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प्राग यात्रा: लाल घपरैल की छतें और दीवार पर लटकती कार

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कल रात काफी देर से लौटा और एक अजीब- सी मुश्किल में फंस गया। - फोटो : अमर उजाला
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कल रात काफी देर से लौटा और एक अजीब- सी मुश्किल में फंस गया। अपने अपार्टमेंट में दाखिल होने का कोड भूल गया। कोड भूल क्या गया, उसे मैंने याद ही नहीं किया था। मेरे मेजबान एडम के बताते ही मैंने उसे मोबाइल फोन की नोटबुक में दर्ज कर लिया था। इस नोटबुक में प्राग की हर छोटी से छोटी सूचनाएं दर्ज करता रहता हूं। नोट्स लेता हूं। जगहों का ब्योरा, यूरोपीय मित्रों के नाम, ट्रेन या ट्राम नंबर यानी हर सूचना जो जरूरी है। और मजा देखिए मेरे फोन की बेटरी खत्म हो गई है और फोन स्वीच ऑफ।  रात के कोई डेढ बजे हैं। मैं अपार्टमेंट के सामने खड़ा हूं। अपार्टमेंट के दरवाजे पर एक न्यूमेरिकल-लॉक है।

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दिमाग तेजी से सोच रहा है कि अब रात कहां गुजारूं?
चार अंकों का दर्ज कीजिए और अपार्टमेंट का दरवाजा खुल जाएगा। लेकिन वह चार अंक क्या हैं? मैंने कई अंक ट्राई कर चुका हूं, जो मोबाइल पर दर्ज करते समय याद थे। लेकिन सब बेकार। अब कुछ याद नहीं आ रहा है। एडम का फोन नंबर भी इसी मोबाइल में दर्ज था और बंद मोबाइल का काला स्क्रीन मुझे मुंह चिढ़ा रहा है। दिमाग तेजी से सोच रहा है कि अब रात कहां गुजारूं? मेट्रो स्टेशन पर या अपार्टमेंट के करीब पुराने गिरजाघर में। और तभी एक साहब आए और उस पांच मंजिला अपार्टमेंट का कोड दर्ज करने लगे।

दरवाजा खुल गया और उनके साथ मैं भी भीतर हो गया। सच पूछिए तो वो आदमी मुझे किसी ईसा मसीह से कम नहीं लग रहा था। उन्हें धन्यवाद कहते हुए सीढ़ियों से अपनी चौथी मंजिल पर पहुंचा और जब से चाभी निकालकर अपने घर का दरवाजा खोल, बिना कपड़े बदले, अपने बिस्तर पर कटे पेड़ की तरह ढह गया। दिन भर का थका था। दिमाग में ओल्ड टाउन स्कावायर के रेस्त्रां, चर्च, गलियां घूमती रहीं और न जाने कब नींद की आगोश में डूब गया।

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मेरे कमरे की बड़ी सा खिड़की से नीचे एक हरा भरा पार्क-सा दिखता है। - फोटो : अमर उजाला
चिड़ियों की आवाद ने सुबह की नींद खोली
सुबह नींद चिड़ियों की आवाज ने खोली। मेरे कमरे की बड़ी सा खिड़की से नीचे एक हरा भरा पार्क-सा दिखता है। पार्क क्या है कोई खाली प्लॉट है जिसमें पेड़ों के झुरमुठ हैं। जिनमें फ्रैक्सिनस ओरनस के पेड़, और गुलाब जैसे कई सुगंधित पौधे हैं, जिनकी खुशबु रात भर मेरे कमरे को खुशनुमा बनाती रही। फ्रैक्सिनस ओरनस के पेड़ लंबे होते हैं जिनमें सफेद रंग के खूब सारे फूल खिलते हैं। पिछले दो दिन से सुबह की चाय इसी खिड़की पर खड़े होकर पी रहा हूं। चाय की प्याली, खिड़की पर लकड़ी के चौड़े से फ्रेम पर रखता हूं। न जाने क्यों ठंडी ताजी हवा, बाहर हरियाली और दूर दूर तक पसरी लाल खपरैल की ऊंची छतें, मैं मुझे रूक रूक कर शिमला की याद दिला रही हैं।

