राजनीति में किसी चेतावनी की असली परीक्षा उसके शब्दों से नहीं, बदलती परिस्थितियों से होती है। जून में राहुल गांधी ने जिस बड़े आर्थिक संकट की आशंका जताई थी, सितंबर के अंत में विदेश मंत्री एस. जयशंकर की चेतावनी ने बहस को एक नए और अधिक ठोस क्षेत्र में पहुंचा दिया है। अब चर्चा केवल अर्थव्यवस्था की नहीं, खाद्य सुरक्षा की है।
29 सितंबर को जयशंकर ने वैश्विक परिस्थितियों का जिक्र करते हुए आने वाले महीनों में बड़े खाद्य संकट की आशंका जताई। उन्होंने इसे केवल किसी एक देश या एक युद्ध का परिणाम नहीं माना, बल्कि खाद्य, ईंधन, उर्वरक और वित्त-यानी ‘4F’ संकट-के व्यापक दबाव से जोड़ा।
जून में राहुल ने क्या कहा था?
जून में राहुल गांधी की चेतावनी का केंद्र व्यापक आर्थिक संकट था। उन्होंने इसे ‘आर्थिक सुनामी’ का नाम दिया था। उस समय इस बयान पर स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बहस हुई-क्या यह विपक्ष की राजनीतिक आशंका है या आने वाले आर्थिक जोखिम का संकेत?
तीन महीने बाद तस्वीर का एक दूसरा पहलू सामने है। जयशंकर ने आर्थिक संकट शब्द का इस्तेमाल उसी संदर्भ में नहीं किया, लेकिन उन्होंने जिन कारणों को गिनाया, उनमें खाद्य, ईंधन, उर्वरक और वित्त का आपस में जुड़ना शामिल है। यानी वैश्विक अर्थव्यवस्था में किसी एक मोर्चे का संकट अब दूसरे मोर्चे को भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि जयशंकर ने राहुल गांधी के जून के बयान को शब्दशः दोहराया नहीं है, लेकिन सितंबर की उनकी चेतावनी ने उस व्यापक आर्थिक चिंता के एक महत्वपूर्ण हिस्से-खाद्य सुरक्षा-को सामने ला दिया है।
जयशंकर की चेतावनी का असली मतलब
खाद्य संकट का मतलब केवल यह नहीं है कि दुनिया में अनाज खत्म हो जाएगा। असली खतरा आपूर्ति, लागत और कीमत—तीनों के एक साथ दबाव में आने का है। यूक्रेन और ब्लैक सी क्षेत्र वैश्विक अनाज व्यापार के लिए महत्वपूर्ण हैं। दूसरी ओर, उर्वरक उत्पादन और आपूर्ति भी कुछ खास क्षेत्रों पर निर्भर है।
युद्ध या समुद्री मार्गों में व्यवधान से अगर अनाज की आवाजाही प्रभावित होती है और साथ ही उर्वरक महंगा या कम उपलब्ध होता है, तो उसका असर अगले कृषि चक्र की लागत और उत्पादन पर पड़ सकता है। जयशंकर ने इसी आपस में जुड़े जोखिम की ओर संकेत किया है। उन्होंने ‘4F’ संकट में Food, Fuel, Fertiliser और Finance को एक साथ रखा।
खतरा केवल युद्ध का नहीं, मौसम का भी
खाद्य सुरक्षा की कहानी में एक और किरदार तेजी से महत्वपूर्ण हो रहा है-मौसम। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन यानी FAO के मुताबिक अगस्त 2026 में वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक 133.3 अंक रहा, जो जुलाई से 1.9 प्रतिशत और एक साल पहले की तुलना में 2.5 प्रतिशत अधिक था। FAO ने ऊंचे तापमान, मौसम संबंधी जोखिम, मध्य-पूर्व संघर्ष और ब्लैक सी की व्यापारिक बाधाओं को आपूर्ति संबंधी चिंताओं से जोड़ा है।
अनाज का सूचकांक भी अगस्त में 2.2 प्रतिशत बढ़ा और मई 2024 के बाद अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। गेहूं और मक्का की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर मौसम, मांग और व्यापारिक व्यवधानों का असर दिखाई दिया। इसका अर्थ यह नहीं कि दुनिया तत्काल खाद्यान्न की कमी में जाने वाली है। लेकिन यह जरूर बताता है कि खाद्य बाजार पर जोखिम बढ़ रहे हैं।
भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल
भारत की स्थिति कई दूसरे देशों से अलग है। देश दुनिया के बड़े कृषि उत्पादकों में है और उसके पास खाद्यान्न उत्पादन तथा भंडारण की अपनी व्यवस्था है। इसलिए वैश्विक खाद्य संकट की आशंका का अर्थ यह नहीं कि भारत में तुरंत अनाज का अकाल पड़ जाएगा। लेकिन भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलग-थलग भी नहीं है।
