चलिए, चलते हैं बिहार। लोकतंत्र की जननी- वैशाली। लालगंज थाना क्षेत्र में दिलावरपुर। यही है मेरा पैतृक गांव। यहीं है हमारी पैतृक जमीन। यदि जागरूक रहें किसान, तभी होगा कल्याण। पिछले साल होली के पहले की बात है। मुजफ्फरपुर शहर में होली मनाने के बाद गांव गया। आलू की खुदाई कराई। ठीक-ठाक पैदावार लेकिन उस समय भाव महज दस-बारह सौ रुपये कुंतल।
बटाईदार ने सलाह दी, बाबू इस बार आलू का भाव तेज रहने वाला है। कोल्ड स्टोर में रखवा दीजिए। छह महीने बाद यही आलू तीन-चार हजार रुपये कुंतल बिकेगा। मैंने वहीं से बड़े भाई साहब से अनुमति मांगते हुए उनकी राय ली। पूछा- आलू कोल्ड स्टोर में रखवाने में फायदा है, रखवा दें। उनकी सलाह थी, बारह सौ रुपये कुंतल भाव, उस पर कोल्ड स्टोर खर्च, फिर उसकी लदाई-ढुलाई, गांव से पांच किमी दूर कोल्ड स्टोर। सब यदि 20-25 रुपये किलो खर्च बैठता और छह महीने बाद बेचने से 30-32 रुपये किलो दाम मिलेगा तो क्या फायदा।
फिर भाई साहब का आदेश, अपनी गाड़ी से गए हो- चार-पांच बोरा लदवा के यहां लेते आओ, घर-परिवार में खपत के लिए। दस-पंद्रह बोरा गांव (घर) में ही रखवा दो, ताकि दस-पंद्रह दिन बाद फिर कोई जाएगा तो गाड़ी में लदवा कर लेते आएगा। ज्यादा आलू खुले में रखा भी नहीं जा सकता, खराब हो जाता। बाकी का बारह सौ रुपये कुंतल जो भाव मिल रहा है, बेच दो। दो-तीन महीने तक अपने खेत के आलू दम से समूचा सामूहिक घर-परिवार चला, फिर आलू खरीदने का सिलसिला शुरू हो गया। तीस-चालीस-पचास रुपये किलो तक।
बटाईदार का अनुमान सही निकला- इस बार भाव तेज रहने वाला है। जिस आलू को फेंकते, उसकी कीमत 80 रुपये इस दौरान मैंने उससे खेत में छोड़े जाने वाले सबसे छोटे (किर्री आलू यानी बेबी पोटैटो) एक बोरी में अलग से भरने को कहा। बटाईदार ने कहा, साहब इसका क्या करेंगे। मैंने कहा, यह मुजफ्फरपुर ही नहीं, मैं दिल्ली भी ले जाऊंगा। इसका भुजिया सबको बहुत पसंद है। उसने कहा, ऐसा आलू तो हम लोग खेत में छोड़ देते खाद के लिए या मालजाल (मवेशी) को खिला देते।
हॉट-बाजार-पैकार (साप्ताहिक मंडी या कारोबारी) इसे खरीदना तो दूर, छुएगा भी नहीं। फिर मैंने अपने मोबाइल से जाली में पैक्ड बेबी पोटैटो की इमेज दिखाई और उस पर लिखा भाव- अस्सी रुपये किलो। सब हैरान। बटाईदार के बेटे ने गांव में अपनी मां से लेकर कई महिलाओं-बुजुर्गों को मोबाइल पर बेबी पेटैटो दिखाकर कहा- साहब के ईहां दिल्ली में इहे छोटकी (किर्री) आलू सत्तर-अस्सी रुपये किलो बिकअई छई।
यकीन मानिए, उन्हें किर्री आलू का भाव समझ में आ गया। बटाईदार ने मेरी एक बोरी की फरमाइश पर ना-ना कहते हुए भी दो बोरी बेबी पोटैटो गाड़ी में जबरन लाद दिया। बाकी फ्रेश (निम्मन आलू) आलू दम वाला। गांव से मुजफ्फरपुर शहर वाले घर पहुंचा तो सभी किर्री आलू (बेबी पोटैटो) पर फिदा। भारी न हो, इसलिए हिम्मत कर अपने खेत वाला पांच-सात किलो बेबी पोटैटो दिल्ली तक लाया। अपने खेत के बेबी पोटैटो का बना गर्मागर्म भुजिया। स्वाद ही अलग।
नए कृषि कानून से उम्मीद खेती-किसानी की जमीनी जानकारी तो नहीं लेकिन सोचता हूं कि काश! नया कृषि कानून लागू होता, तो अपना, अपने सभी परिवार-रिश्तेदार का, गांव-जवार का भला कर पाता। भले सैद्धांतिक तौर पर भाइयों में जमीन की हिस्सेदारी बाबूजी ने तय कर दी, लेकिन अलग-अलग उपज के बजाए उपज का हम सब भाई मिलकर सामूहिक उपभोग करते हैं। बाबूजी-मां के रहते उपज अच्छी होती रही।
नौकरीपेशा भाइयों की वजह से बीच का खालीपन और ज्यादातर के बाहर रहने से उचित देखभाल संभव नहीं रहा। इस वजह से बटाईदार और मैनेजर (देखभाल करने वाले) के भरोसे ही काम चलता रहा। वे दुखड़ा रोते हुए जो उपज बताते, वही सही। कभी बारिश हो गई, तो फसल खराब, कभी बारिश नहीं हुई, तो फसल खराब। हालांकि, इधर दो तीन साल से हम भाइयों ने बारी-बारी समय निकाल कर थोड़ा ध्यान देना शुरू किया तो तस्वीर थोड़ी बदली है। ... मोल तो समझा, बाजार का विकल्प नहीं धान-गेहूं के फसल चक्र को बदला।
लीची और आम के बाग लगाए। अब मिठास घुलने लगी है। इसे शुरू में ही पैकार (व्यापारी) खरीद लेता। देखभाल, छिड़काव, निगरानी की जिम्मेदारी भी उसी की। साथ में पूरे परिवार-रिश्तेदार के लिए बाजार से न खरीदने की स्थिति के लायक भरपूर फल भी। अब आइए, आलू जैसी फसल की बात करते हैॆ। यदि नए कृषि कानून के नजरिए से देखें तो इसे भी फायदेमंद बनाया जा सकता।