यह नवीन फसल का भी पर्व है अतः नये आये अन्न फल का उपयोग पूजा में किया जाता है। परंपरानुसार इस पर्व के बाद से ही इनका उपयोग शुरू होता है। इस दिन नए अन्न फल देवताओं को अर्पण, पितरों को तर्पण कर कुटुंबीजनों के साथ ग्रहण का विधान है। लोग स्नान के साथ पितरों को जलांजलि, तिलांजलि देते है। वही इस अवसर पर अपने और पितरों के कल्याणार्थ दान की भी परंपरा है। कई लोग अन्न फल, पंखा और घड़ा, जलपात्र का दान करते है। इस पर्व के विधानों का सीधा संबंध ऋतु और प्रकृति से है। बात भोजन की हो तो रात्रि का भींगा भात जहां जॉन्डिस तो सहजन की सब्जी चिकन पॉक्स का
रामबाण तोड़ है। वही दही की कढ़ी पेट को शीतल रखती है। जबकि जौ सत्तू एक पौष्टिक शीतल आहार है। कच्चे आम और पुदीना की चटनी लू के थपेड़ों का देशज इलाज है। इसलिए प्रसाद रूप में देवताओं को जौ सत्तू और कच्चे आम चढ़ाते हैं। ये सभी आरोग्य कारक एवं वर्धक है। जल का छिड़काव और पौधों में पानी मौसम अनुकूल कार्य है। जबकि मिट्टी घड़ों का उपयोग इसके लाभकारी गुणों के नाते किया जाता है। यह मिट्टी एवं धूल मे सनने खेलने का भी दिन है। लोग जलाशयो मे उतर गीली मिट्टी लगाते और दूसरों पर फेकते है। शरीर पर लगे ये धूल मिट्टी प्राकृतिक चिकित्सा का एक अंग है।
वही इस स्नान खेल के बहाने सामूहिक प्रयासों से नदी तालाबों की सफाई भी हो जाती है। जुड़ शीतल और सतुआन पर्व बिन गीतों के अधूरे है। इस अवसर के लिए कई मैथिली गीत है। जबकि यूपी बिहार और नेपाल के दूसरे क्षेत्र में भक्ति और ऋतु गीतों की प्रधानता है। यहां गंगा स्नान को जाते श्रद्धालु मां गंगा के भक्ति गीत गुनगुनाते है। वहीं उत्सव के आगमन प्रतीक्षा में चैता,चैती और चैतावर जैसे ऋतु गीत गाए जाते है। कही-कही मेलों का भी चलन है। ऐसा ही एक मेला बिहार के मधुबनी मे लगता है। लौकही के इस झहुरी मेले में नेपाल के सुदूर स्थानों से भी लोग आते है। बदलते दौर में आवश्यकता है की इन लोक उत्सवों को प्रचारित किया जाए। ये प्रकृति संस्कृति संरक्षण संदेश के साथ ही सांस्कृतिक पर्यटन के भी अवसर हो सकते है।
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