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जागरूक रहें किसान, तभी होगा कल्याण

Fri, 19 Feb 2021 10:23 AM IST
हरि वर्मा हरि वर्मा
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यदि जागरूक रहें किसान, तभी होगा कल्याण- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : pixabay
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चलिए, चलते हैं बिहार। लोकतंत्र की जननी- वैशाली। लालगंज थाना क्षेत्र में दिलावरपुर। यही है मेरा पैतृक गांव। यहीं है हमारी पैतृक जमीन। यदि जागरूक रहें किसान, तभी होगा कल्याण। पिछले साल होली के पहले की बात है। मुजफ्फरपुर शहर में होली मनाने के बाद गांव गया। आलू की खुदाई कराई। ठीक-ठाक पैदावार लेकिन उस समय भाव महज दस-बारह सौ रुपये कुंतल।

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बटाईदार ने सलाह दी, बाबू इस बार आलू का भाव तेज रहने वाला है। कोल्ड स्टोर में रखवा दीजिए। छह महीने बाद यही आलू तीन-चार हजार रुपये कुंतल बिकेगा। मैंने वहीं से बड़े भाई साहब से अनुमति मांगते हुए उनकी राय ली। पूछा- आलू कोल्ड स्टोर में रखवाने में फायदा है, रखवा दें। उनकी सलाह थी, बारह सौ रुपये कुंतल भाव, उस पर कोल्ड स्टोर खर्च, फिर उसकी लदाई-ढुलाई, गांव से पांच किमी दूर कोल्ड स्टोर। सब यदि 20-25 रुपये किलो खर्च बैठता और छह महीने बाद बेचने से 30-32 रुपये किलो दाम मिलेगा तो क्या फायदा।


फिर भाई साहब का आदेश, अपनी गाड़ी से गए हो- चार-पांच बोरा लदवा के यहां लेते आओ, घर-परिवार में खपत के लिए। दस-पंद्रह बोरा गांव (घर) में ही रखवा दो, ताकि दस-पंद्रह दिन बाद फिर कोई जाएगा तो गाड़ी में लदवा कर लेते आएगा। ज्यादा आलू खुले में रखा भी नहीं जा सकता, खराब हो जाता। बाकी का बारह सौ रुपये कुंतल जो भाव मिल रहा है, बेच दो। दो-तीन महीने तक अपने खेत के आलू दम से समूचा सामूहिक घर-परिवार चला, फिर आलू खरीदने का सिलसिला शुरू हो गया। तीस-चालीस-पचास रुपये किलो तक।
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बटाईदार का अनुमान सही निकला- इस बार भाव तेज रहने वाला है। जिस आलू को फेंकते, उसकी कीमत 80 रुपये इस दौरान मैंने उससे खेत में छोड़े जाने वाले सबसे छोटे (किर्री आलू यानी बेबी पोटैटो) एक बोरी में अलग से भरने को कहा। बटाईदार ने कहा, साहब इसका क्या करेंगे। मैंने कहा, यह मुजफ्फरपुर ही नहीं, मैं दिल्ली भी ले जाऊंगा। इसका भुजिया सबको बहुत पसंद है। उसने कहा, ऐसा आलू तो हम लोग खेत में छोड़ देते खाद के लिए या मालजाल (मवेशी) को खिला देते।

हॉट-बाजार-पैकार (साप्ताहिक मंडी या कारोबारी) इसे खरीदना तो दूर, छुएगा भी नहीं। फिर मैंने अपने मोबाइल से जाली में पैक्ड बेबी पोटैटो की इमेज दिखाई और उस पर लिखा भाव- अस्सी रुपये किलो। सब हैरान। बटाईदार के बेटे ने गांव में अपनी मां से लेकर कई महिलाओं-बुजुर्गों को मोबाइल पर बेबी पेटैटो दिखाकर कहा- साहब के ईहां दिल्ली में इहे छोटकी (किर्री) आलू सत्तर-अस्सी रुपये किलो बिकअई छई।

यकीन मानिए, उन्हें किर्री आलू का भाव समझ में आ गया। बटाईदार ने मेरी एक बोरी की फरमाइश पर ना-ना कहते हुए भी दो बोरी बेबी पोटैटो गाड़ी में जबरन लाद दिया। बाकी फ्रेश (निम्मन आलू) आलू दम वाला। गांव से मुजफ्फरपुर शहर वाले घर पहुंचा तो सभी किर्री आलू (बेबी पोटैटो) पर फिदा। भारी न हो, इसलिए हिम्मत कर अपने खेत वाला पांच-सात किलो बेबी पोटैटो दिल्ली तक लाया। अपने खेत के बेबी पोटैटो का बना गर्मागर्म भुजिया। स्वाद ही अलग। 

