गांधी जी से असहमति होना कोई अपराध नहीं है... असहमति होनी चाहिए
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क्या यह सत्य नहीं कि बापू के जीवन का वह भाग जिसे पढ़कर कई लोग उनकी आलोचना करते हैं, उसे दुनिया के सामने स्वयं बापू ने ही रखा है। आलोचना करने वाले कथित बुद्धिजीवियों में से क्या कोई अपने अंदर ऐसी निष्ठा रखता है? सत्य यह है कि बापू के त्याग और प्रतिबद्धता के सामने जीवन का यह भाग उनके संघर्षों के आगे कहीं नहीं टिक पाता।
गांधी जी से असहमति होना कोई अपराध नहीं है... असहमति होनी चाहिए लेकिन, आलोचना करते समय हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि गांधी जी केवल देश तक सीमित नहीं हैं। वो दुनिया के लिए एक विचार हैं, एक आत्मा हैं जिसने विनम्रता और करुणा को हथियार बनाकर भारत को स्वतंत्र कराया था। उनसे असहमति स्वीकार की जा सकती है लेकिन, उनका अपमान स्वीकार्य नहीं है।
गांधी जी के जीवन संघर्षों से हमें बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है, एक व्यक्ति जो यूरोप में पढ़ाई करता है, जो दक्षिण अफ्रीका में वकालत करता है, आखिर क्यों वह व्यक्ति सब कुछ त्याग कर भारत आता है और देश की स्वतंत्रता के लिए अहिंसक आंदोलन करता है।
गांधी जी के सिद्धान्तों की तिलांजलि नहीं दी जा सकती है, क्योंकि यह देश की आत्मा में रचा बसा है, आवश्यक है कि हम गांधी जी को खूब पढ़ें और समझें तभी असल मायनों में हम 'गांधी' के साथ न्याय कर पाएंगे।
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