मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव से बेहतर थे संबंध
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जब सोनिया गांधी मदद मांगने पहुंचीं
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से जयललिता के समर्थन वापसी के बाद सोनिया गांधी अपनी सरकार बनाने की गर्ज से मदद मांगने के लिए चंद्रशेखर जी के पास पहुंची। तब चंद्रशेखर जी विश्वासमत का सामना कर रही, वाजपेयी सरकार के खिलाफ 'वोटिंग' के दौरान तटस्थ रहने का मन बना चुके थे।
चंद्रशेखर जी वाजपेयी सरकार के उदारीकरण-निजीकरण और वैश्विकीकरण के नीतियों के मुखर आलोचक थे। इन नीतियों के विरोध करने के लिए चंद्रशेखर को संघ के स्वदेशी जागरण मंच पर जाने में भी कोई गुरेज नहीं था। पर वे अपनी इस समझ पर भी कायम रहें कि भाजपा कोई स्वतंत्र राजनीतिक दल नहीं, बल्कि संघ की एक राजनीतिक ईकाई मात्र है।
वाजपेयी सरकार आर्थिक नीतिगत मामलों पर उन नीतियों को बड़ी तत्परता से लागू कर रही थी, जिसे नरसिम्हा राव-मनमोहन सिंह ने आगे बढ़ाया था। चंद्रशेखर जी ने कांग्रेस-भाजपा की उन नीतियों का कभी समर्थन नहीं किया, इसलिए वे ऐसी परिस्थिति में कांग्रेस को भी समर्थन नहीं कर सकते थे। पर उनके सामने दुविधा यह थी कि अपने दरवाजे आई विधवा और कांग्रेस की प्रमुख नेता सोनिया गांधी को समर्थन देने से मना कैसे करें?
दूसरे दिन वे सोनिया गांधी के घर गए और उन्हें बताया कि क्यों उनकी सरकार बनाने में वे मदद नहीं कर सकते है। चंद्रशेखर जी के इस मनाही से यह सबक सीखा जा सकता है कि अपने दरवाजे पर मदद मांगने के लिए आए अपने दुश्मन को भी कभी 'ना' नहीं चाहिए।
मौजूदा परिदृश्य में चंद्रशेखर जी
आज मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव भले रिश्तेदार हैं। पर इन दोनों प्रतिष्ठित परिवारों के बीच राजनीतिक वजहों से कभी वह घनिष्ठता नहीं आई जिसको निभाने के लिए चंद्रशेखर जी कुख्यात होने तक की जोखिम उठाने से परहेज नहीं करते थे। लालू जी बीमार हैं, चारा घोटाला मामले में अभी जमानत पर भी हैं। आप कल्पना करें कि चंद्रशेखर जी इस वक्त होते तो क्या करते?
पहला काम तो वे खुद कई बार जेल जाकर लालू जी से मिलते। दूसरा देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहते कि लालूजी को देश-विदेश जहां कहीं बेहतर स्वास्थ्य सुबिधा उपलब्ध हो, उसकी व्यवस्था करें। पर अभी तक मुलायम सिंह के पारिवारी जनों में से किसी की लालूजी से मिलने की सूचना नहीं है। हालांकि मुलायम सिंह इस वक्त खुद भी अस्वस्थ है। जब वे स्वस्थ थे, तब एक सांसद ने उन्हें सलाह दी थी कि लालू जी से इस वक्त जेल में जाकर आपको मिलना चाहिए। तब मुलायम सिंह ने लालू प्रसाद से मिलने से मना कर दिया था।
शायद मुलायम सिंह जी को इस बात का मलाल आज तक टीस रहा है कि संयुक्त मोर्चा की सरकार बनते समय लालू प्रसाद की वजह से ही वे प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए थे। चंद्रशेखर जी और आज के नेताओं में एक फर्क यह भी है कि, वे कभी राजनीतिक नफा-नुकसान की वजह से न रिश्ते बनाते थे-न तोड़ते थे।
इस मामले में वे कभी अपने परिवारीजनों की भी कोई दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं करते थे। अपने जीते जी अपने निकट परिवारजन को भी वे राजनीति में चुनाव लड़ने-लड़ाने के वे सख्त विरोधी थे। आज विपक्षी दल अक्सर इस बात का रोना रोते हैं कि सत्ता पक्ष उनकी बातें मानने के बजाय हमेशा दबा देता है। विपक्षी दलों को यह जरूर सोचना चाहिए कि चंद्रशेखर जी की राजनीतिक शख्सियत में आखिर कौन सी खूबियां थी कि वे इंदिरा गांधी जैसी मजबूत नेतृत्व के न चाहने पर राष्ट्रीय कार्यकारिणी का चुनाव जीतते रहे।
देश में आपातकाल लागू होने पर कांग्रेस में रहते हुए, इंदिरा गांधी के फैसले का विरोध करते रहे। आपातकाल के दौरान 'विनाश काले विपरीत बुद्धि' का हवाला देकर जेल जाते हैं। इंदिरा गांधी को सलाह देते हैं कि, जयप्रकाश नारायण से उन्हें बातचीत करनी चाहिए। साथ ही यह हिदायत भी देते है कि देश की अहंकारी सत्ता जब भी संतो से टकराई है, उसका अहंकार नेस्तनाबूद हुआ है, वह सत्ता से बेदखल हुई है।
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