नए कृषि कानून से उम्मीद खेती-किसानी की जमीनी जानकारी तो नहीं लेकिन सोचता हूं कि काश! नया कृषि कानून लागू होता, तो अपना, अपने सभी परिवार-रिश्तेदार का, गांव-जवार का भला कर पाता। भले सैद्धांतिक तौर पर भाइयों में जमीन की हिस्सेदारी बाबूजी ने तय कर दी, लेकिन अलग-अलग उपज के बजाए उपज का हम सब भाई मिलकर सामूहिक उपभोग करते हैं। बाबूजी-मां के रहते उपज अच्छी होती रही।

नौकरीपेशा भाइयों की वजह से बीच का खालीपन और ज्यादातर के बाहर रहने से उचित देखभाल संभव नहीं रहा। इस वजह से बटाईदार और मैनेजर (देखभाल करने वाले) के भरोसे ही काम चलता रहा। वे दुखड़ा रोते हुए जो उपज बताते, वही सही। कभी बारिश हो गई, तो फसल खराब, कभी बारिश नहीं हुई, तो फसल खराब। हालांकि, इधर दो तीन साल से हम भाइयों ने बारी-बारी समय निकाल कर थोड़ा ध्यान देना शुरू किया तो तस्वीर थोड़ी बदली है। ... मोल तो समझा, बाजार का विकल्प नहीं धान-गेहूं के फसल चक्र को बदला।

लीची और आम के बाग लगाए। अब मिठास घुलने लगी है। इसे शुरू में ही पैकार (व्यापारी) खरीद लेता। देखभाल, छिड़काव, निगरानी की जिम्मेदारी भी उसी की। साथ में पूरे परिवार-रिश्तेदार के लिए बाजार से न खरीदने की स्थिति के लायक भरपूर फल भी। अब आइए, आलू जैसी फसल की बात करते हैॆ। यदि नए कृषि कानून के नजरिए से देखें तो इसे भी फायदेमंद बनाया जा सकता।

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इस साल भी बिहार की उपज पंजाब की मंडियों तक निजी हाथों में पहुंची...

किसानों का जगना जरूरी, कोसना हल नहीं बिहार की दुर्गति से भला कौन वाकिफ नहीं- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Getty
गांव में एक भाई अपनी जमीन का एक टुकड़ा किसी कंपनी के साथ कांट्रेक्ट कर कोल्ड स्टोर जैसे निर्माण के लिए कांट्रेक्ट फार्मिंग पर दे दें, तो संभव है कि पूरे परिवार को तीन महीने बाद खाने को आलू 40-50 रुपये तक खरीदना नहीं पड़ता। आलू 10-12 रुपये के भाव बेचने की मजबूरी भी नहीं रहती। गांव में एक कोल्ड स्टोर बन जाने से न केवल हमारे परिवार (भाइयों) का भला होता, बल्कि रिश्तेदार-गांव- जवार और आसपास के लोग भी लाभान्वित होते। अभी कोल्डस्टोरेज की दूरी और माल ढुलाई का खर्चा कम जोतदार वालों के लिए मुसीबत है।

सोचिए, जिस आलू को बटाईदार फेंक देता, उसकी उपयोगिता तो उसे समझ में आ गई लेकिन उसे बाजार नहीं मिला। गांव में आलू के सीजन में कौन किर्री आलू खरीदता लेकिन यदि किसान जागरूक रहें तो नए कृषि कानून में ऑनलाइन खरीद-बिक्री का फायदा उठाकर वह किर्री आलू (बेबी पोटैटो) फेंकने के बजाए अच्छी कीमत पर बेच सकता है। तब भी यही कंपनियां इस उपेक्षित उत्पाद को खरीदकर बेचकर मुनाफा कमाती लेकिन किसानों को भी फेंकने के बजाय दाम मिलने लगता। ... बिहार बनाम पंजाब बिहार से पंजाब चलते हैं।