मैं समझ सकता हूं कि अंग्रेजों को शिमला इतना प्यार क्यों था? क्यों उन्होंने कलकत्ता की गर्मियों से आजिज आकर आखिर  हजारों मील दूर शिमला को अपनी गर्मियों की राजधानी बना ली? ऐसा इसलिए क्योंकि शिमला का मौसम उन्हें यूरोप की याद दिलाता था। अब यहां आया हूं तो सोचता हूं शिमला, भारत का प्राग है। जैसे काफी हद तक प्राग, यूरोप का शिमला। कम से कम खपरैल के लाल छतों की ऐसी समानता किसी अन्य यूरोपीय देश में नहीं मिलती।    

हर शहर की अपनी खुशबू होती है। प्राग की भी है। एक बेहोश गंध, खासकर, बारिश के बाद पूरे माहौल को एक अजीब- सी महक में घेर लेती है। यहां दूर दूर तक समुद्र नहीं जो अपनी नमकीन हवा से शहर की खुशबू को प्रभावित कर सके। हवा में ऐसी खुशबू मुझे पेरिस में कहीं नहीं मिली। वह एक व्यस्त और भीड़भाड़ वाले शहर में तब्दील होता जा रहा है। वहां की हवा में इंसानी पसीने के साथ सड़क पर दौड़ती बसों, टैक्सियों और दूसरे वाहनों के धुंए की दुर्गंध है। लेकिन प्राग अभी इसे बचा है। हर मोड़ पर यहां आपको हरियाली मिलेगी। हर बस स्टाप एक घने खुशबूदार पेड़ की छाया में होगा। जिनकी सूखी पत्तियां आपके जूतों के तले पर आकर चिपक जाएंगी।
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प्राग की एक पहचान गुलाब भी है जिसका पौधा आपको हर दूसरे घर में जरूर मिल जाएगा। - फोटो : सोशल मीडिया
वे तब तक निकलेगी नहीं जब तक आप हाथ से उन्हें बहुत प्यार से हटाएंगे नहीं। कल रात में अपने अपार्टमेंट की तरफ लौटते हुए भी चर्च के पास मैने हवाओं में ऐसी ही खुशबू महसूस की थी। तब हवाओं में गुलाब की महक थी। प्राग की एक पहचान गुलाब भी है जिसका पौधा आपको हर दूसरे घर में जरूर मिल जाएगा। बाद में मुझे मालूम चला कि इंग्लैंड की तरह चेक और स्लाविया इन दोनों गणराज्यों का राष्ट्रीय फूल गुलाब है।

चाय की चुस्की के संग मैं मोबाइल की नोटबुक खोलता हूं तो उसमें लिखा है आज का दिन 'प्राग कॉसिल' के नाम है। प्राग कॉसिल यानी प्राग का महल। आमतौर पर मेरी दिलचस्पी यूरोपीय या भारतीय महलों में कभी नहीं रही। लेकिन लोग कहते हैं कि अगर आपने 'प्राग कॉसिल' नहीं देखा तो आपकी प्राग यात्रा अधूरी मानी जाएगी। 'प्राग कॉसिल' शहर के दूसरे हिस्से में है। वाल्तेवा नदी के उस पार। पब्लिक कन्वेंस को शहर का कोई हिस्सा पन्द्रह से बीस मिनट से ज्यादा दूर नहीं। चेक लोकल कन्वेंस के एप IDOS पर देखा तो मुझे पता चला कि सात नम्बर की ट्राम सीधे द कैसल जाएगी।

