तकनीक चिकित्सा, रसायन विज्ञान, कला संरक्षण और अंतरिक्ष अन्वेषण में पदार्थों की पहचान करने के लिए उपयोग की जा रही है। एक छोटे-से विचार से विकसित हुई तकनीक जब पूरी दुनिया के काम आती है, तो वही विज्ञान की सबसे बड़ी सार्थकता होती है।
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मेरा हमेशा से यह दृढ़ विश्वास रहा है कि किसी भी देश की वास्तविक प्रगति आयातित तकनीकों पर निर्भर रहने से नहीं, बल्कि अपने संसाधनों और अपनी प्रतिभा के बल पर मौलिक तकनीक विकसित करने से होती है। जब हम अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए खुद तकनीकी समाधान खोजते हैं, तो इससे न केवल हमारे युवाओं को प्रेरणा मिलती है, बल्कि पूरे समाज व देश के विकास को नई गति भी मिलती है।