लाल किले पर प्रदर्शनकारियों ने फहराया अपना ध्वज
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- सरकार भी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती
लेकिन भारत सरकार इस मामले में अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकती है। माना कि किसान नेतृत्व ने परेड के दौरान शांति और अनुशासन बनाए रखने का वायदा किया था, फिर भी कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी किसान नेतृत्व की नहीं बल्कि सरकार की थी। इस ऐतिहासिक हादसे का पूर्वानुमान सरकार को नहीं था तो यह किसान नेतृत्व की नहीं बल्कि सरकार की इंटेलिजेंस ऐजेंसियों की विफलता थी।
सरकार की ओर से कहा गया था कि किसान आंदोलन में गड़बड़ी और अराजकता फैलाने के लिए पाकिस्तान में तीन सौ से ज्यादा ट्विटर हैंडलर सक्रिय हैं। पुलिस इस खतरे से आंदोलनकारियों को तो आगाह कर रही थी, मगर स्वयं खुफिया ऐजेंसियों सतर्क नहीं थीं। खुफिया तंत्र और सरकार का जानकर भी अनजान बनना हैरत की बात है।
- दिल्ली की कानून व्यवस्था राज्य सरकार के पास नहीं
देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के साथ ही देश की एकता और अखंडता की जिम्मेदारी सरकार की होती है और इसके लिए बाकायदा संविधान को हाजिर नाजिर कर शपथ ली जाती है। अन्य राज्यों में तो आंतरिक सुरक्षा या कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है लेकिन दिल्ली के लिए अलग से संवैधानिक व्यवस्था होने के कारण यह जिम्मेदारी केवल भारत सरकार की होती है। यह संवैधानिक व्यवस्था राजधानी क्षेत्र की अति संवेदनशील स्थिति को देखते हुए की गई है।
इस तर्क में कोई दम नहीं है कि शांति बनाए रखने का का किसान नेताओं ने वायदा किया था। क्या गृह मंत्रालय को पता नहीं था कि भीड़ का कोई चेहरा और चरित्र नहीं होता है? क्या गृह मंत्रालय को पता नहीं था कि किसानों के 40 नेताओं का समूह भी अपने आप में ही एक भीड़ है और कुंठाओं के साथ ही धार्मिक उन्माद से प्रभावित लाखों लोगों की पहले से ही उत्तेजित भीड़ को संभालना इन 40 नेताओं की भीड़ के बूते से बाहर है।
इस तर्क में भी दम नहीं कि अगर चुप नहीं रहते तो खून खराबा हो जाता। देश की आन-बान और शान से बड़ा कुछ नहीं होता। कल अगर कोई कहे कि हमें राष्ट्रपति भवन और संसद भवन को कब्जाने दो अन्यथा बहुत खून खराबा हो जाएगा, तो क्या सरकार इस डर से उत्पातियों को खुली छूट दे देगी? अगर सरकार सोचती है कि उसे झुकाने पर तुला किसान नेतृत्व इस घटनाक्रम के बाद नकारा साबित होने के साथ ही अब निस्तेज हो गया और अब आंख से आंख मिला कर वार्ता की मेज तक आने लायक भी नहीं रह गया तो यह सरकार की भूल ही होगी।
संसद भवन पर 13 दिसंबर 2001 को आतंकी हमला हो चुका है। इससे पहले 22 दिसंबर 2000 को लालकिले पर लश्कर-ए-तोइबा का हमला हो चुका था। जाहिर है कि ये अति महत्वपूर्ण इमारतें राष्ट्र विरोधियों के निशाने पर पहले से ही हैं। ऐसी स्थिति का फायदा देश के दुश्मन भी उठा सकते हैं इसलिए भी देश के नेतृत्व का 26 जनवरी के दिन की तरह बेबस, कमजोर और लाचार दिखना भी खतरनाक साबित हो सकता है।
- लाल किले पर धार्मिक निशान खतरे की घंटी
लाल किले की प्राचीर से जिस तरह एक धर्म विशेष का निशानयुक्त झंडा फहराया कर धार्मिक जयघोष किया गया वह भविष्य के लिए खतरे की घंटी है। सरकार को नहीं भूलना चाहिए कि मुश्किल से खालिस्तानी आतंकवाद पर काबू पाया जा सका था। यह सही है कि किसान आंदोलन का लाभ खालिस्तान समर्थक उठाना चाहते हैं। लेकिन किसान आंदोलन को बदनाम करने के लिए सारे किसानों को खालिस्तान समर्थक साबित करने का प्रयास भी बेहद खतरनाक हो सकता है।
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