जापान के आईची नागोया में सम्पन्न एशियाई खेलों में भारत का प्रदर्शन अपेक्षा से कमतर भले रहा हो, लेकिन इसने देश में खेलों की दुनिया में बेटियों की बढ़ती ताकत को पुरजोर तरीके से रेखांकित किया है। उन्होंने अपने पुरूष खिलाड़ियों के मुकाबले 4 गोल्ड मेडल ज्यादा जीतकर मर्द खिलाड़ियों के सामने यह कड़ी चुनौती पेश कर दी है कि अभी भी संभल जाओ, मुमकिन है कि आने वाले वक्त में तमाम मेडल हमारी ही झोली में हों।
इस बार भारतीय खिलाड़ियों द्वारा जीते कुल 21 स्वर्ण पदकों में से 11 महिला खिलाड़ियों ने जीते हैं। जबकि पुरूषों के हिस्से में 7 गोल्ड मेडल ही आए हैं।
भारतीय खिलाड़ियों द्वारा जीते कुल पदकों में भी बेटियों का पलड़ा ही भारी है। अगर जेन ज़ी के शब्दो में कहें तो 'एक कचौड़ी, दो सिंघाड़ा, अब खेल में मर्दों को पछाड़ा।' (बांग्ला में समोसा को सिंघाड़ा कहते हैं)। बेटियों की यह कामयाबी इसलिए भी अहम है कि 1951 में नई दिल्ली में हुए पहले एशियाई खेलों में भारत ने 15 गोल्ड मेडल जीते थे, जिसमें एक भी महिला खिलाड़ी नहीं थी।
1982 में जब भारत में फिर एशियाई खेल हुए तो गोल्ड जीतने वाली महिला खिलाड़ियों की संख्या दो तक पहुंची थी। हालांकि 2002 के बुसान एशियाई खेलों में जरूर भारत की महिला खिलाड़ियों ने अपने पुरूष खिलाड़ियों के मुकाबले 1 गोल्ड मेडल ज्यादा हासिल किया था। लेकिन उसके बाद ‘कचौड़ी’ और ‘समोसे’ की इस अघोषित स्पर्द्धा में पहली बार कचौड़ियां, समोसों पर इतनी भारी पड़ी हैं।
एशियाई खेलों में भारत का प्रदर्शन
समग्रता में देखें तो एशियाई खेलों में भारत का यह प्रदर्शन 2022 में चीन के ग्वांगझू एशियाई खेलों के प्रदर्शन की तुलना में कमतर ही रहा है, जब भारतीय खिलाड़ियों ने 28 स्वर्ण पदकों के साथ कुल 106 मेडल हासिल किए थे। यानी पदक तालिका में 100 का आंकड़ा पहली बार पार किया था। लेकिन इस बार गाड़ी 85 पर अटक गई तो इसलिए क्योंकि हम उन खेलों में भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सके, जिनमें पदकों की पूरी उम्मीद थी।
जैसे कि बेडमिंटन, टेनिस, घुड़सवारी आदि। एथलेटिक्स, निशानेबाजी, बॉक्सिंग, रेसलिंग में और बेहतर प्रदर्शन की आशा थी। शूटिंग व एथलेटिक्स में इस बार पिछले एशियाई खेलों की तुलना में 9 स्वर्णपदक कम आए। अलबत्ता भारतीय तीरंदाजों ने अच्छा प्रदर्शन किया और मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स और कुराश जैसे नए और अपारंपरिक खेलों में पदक जीतकर भविष्य की उम्मीदें जगाई हैं।
यह सुखद संयोग रहा कि भारत की क्रिकेट, हॉकी और कबड्डी की महिला और पुरूष टीमों ने स्वर्ण पदक जीते। यूं तो इन सभी खेलों में बेटियों ने शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन भारतीय महिला हॉकी टीम का चीन के साथ फाइनल मुकाबला स्मृतियों में हमेशा दर्ज रहेगा।
पेरिस ओलंपिक की उप विजेता रही चीन की टीम के खिलाफ भारतीय महिला खिलाड़ियों ने पहले क्वार्टर में एक गोल ठोकने के बाद जिस तरह अपने गोल पोस्ट की आखिरी क्षण तक रक्षा की और गोल्ड अपने नाम किया, वह कहानी गजब की है। लग रहा था कि सभी महिला खिलाडी रानी झांसी के इस अमर वाक्य कि ‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’ की तर्ज पर मैं तुम्हें ‘गोल करने नहीं दूंगी’ के भाव से अडिग चट्टान बन गई थी।
