गिरीश कर्नाड: मेरा अनुभव उनके साथ दिलचस्प था
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मेरा अनुभव उनके साथ दिलचस्प था, उन्हें कोई सम्मान मिला था। मैं संगीत नाटक अकादमी उनका साक्षात्कार लेने गया। हिंदी में बात करने लगा तो नाराज़ हो गए- I can’t speak Hindi, I don’t understand hindi !! तो मैंने अपनी टीम से कहा- कैमरा लाइट समेट लें- हम तो दूरदर्शन के राष्ट्रीय प्रसारण के लिए साक्षात्कार लेने आए थे, हिंदी के कारण सारे राष्ट्र में प्रसारित होता। आगे आपकी मर्ज़ी।
ऊपर से मैंने यह भी पूछ लिया- फिर आप हिंदी फ़िल्में कैसे कर लेते हैं? दो साल पहले ही कालिदास समारोह में अपना नाटक “ हयवदन “ भी हिंदी में ले कर आप आए थे?
फिर चलते-चलते मैंने कहा- मैं यहां दूरदर्शन के वरिष्ठ अधिकारी के नाते आया भी नहीं था, उसी कालिदास समारोह के संस्थापक का बेटा हूं। आप से आपके नाटकों पर ही चर्चा करने आया था। इतना सुनते ही उनके चेहरे का अहंकार उतरते देखा। उन्होंने टीम को रोका और फिर अच्छी हिंदी में पूरे दो घंटे साक्षात्कार हुआ, जो दो क़िस्तों में प्रसारित भी हुआ।
समय बीत गया और बाद में तो उनसे हमने एक बड़ा धारावाहिक भी बनवाया था फिर जब भी मिलते फ़ौरन अंग्रेज़ी छोड़ हिंदी में बोलने लगते। बहरहाल, यही हिंदी को हेय दृष्टि से देखने की बात एक और बड़े कवि सीताकांत महापात्र (अभी वे जीवित हैं) ने की थी और फिर मेरे द्वारा निर्मित निर्देशित फ़िल्म “ शब्दों के पार: सीता कांत “ में ख़ूब अच्छी धारा प्रवाह हिंदी बोले !
आज गिरीश कर्नाड की याद आई तो पच्चीस साल पुरानी यह बात याद आई।
यूं आदमी भले थे जबकि अभिनेता तो अद्भुत। उनकी स्मृति को प्रणाम !
लेखक राजशेखर व्यास जी दूरदर्शन नेशनल (डीडी-1) में एडिशनल डायरेक्टर जनरल हैं।
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