गलती से  या कहें भ्रम में मैं एक स्टाप पहले उतर गया
प्राग में घूमने के लिए तीन पब्लिक कन्वेंस हैं। ट्राम, बस और सब-वे यानी मेट्रो। मेट्रो तेज है लेकिन जमीन के नीचे चलती है। उससे आपको शहर नहीं दिखता। शहर में ट्राम से घूमने का अलग मजा है। उसकी बड़ी-सी कांच की खिड़की से प्राग और भी खूबसूरत दिखता है। कहीं दूर जाना जल्दी पहुंचना हो तो आप अपनी यात्रा बांट सकते हैं। आधी दूर मेट्रो से जाएं और बाकी दूरी ट्राम से तय कर लें। मैंने प्राग घूमने के लिए तीन दिन का प्राग सिटी पास खरीद लिया है। ये सस्ता पड़ता। आप कहीं भी, कभी भी इस टिकट से शहर में आसानी से घूम सकते हैं।  इसमें आपको मोबाइल फोन एप IDOS  बहुत मदद करेगा। ये एप गजब का है जो आपको बस, ट्राम और मेट्रो तीनों का टाइम टेबिल बताता है।

ये आपकी लोकेशन दिखाएगा फिर जहां जाना हो उस स्टाप का नाम टाइप कीजिए। एप बता देगा कि जहां आप खड़े हैं वहां से आपको कौन सा साधन फौरन मिल जाएगा। किसी बस, ट्राम या मेट्रो को अगर किसी स्टाप पर 4:42 बजे आना है तो ठीक उसी समय वह आपके सामने होगा। स्टाप पर लगा इलेक्ट्रानिक नोटिस बोर्ड बता देगा कि कौन-सी नम्बर की ट्राम कितने बजे इस स्टाप पर रूकेगी। और 'प्राग कॉसिल' जाने वाली ट्राम नम्बर सात ठीक तय वक्त पर मेरे सामने खड़ी थी। मैंने ट्राम में बैठ कर जेब से प्राग का मैप निकाल लिया। ये मैप बता रहा था कि मुझे किस तरफ जाना है। और मोबाइल एप ये बता रहा था कि कौन-कौन से ट्राम स्टाप के बाद मुझे किस स्टाप पर उतरना है। गलती से  या कहें भ्रम में मैं एक स्टाप पहले उतर गया। मुझो आस पास कहीं कोई महल नहीं दिखा।

स्टाप के सामने एक संग्रहालयनुमा पुराने बंगले पर एक दिलचस्प नजारा जरूर दिखा। नजारा ये था कि उस बंगले की चहारदीवारी पर एक सफेद रंग की पुरानी कार आधी लटकी हुई थी। गेट के पास चहारदीवारी टूटी हुई थी। जिस पर शहर में होने वाली किसी फोटोग्राफ प्रदर्शनी का पोस्टर चस्पा था। मैंने समझना चाहा है कि आखिर ये माजरा है क्या? लेकिन उस बंगले का दरवाजा बंद था। मैंने स्टाप पर एक स्थानीय से पूछा कि "प्राग कॉसिल यही कहीं आसपास है शायद?" जवाब मिला- "हां बिलकुल लेकिन आप एक स्टाप पहले उतर गए हैं। आप इसी सड़क पर करीब डेढ़ किलोमीटर आगे बढ़िए, दायीं तरफ आपको महल का मुख्यद्वार मिल जाएगा।" अब और पैदल चलने की न इच्छा थी न मुझमें हिम्मत। मैंने अगली ट्राम का इंतजार करना बेहतर समझा, जो मुझे अगले स्टाप पर उतार देगी।

पैदल चलने से तौबा करने की बात सुन कर वह प्रागवासी मुस्काराया। मैंने भी मुस्कुरा के उसका साथ दिया। क्योंकि मैं जानता था कि अगली ट्राम अगले पांच मिनट में इस स्टाप पर होगी। और मैं सही थी। अगली ट्राम बस तीन मिनट में ही मेरे सामने थी। मैंने चहारदीवारी पर अटकी उस पुरानी कार को फिर देखा। और सोचने लगा कि इसके पीछे भी कोई दिलचस्प कहानी होगी। काश ये कहानी मैं खोज पाता।    

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण):  यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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