ग्लोबल कार्बन उत्सर्जन में हवाई उड़ानों का योगदान दो फ़ीसदी से ज्यादा का है।
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चूंकि स्वीडिश हवाई सफ़र करने में ऊपरी पायदान पर हैं, उन्होंने पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदारी को समझते हुए अब इस ओर गंभीरता से ध्यान देना शुरू कर दिया है। इसलिए बदलते ट्रेंड के साथ यहां की कंपनियां अपनी देश-विदेश की शाखाओं से बैठक करने और ज़रूरी काम निपटाने के लिए वीडियो कांफ्रेंसिंग का सहारा ले रही हैं।
यहां की कई बड़ी कंपनियों ने यह साफ कर दिया है कि जबतक ज़रूरत बहुत ज्यादा नहीं हो कर्मचारियों को आधिकारिक कामों के लिए हवाई सफ़र करने की ज़रूरत नहीं है। कम दूरी वाले शहरों में जाने के लिए रेल को पहली प्राथमिकता दी जाए। हाईस्पीड ट्रेन से सफ़र कर देश के अंदर यात्रा को प्रोत्साहित किया जाए। हवाई यात्रा की ज़रूरत केवल दूर के सफ़र के लिए होना चाहिए। ताकि उड्डयन क्षेत्र से निकलने वाले हानिकारक गैस की मात्रा को नियंत्रित किया ज़ा सके।
आख़िर क्या संबंध है हवाई उड़ान और कार्बन डाई ऑक्साईड के बीच
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस क्षेत्र से होने वाला कार्बन उत्सर्जन पर्यावरण के लिए बड़ा ख़तरा बन चुकी है। इसलिए हवाई यात्राओं को नियंत्रित करना ज़रूरी है। कई अध्ययनों में यह दावा किया गया है कि ग्लोबल कार्बन उत्सर्जन में हवाई उड़ानों का योगदान दो फ़ीसदी से ज्यादा का है। यानी हवाई इंधन की वजह से दुनिया भर में सलाना 860 मिलियन मिट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हो रहा है।
जबकि हवाई उड़ानों की संख्या बढ़ने के कारण दिनोंदिन इसमें इज़ाफ़ा होता ही जा रहा है। पिछले दस सालों में हवाई जहाज़ से सफ़र करने वालों की संख्या भी दोगुनी हो चुकी है। इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन का अनुमान है कि 2037 तक हवाई सफ़र करने वाले यात्रियों की संख्या क़रीब सवा आठ अरब हो जाएगी। अब इतनी बड़ी आबादी को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में कार्बन उत्सर्जन भी बड़े पैमाने पर होगा। इसलिए यह ज़रूरी है कि हवाई सफ़र को नियंत्रित कर वैकल्पिक माध्यमों पर ध्यान दिया जाए।
आपको बता दूं कि यूरोप में स्वीडिश लोग सबसे ज्यादा सफ़र करते हैं। इसके पीछे कारण उनके दफ़्तर के कामकाज के अलावा घूमने का शौक़ीन होना भी है। अब जबसे हवाई सफ़र को हतोत्साहित करने की मुहिम शुरू हुई है, स्वीडन के अंदर हवाई यात्रा (डोमेस्टिक फ़्लाइट) करने वालों की संख्या में गिरावट आई है। वे इसकी जगह रेल यात्रा को अपना रहे हैं।
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