जर्मनी में सबसे अधिक फ़िल्में 40 फ़ीचर फ़िल्म फ़ासबिंडर ने बनाईं।
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द्वितीय विश्वयुद्ध और जर्मन फिल्म उद्योग
द्वितीय विश्वयुद्ध में पराजय के साथ जर्मन फ़िल्म उद्योग का भट्टा बैठ गया। फिर पुनर्निर्माण काल में एक बार पुन: पश्चिमी जर्मनी में फिल्म उद्योग पनपा। वह न केवल पनपा वरन फिल्म निर्माण में दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा देश बन गया, लेकिन 1950 के दशक में पश्चिम जर्मनी में गुणवत्ता की दृष्टि से अच्छी फिल्में नहीं बन रही थीं।
1962 में 26 लेखक एवं फ़िल्म बनाने वालों ने एक मेनिफ़ेस्टो तैयार किया और उन लोगों ने एक फ़िल्म समारोह के दौरान जर्मन सिनेमा की मृत्यु की घोषणा कर एक नए ‘यंग जर्मन सिनेमा’ की मांग की। ये लोग ‘न्यू जर्मन सिनेमा’ (1965) के संस्थापक बने। इस बोर्ड ने सांस्कृतिक बजट तथा वेस्ट जर्मन टेलिविजन नेटवर्क से फंडिंग ली और स्वतंत्र रूप से फ़िल्म का वितरण करने लगे।
इस समय ‘न्यू वेव’ के जनक गोदार की फ़िल्में बनीं। ‘यंग टोरलेस’, ‘दि आर्टिस्ट्स अंडर द बिग टॉप: डिसओरिएंटेड’ इस काल की प्रमुख फ़िल्में हैं। इस आंदोलन से आर ड्ब्ल्यू फ़ासबिंडर, वेर्नर हेर्ज़ोग, विम वेंडर्स तीन बड़े फ़िल्म निर्देशक उभरे। सबसे अधिक फ़िल्में – 40 फ़ीचर फिल्में फ़ासबिंडर ने बनाईं। उसने सर्वाधिक चमकीली फ़िल्में बनाईं जिनका अंत या तो हत्या अथवा आत्महत्या में होता है। ‘व्हाई डज हर आर रन अमोक?’, ‘द बिटर टीयर्स ऑफ़ पेट्रा वोन कांट’, ‘अली: फ़ीयर ईट्स द सोल’, ‘द मैरिज ऑफ़ मारिया ब्राउन’ ‘लोला’ आदि उसकी कुछ फ़िल्मों के नाम हैं।
हेरज़ोग की फ़िल्में सामाजिक से अधिक आध्यात्मिक और रहस्यवादी होती थीं। ‘अगुरे, द रॉथ ऑफ़ गॉड’, ‘एवरी मैन फ़ॉर हिमसेल्फ़ एंड गॉड एगेंस्ट ऑल’, हॉर्ट ऑफ़ ग्लास’ उसकी कुछ फिल्में हैं। विम वेंडर्स की फ़िल्में पोस्टमॉर्डन होती, वे स्थान के प्रतीक द्वारा अजनबीपन दिखाते हैं। ‘द गोली’ज एंजाइटी एट द पेनाल्टी किक’, ‘इन द कोर्स ऑफ़ टाइम’, ‘किंग्स ऑफ़ द रोड’ आदि उनकी कुछ फिल्में हैं। वे आधुनिक समाज में जड़ों से उखड़ना तथा विस्थापन को दिखाते हैं।
स्टेट सबस्डी के कारण खूब फिल्में बनने लगीं, स्त्री और अल्पसंख्यक भी सिनेमा बनाने लगे। मगर हेरज़ोग, विम वेंडर्स तथा फ़ासबिंडर के अलावा किसी को बहुत दर्शक न मिले। अभी भी अधिकांश जर्मन निर्देशक, प्रड्यूसर एवं अभिनेता हॉलीवुड में अधिक सफ़ल थे। हॉलीवुड आज जो है उसमें इन जर्मन का बड़ा योगदान है। जर्मनी से लेकर हॉलीवुड ने साउंड सिस्टम, लाइटिंग, स्टोरीटेलिंग तथा सेट डिजाइनिंग आदि तकनीक को अपने यहाँ स्थापित किया।
‘द गोल्डेन बेयर’
बर्लिन इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल में दिए जाने वाला ‘द गोल्डेन बेयर’ पहली बार 1951 में दिया गया और इसे ऑस्कर के बराबर माना गया। इस पुरस्कार ने दुनिया का ध्यान जर्मन फ़िल्मों की ओर आकृष्ट किया।
‘रन लोला रन’ (1998), फ़नी गेम्स (1997) पिछली सदी की जर्मनी में बनी प्रसिद्ध फ़िल्में हैं। इस सदी अर्थात 21वीं सदी में जर्मनी में अब तक कई फिल्में बनी हैं, जिनमें से 2001 में ‘नोव्हेयर इन अफ़्रीका’, ‘दि एक्सपेरिमेंट’, 2003 में ‘गुड बाय लेनिन’, 2004 में ‘बिफ़ोर द फ़ॉल’, ‘डाउनफ़ॉल’, 2005 में ‘सोफ़ी स्कोल: द फ़ाइनल डेज’, 2006 में ‘फ़ोर मिनट्स’, ‘ए फ़्रैंड ऑफ़ माइन’, ‘ग्रेव डिसीजन’, ‘द लाइव्स ऑफ़ अदर’, 2008 में ‘द वेव’, ‘चेरी ब्लॉसम्स’, 2009 में ‘द व्हाइट रिबन’, 2010 में विन्सेंट वान्ट्स टू सी’, 2011 में ‘वुन्डरकिंडर’, ‘ब्रीदिंग’, ‘ए फ़ैमिली ऑफ़ थ्री’, 2012 में ‘ए कॉफ़ी इन बर्लिन’ फ़िल्में बनी और प्रसिद्ध हुईं। अभी जर्मनी के सिनेमा से काफ़ी उम्मीदें हैं।
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