अमेरिका और भारत के संबंध
सत्तर साल से अमेरिकी रिश्तों का सार यही है कि अपने हितों के आगे उसने कभी भी हिन्दुस्तान की चिंता नहीं की। बल्कि खुल्लम खुल्ला वह भारत के ख़िलाफ़ रहा है। बांग्लादेश युद्ध में तो उसने बाक़ायदा पाकिस्तान का साथ देते हुए भारत के ख़िलाफ़ अपना जहाज़ी बड़ा भेज ही दिया था। अगर सोवियत रूस ने मदद न की होती तो भारत के सामने मुश्किल खड़ी हो जाती। पिछले पच्चीस बरसों में अलबत्ता संबंधों में आंशिक बदलाव आया है। नरसिंह राव सरकार की आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के चलते अमेरिका को कोई कम फायदा नहीं हुआ है।
भारत अमेरिकी कंपनियों का पसंदीदा बाज़ार बन गया। इसके बाद, दस-ग्यारह बरस पहले अंतर्राष्ट्रीय मंदी के दौर में अमेरिकी अर्थ व्यवस्था धड़ाम से गिरी थी, तो यह भारत का बाज़ार ही था, जिसने इस महादेश को प्राणवायु दी। लेकिन अपने प्रति उपकारों को याद रखना अमेरिका की फ़ितरत में नहीं है। आज भी भारतीय अमेरिका की रीढ़ से बाहर हो जाएं तो इस विराट महाशक्ति की हालत क्या होगी -आप कल्पना नहीं कर सकते।
पाकिस्तान और भारत दोनों को साधने की नीति
कुछ बरस पहले तक तो अमेरिका भारत और पाकिस्तान - दोनों को साधने की नीति पर चल रहा था। लेकिन जब पाकिस्तान चीन की शरण में चला गया तो अमेरिका के लिए भारत ही एशिया में उसका शुभचिंतक हो सकता था। इसके अलावा पाकिस्तान का बाज़ार अमेरिका का कोई भला नहीं कर सकता था। भारत के साथ रहने के फ़ायदे अमेरिका को पता हैं। खुद राष्ट्रपति ट्रंप के अपने कारोबार की जड़ें भारत में फ़ैली हुई हैं।
भारत दे सकता है बड़ा झटका
एक बार उन पर हिन्दुस्तान की कोप दृष्टि पड़ी तो ट्रंप के लिए यह बड़ा झटका होगा। वैसे एक बार ईरान पर प्रतिबंध लगाने के बाद भारत ने अमेरिका का साथ तो दिया था, लेकिन ईरान से तेल आयात पूरी तरह नहीं रोका था । लेकिन इस बार अमेरिकी प्रतिबंध तो विशुद्ध डोनाल्ड ट्रंप की सनक है। खुद अमेरिकी सहयोगी इस मसले पर उसके साथ नहीं हैं। ऐसे में भारत को अपने हितों को भी देखना ही होगा। चीन के बाद भारत ईरान का दूसरा बड़ा तेल आयातक देश है। ईरान से हिन्दुस्तान की दस फ़ीसदी तेल की ज़रूरत पूरी होती है। इस साल मई में ट्रंप के प्रतिबन्ध एलान के बावजूद इंडियन ऑइल और मंगलौर रिफायनरी ने ईरान से समझौता किया है।
हां - अब यह हो सकता है कि अगर योरपीय यूनियन ने प्रतिबंध में अमेरिका का साथ दिया तो भारत तेल का भुगतान योरपीय बैंकों से न करे। पहले भी जब प्रतिबन्ध लगे थे, तो भारत ने तुर्की के बैंक के माध्यम से ईरान को भुगतान किया था। इस बार भारत ईरान को अपनी मुद्रा यानी रुपए में ही तेल की क़ीमत चुका सकता है।
भारत-ईरान के संबंध और रूस
हिन्दुस्तान में ईरान की छवि कोई दुश्मन देश की नहीं रही है। चीन ने जब पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह हथियाया तो यह ईरान ही था, जिसने चाबहार बंदरगाह के लिए भारत के दरवाज़े खोले। पाकिस्तान और चीन इससे तिलमिलाए हुए हैं। क्या अमेरिका भारत को अपने हितों की रक्षा करने से रोक सकता है? हिन्दुस्तान ने अमेरिका का लिहाज़ करते हुए लंबे समय तक रूस के साथ अपने संबंधों पर बर्फ़ की चादर डाल दी थी। जब अमेरिका पाकिस्तान के ख़िलाफ़ वर्षों तक चेतावनी के स्तर से आगे नहीं बढ़ा तो रूस के साथ हमें पुराने रिश्तों का नवीनीकरण करना ही था। भारत के पुनर्निर्माण में सोवियत रूस का बड़ा हाथ रहा है। अच्छी बात है रूस के साथ रिश्तों में फ़ासले इतने नहीं हुए थे कि वापस न लौट सकते।
क्या है अमेरिकी उदारता का गणित
क्या ही अजीब बात है कि एक तरफ़ तो अमेरिका ने ईरान के मामले में भारत के प्रति कुछ उदारता का भाव दिखाया है। दूसरी ओर उसने भारत की 50 वस्तुओं को ड्यूटी -फ्री की सूची से बाहर कर दिया। यानी इस सूची में शामिल उत्पादों के आयात पर अब शुल्क वसूला जाएगा। इनमें हैंडलूम और खेती के काम में आने वाले अनेक सामान हैं। भारत के सूती कपड़े आज भी अमेरिका के बाज़ारों में भरे पड़े हैं। अब इस निर्णय से यक़ीनन भारतीय कंपनियों को झटका लगेगा।
क्या भारत सरकार इस पर अपना रुख साफ़ करेगी। उसके पास चीन की तरह अमेरिकी उत्पादों पर भी आयात शुल्क लगाने का विकल्प खुला है। अमेरिकी सरकार ने निर्णय लेकर भारतीय विदेश मंत्रालय को सीधे अधिसूचना की प्रति भेजी है। अब भारत को ऐसी ही जवाबी कार्रवाई करनी होगी। हालांकि दो दिन पहले भारत ने संयुक्त राष्ट्र की एक बैठक में साफ़ तौर पर कहा था कि रूस और ईरान जैसे देशों पर प्रतिबन्ध तरक़्क़ी की राह में रोड़ा हैं और अनेक देश इन प्रतिबंधों के कारण बड़ा नुकसान उठा रहे हैं।
अच्छी बात यह है कि इस मामले में 135 देशों ने भारत के सुर से सुर मिलाया। यह बैठक क्यूबा पर अमेरिकी बंदिशों के विरोध में बुलाई गई थी। यह अमेरिकी ज़िद है कि वह अपने फ़ैसलों के आगे दुनिया भर का विरोध दरकिनार कर देता है। पिछले साल भी संयुक्त राष्ट्र के कुल 193 सदस्य देशों में से 191 ने क्यूबा से बंदिशें हटाने की मांग की थी। सिर्फ़ इज़रायल और अमेरिका इसके विरोध में थे और अलग-थलग पड़ गए थे। अमेरिका का यह अड़ियल रवैया अब उसके लिए मुसीबत बनने जा रहा है क्योंकि आज का अमेरिका बराक ओबामा के समय का अमेरिका नहीं है और ट्रंप भी अपने पूर्व राष्ट्रपतियों जैसे नहीं हैं। अगर अमेरिका ने आईना नहीं देखा तो उसकी शक्ल बदरंग होते देर नहीं लगेगी।
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