नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों के मन में संशय है
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इसके परिणामस्वरूप बंगाल में भूमि सुधार लागू हुए। लेकिन हिंसक होने के कारण यह नक्सली आंदोलन जल्द ही देश की सहानुभूति खो बैठा। लेकिन इसने राज्य में वामपंथियों के लिए मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार की, जिसे दस साल पहले ममता बैनर्जी ने ध्वस्त किया। हालांकि देश में हिंसक नक्सलवाद अभी भी जिंदा है। इसके बाद पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसान नेता महेन्द्रसिंह टिकैत ने अस्सी और नब्बे के दशक में कई किसान आंदोलन किए।
1988 में उन्होंने 5 लाख किसानों को एक सप्ताह तक दिल्ली के बोट क्लब पर इकट्ठा कर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के लिए मुश्किल खड़ी कर दी थी। अंतत: राजीव सरकार ने आंदोलरत किसानों के 35 सूत्री चार्टर को स्वीकार किया, जिसमे किसानों को गन्ने का ज्यादा मूल्य देने, तथा बिजली पानी के बिलों में छूट जैसे बिंदु शामिल थे। लेकिन ये आंदोलन हिंसक नहीं हुए थे। कृषि कानूनो के खिलाफ जारी आंदोलन में शामिल भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश सिंह टिकैत उन्हीं के पुत्र हैं और उन पर दूसरे किसान नेताओं ने गंभीर आरोप लगाए हैं।
यह कहना गलत नहीं होगा कि महेंद्र सिंह टिकैत के आंदोलनों के बाद देश ने यह सबसे बड़ा किसान आंदोलन देखा। इसके लिए कई किसान संगठन एक छतरी तले साथ आए। जिन्हे विपक्षी दलों का समर्थन भी था। एजेंडा एक ही था, मोदी सरकार लागू तीनो कृषि कानून वापस लें, क्योंकि ये देश के किसानो के हितों के खिलाफ हैं।
बेशक, नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों के मन में संशय है, कुछ सवाल हैं, जिनके समाधानकारक उत्तर तो इन कानूनों के व्यवहार मे आने के बाद ही िमलेंगे। फिर भी सरकार की नीयत पर सवाल उठाते हुए इन कानूनों को आधार बनाकर एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया गया। यकीनन आंदोलन देश में जनमानस की बेचैनी का बेरोमीटर होते हैं। लेकिन जब कोई आंदोलन वृहद स्वरूप ले लेता है, तब उसे नियंत्रित करना और उसकी सुई सही दिशा में रख पाना टेढ़ी खीर होता है।
किसान आंदोलन को मिलने वाला समर्थन, आर्थिक मदद, लोगों की सहभागिता, मांगे मंजूर होने तक दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहने का संकल्प और सरकार को झुकाने की जिद कुछ सवालों को जन्म दे रही थी। लेकिन गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर रैली निकालने की जिद और बाद में उसके अराजकता में बदल जाने ने आंदोलन की अब तक सफलता पर पानी फेर दिया।
आंदोलन के कुछ नेता दयनीय तरीके से उपद्रवी तत्वों से हाथ जोड़ते दिखे। सरकार और पुलिस भी असहाय दिखी। आंदोलनकारी नेताओं ने इस बात पर नहीं सोचा कि लाख- दो लाख ट्रैक्टरों पर सवार लोगों में असली किसान की पहचान कैसे होगी? और किसान के भेस में अराजक तत्व घुस आए, तब क्या होगा? अगर इस रैली ने देश की राजधानी को ही बंधक बना लिया तो क्या करेंगे? इससे आंदोलन के प्रति जन सहानुभूति बढ़ेगी या जो थी, वो भी खत्म हो जाएगी?
लाख टके का सवाल यह है कि अब इस आंदोलन का भविष्य क्या है? इतनी हिंसा और उत्पात के बाद क्या सरकार किसानों को दिल्ली की सीमाओं पर फिर वैसे ही बैठने देगी? देगी तो इसका संदेश क्या जाएगा? सरकार उत्पातियों और लाल किले पर तिरंगे के बजाए दूसरा ध्वज फहराने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी? करेगी तो इसका किसानों पर क्या असर होगा? वो और भड़केंगे या फिर भड़का हुआ शोला धीरे-धीरे ठंडा होता जाएगा? सवाल कई हैं। हालांकि सरकार यह समझती है कि किसान आंदोलन को सीएए और एनआरसी विरोधी शाहीनबाग आंदोलन की तरह सीधे-सीधे साम्प्रदायिक खानो में नहीं बांटा जा सकता। ऐसा करने के कई गंभीर खतरे हैं।
लेकिन जो भी हुआ, वह नहीं होना चाहिए था। राष्ट्रीय प्रतीकों की इस तरह अवमानना अस्वीकार्य है। वो भी गणतंत्र दिवस पर। इस घटना के बाद सरकार को कड़े फैसले तो लेने ही होंगे। उधर इस हिंसा ने किसान आंदोलन में दरार डाल दी है। दो किसान संगठनों द्वारा दुखी होकर अपना आंदोलन खत्म कर दिया है। बाकी भी कितने दिन एक रहेंगे, कहना मुश्किल है।
यूं केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा कि सरकार अब भी किसानों से बातचीत के लिए तैयार है। लेकिन किसान नेता उस नैतिक ताकत और आत्मविश्वास के साथ सरकार से बात कर सकेंगे क्या, जो दो दिन पहले तक थी? किसान नेता अब भी कृषि कानून वापसी की मांग पर अड़े रहते हैं तो इसके पीछे राजनीतिक आग्रह-दुराग्रह जो भी हों, आम जनता में यही संदेश जाएगा कि आंदोलन का लक्ष्य सियासी हित साधना है न कि किसानों का हित रक्षण।
आगे का रास्ता आंदोलनकारियों के लिए ज्यादा कठिन है। कुछ लोगों का अभी भी मानना है कि गणतंत्र दिवस की हिंसा आंदोलनकारी किसानों का मनोबल नहीं तोड़ पाएगी। लेकिन इतिहास का सबक यही है कि बड़े आंदोलनों को संयम और व्यावहारिक सौदेबाजी की बुनियाद पर चलाया जाए तो सफलता की गुंजाइश ज्यादा रहती है। वरना मांगें कितनी ही जायज क्यों न हों, अगर अतिवादी और अडि़यल स्टैंड ही लिया जाएगा तो आंदोलन का पूरा महल ताश के पत्तों की माफिक ढहने का खतरा हमेशा रहता है। शाहीनबाग में हमने यही देखा था।
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