कृषि में उर्वरक, ऊर्जा, डीजल, परिवहन और कई अन्य इनपुट की लागत अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से प्रभावित होती है। अगर युद्ध के कारण ऊर्जा महंगी होती है, समुद्री परिवहन बाधित होता है या उर्वरक की कीमत बढ़ती है, तो खेती की लागत पर दबाव आ सकता है। और खेती की लागत बढ़ने का मतलब केवल किसान की लागत बढ़ना नहीं है। उसका असर अंततः खाद्य कीमतों पर भी पड़ सकता है।
पहली दस्तक हो सकती है महंगाई
खाद्य संकट को केवल ‘भोजन की कमी’ से जोड़ना अधूरा होगा। खाद्य सुरक्षा का सवाल यह भी है कि भोजन कितना उपलब्ध है और कितने लोगों की पहुंच में है। अगर बाजार में गेहूं, चावल, तेल या अन्य खाद्य वस्तुएं मौजूद हैं, लेकिन उनकी कीमत लगातार बढ़ती है, तो सबसे ज्यादा दबाव निम्न और मध्यम आय वर्ग पर पड़ता है।
यही कारण है कि वैश्विक खाद्य कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी नीति-निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण होती है। FAO का खाद्य मूल्य सूचकांक इसी अंतरराष्ट्रीय बाजार के रुझान को मापता है और उसका खाद्य मूल्य निगरानी तंत्र ऊंची कीमतों से जुड़े खाद्य-सुरक्षा जोखिमों के लिए शुरुआती संकेत देता है।
राहुल ने कहा था से आगे की कहानी
यहां राजनीतिक बहस का एक दिलचस्प पहलू भी है। कांग्रेस के लिए यह कहने का अवसर है कि जून में राहुल गांधी ने जिस बड़े आर्थिक खतरे की चेतावनी दी थी, सितंबर में सरकार के विदेश मंत्री भी वैश्विक खाद्य संकट की गंभीर आशंका जता रहे हैं।
लेकिन इसे सीधे-सीधे ‘राहुल सही, जयशंकर ने मान लिया’ कहना विश्लेषण को सरल बना देगा। दोनों बयानों का संदर्भ अलग है। राहुल गांधी की जून की चेतावनी व्यापक आर्थिक संकट को लेकर थी, जबकि जयशंकर की सितंबर की चेतावनी वैश्विक खाद्य सुरक्षा और उससे जुड़े भू-राजनीतिक जोखिमों पर केंद्रित है। फिर भी दोनों के बीच एक साझा प्रश्न जरूर है-क्या दुनिया में पैदा हो रहे संकटों का असर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जिंदगी पर बढ़ सकता है?
असली चुनौती राजनीति नहीं, तैयारी है
खाद्य संकट की आशंका पर राजनीतिक बयानबाजी होना स्वाभाविक है। लेकिन किसी भी सरकार के सामने असली चुनौती इससे आगे की है।
क्या पर्याप्त खाद्यान्न भंडार है? क्या उर्वरक आपूर्ति सुरक्षित है? क्या ऊर्जा और परिवहन लागत को नियंत्रित रखा जा सकता है? क्या वैश्विक आपूर्ति शृंखला में अचानक व्यवधान आने पर भारत के पास वैकल्पिक स्रोत हैं? और सबसे महत्वपूर्ण, अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य कीमतें बढ़ती हैं तो घरेलू उपभोक्ता और किसान दोनों को कैसे सुरक्षित रखा जाएगा? इन सवालों के जवाब किसी एक बयान में नहीं मिलेंगे।
जून की चेतावनी से सितंबर की चिंता तक
तीन महीने में शब्द बदल गए हैं। जून में ‘आर्थिक सुनामी’ की चेतावनी थी। सितंबर में ‘बड़े खाद्य संकट’ की आशंका सामने आ गई। इन दोनों को जोड़ने वाली कड़ी है, एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था, जिसमें युद्ध, मौसम, ऊर्जा, उर्वरक, व्यापार और वित्त एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। FAO के ताजा आंकड़े भी बता रहे हैं कि खाद्य बाजार में आपूर्ति संबंधी चिंताएं लौट रही हैं।
इसलिए सवाल अब यह नहीं होना चाहिए कि जून में किसने क्या कहा और सितंबर में किसने क्या माना। बड़ा सवाल यह है कि अगर खाद्य संकट सचमुच गहराता है, तो भारत उसके लिए कितना तैयार है? क्योंकि आर्थिक संकट का असर शेयर बाजार की स्क्रीन पर दिखाई दे सकता है, लेकिन खाद्य संकट का असर सीधे रसोई की थाली में दिखाई देता है। और जब संकट थाली तक पहुंचता है, तब उसकी कीमत केवल अर्थव्यवस्था नहीं, समाज भी चुकाता है।
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