इसमें भी क्लायमेक्स भारतीय गोलकीपर सविता पूनिया द्वारा चीनी खिलाड़ी का पेनाल्टी स्ट्रोक रोक देना रहा। पेनाल्टी स्ट्रोक यानी लगभग गोल होने की गारंटी, क्योंकि अकेले गोलकीपर पर ही पूरे गोलपोस्ट के हिफाजत की जिम्मेदारी आन पड़ती है। लेकिन सविता के सटीक पूर्वानुमान ने चीन का यह ब्रह्मास्त्र भी फेल कर दिया।
चीन के खिलाफ मिली जीत
चीन पर भारत की बेटियों की जीत अडिग संकल्प शक्ति, जीत के जज्बे और उत्कृष्ट आपसी तालमेल का नतीजा थी। इस टीम की कमान महज 22 साल की युवा सलीमा टेटे के हाथ में है। इस टीम की चपलता, जुझारू क्षमता और प्रतिबदधता को देखते हुए आगामी लास एजेंल्स आोलिंपिक में पदक की उम्मीद करना बिल्कुल स्वाभाविक है। बीच के समय में ढीली पड़ी महिला हॉकी टीम में नई जान फूंकने का श्रेय इसके डच कोच शोर्ड मारिन को जाता है, जिन्होंने हॉकी टीम के रूप में युवा वीरांगनाओं की फौज खड़ी कर दी है।
एशियन गेम्स का फाइनल जीतकर ओलिंपिक का टिकट हासिल करने के बाद मैदान का वह दृश्य भी अविस्मरणीय था, जब महिला हॉकी खिलाड़ियों ने अपने प्रिय कोच मारिन को हाथों में उठाकर आकाश में उछाल दिया था। हालांकि इस टीम पर अभी और मेहनत की जरूरत है, खासकर पेनाल्टी कॉर्नर कर्न्वजन के मामले में। वैसे भी मेडल यूं ही नहीं आते। उसके पीछे कठोर मेहनत, जीतने का संकल्प, फिटनेस, अन्य सुविधाएं और संसाधन भी उतने ही मायने रखते हैं।
सरकार के स्तर पर आज पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सुविधाएं खिलाड़ियों को मुहैया कराई जा रही है, लेकिन मैदान में तो खिलाड़ी को ही प्रदर्शन करना होता है। यह कड़े परिश्रम और हर हाल में जीतने की चाहत से ही आता है।
सुखद यह है कि बेटियों में यह जज्बा पुरूषों की तुलना में ज्यादा ठाठें मार रहा है। ये पूरे देश के लिए गर्व की बात है कि हॉकी और क्रिकेट जैसे लोकप्रिय खेलों में दो शीर्ष सितारा महिला खिलाड़ी सलीमा टेटे और क्रांति गौड़ आदिवासी समुदाय से आती हैं। जहां तक एशियाई खेलों में चीन की बादशाहत की बात है तो वह पूरी दमदारी से कायम है। चीन तो दूर हम मेडल टैली में तीसरे स्थान पर रहे दक्षिण कोरिया से भी बहुत पीछे हैं। तीसरे स्थान पर आने के लिए हमे अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है।
अच्छी बात यह है कि खेलों में महिलाओं की भूमिका के प्रति समाज का नजरिया तेजी से बदल रहा है। ‘खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब’ जैसी नकारात्मक सोच दम तोड़ रही है। खेल में भी न सिर्फ कॅरियर है, बल्कि यह अपने साथ गौरव, यश और पैसा भी लेकर आता है, यह बात लोगों की समझ आने लगी है।
वरना गुजरे जमाने की याद करें जब महिला क्रिकेट और हॉकी जैसे खेलों के दर्शक मिलना भी दूभर होता था, लेकिन आज हमे अपनी कई महिला सितारा खिलाड़ियों के न सिर्फ नाम याद हैं बल्कि उनसे उम्मीदें भी लगातार बढ़ती जा रही हैं। वो वक्त आ गया है कि जब जेन ज़ी के नारे को बदलकर यह कहना पड़े कि ‘दो कचौड़ी, एक समोसा, खेलों में वक्त आया है ऐसा....!’
--------------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।