वर्ष 2000 से 2004 तक वहां खुदकुशी खूब होती थी। मैं बठिंडा में अमर उजाला का मालबा प्रभारी था। बठिंडा, मुक्तसर, मानसा, संगरुर आदि जिले। अभी पंजाब के जिन 32 किसान संगठनों ने दिल्ली में आंदोलन कर रखा है, उनमें से दस किसान संगठनों के अलग-अलग समय में कभी रामपुराफूल, तलवंडी साबो, मौड़ मंडी, मानसा, बादल, मुक्तसर, संगरुर में किसानों की खुदकुशी, आढ़तिया-किसान शोषण को लेकर किसान आंदोलन और मोर्चों को देखा। कवर किया।

जिन आढ़तियों से कर्ज लेकर किसान खेती करते और कपास की फसल में सूंडी लगने के कारण कीटनाशक पी कर जान दे देते थे, उन्हीं आढ़तियों के खिलाफ किसान संगठन मोर्चा (आंदोलन) लगाते रहें। कुछ आंदोलन पवित्र रहे, कुछ में सौदेबाजी भी देखी। तब भी हमने एक तरफ किसान आंदोलन की कवरेज की तो दूसरी तरफ लुधियाना खेतीबाड़ी विश्वविद्यालय से सम्मानित होने वाले उन प्रगतिशील किसानों के गांवों-खेतों में जाकर जमीनी रिपोर्ट की, जिन्होंने चुनौतियों को अवसर में बदला।

2000 में जब संचार क्रांति आज की तरह नहीं थी, तब भी लैपटॉप-कंप्यूटर से खेती की तकनीक, हाथों में मोबाइल, पांव में प्यूमा-रिबॉक के सफेद स्पोर्ट्स शूज पहने युवा किसान किन्नू, अंगूर, मधुमक्खी व मछली पालन से लेकर कई बदलाव व प्रयोग किए। खुदकुशी के उस दौर में भी प्रगतिशील किसानों ने फसली चक्र को बदलकर खुद और इलाके के कई किसानों की किस्मत बदली। ऐसा नहीं कि ये बड़े जोतदार थे। ऐसा भी नहीं कि ये खानदानी संपन्न किसान थे। कई ने कर्ज भी ले रखा था, तो कई ने निजी आढ़तियों से सूद पर बीज-खाद।

बस, उन्होंने समय के साथ खुद को बदला। फसल चक्र में बदलाव, भंडारण, तकनीक व खेती प्रक्रिया अपनाई। ऐसा नहीं कि पंजाब से जुड़े किसान आज के आंदोलन को पहली बार वामपंथ से जोड़ कर देखा जा रहा है, अध्ययन के मुताबिक वहां का 1967 का आंदोलन तो नक्सलियों की ही देन था। पंजाब में 2000-2004 के बीच वह दौर भी देखा है, जब वारदाने (बोरियों) की खरीद से लेकर खुले और बंद गोदामों में अनाज के भंडारण तिरपाल, मंडी में खरीद की व्यवस्था सरकारी से ज्यादा निजी आढ़तिये या अकाली दल कनेक्शन वाले यूं कहें अप्रत्यक्ष तौर पर बादल या सियासी परिवारों के हाथों में रहा। ... किसानों का जगना जरूरी, कोसना हल नहीं बिहार की दुर्गति से भला कौन वाकिफ नहीं।

इस साल भी बिहार की उपज पंजाब की मंडियों तक निजी हाथों में पहुंची। बिहार से उपज खरीद कर पंजाब में खपाना बिचौलियों की बाजीगरी ही। लेकिन यह भी गौरतलब है कि उसी बिहार में नीतीश सरकार के पिछले कार्यकाल तक बागवानी को लेकर योजना चली। खेत आपकी, पौधे सरकार की ओर। अब तो वहां कृषि विश्वविद्यालय पूसा से लेकर निजी कई फर्मों की ओर से पौधरोपण की योजनाएं हैं।

निजी फर्म भी फलदार या मुनाफे के पेड़-पौधे लगाते। निगरानी उनकी टीम करती। तीन-चार साल बाद से फल। नीतीश सरकार में भी खेती के लिए सस्ती बिजली की योजना भी लोकप्रिय है। आधार और जमीन के कागज दिखाने पर 80 पैसे यूनिट बिजली बोरिंग-सिंचाई-खेती के लिए उपलब्ध। कितने किसान इस योजना से लाभान्वित हो पा रहे हैं, कितने इससे अवगत या अनभिज्ञ यह अलग विषय। खेती-किसानी के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए जगना भी जरूरी है, सिर्फ कोसना हल नहीं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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