किसान आंदोलन अब सरकार के गले की हड्डी बन गया है। अनिर्णय की यह स्थिति आंदोलन को हवा दे रही है। राजनीति भी खूब हो रही है। आने वाला समय बहुत महत्वपूर्ण हैं। 7 दिसंबर को किसान जत्थेबंदियों को विपक्षी व श्रमिक संगठनों का साथ मिला। सरकार भी एमएसपी की लिखित गारंटी के साथ कई मुद्दों पर नरम पड़ी, इसलिए 7 दिसंबर को किसानों को सबका साथ मिला।
8 दिसंबर को किसान जत्थेबंदियों ने भारत बंद बुलाया जिसे अब तक 18 विपक्षी राजनीतिक दलों के अलावा 10 श्रमिक संगठनों व शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का समर्थन हासिल है। 9 दिसंबर को सरकार और किसान जत्थेबंदियों के बीच फिर छठे दौर की वार्ता प्रस्तावित है। बातचीत से पहले सरकार की ओर से कई मुद्दों पर नरमी के बीच तीनों नए कृषि कानूनों को वापस न लेने के संकेत हैं।
दूसरी तरफ, किसान जत्थेबंदियां भी जिद पर अड़ी हैं कि जब तक तीनों नए कानून वापस नहीं ले लिए जाते, तब तक और मुद्दों पर बात नहीं बनने वाली। बातचीत से पहले दोनों तरफ से गतिरोध की पटकथा लिख दी गई है। कानून वापस लेने पर उधर सरकार ना कहेगी और कानून वापस लिए बगैर बाकी मुद्दों पर आगे की चर्चा से किसान जत्थेबंदियां ना करेंगी यानी नो का मतलब ‘डेडलॉक’ की ओर इशारा।
इस बीच सियासी फसलें लहलहाने की कोशिशें भी। फ्लैश बैकः किसान आंदोलन की पटकथा और अंतर्कथा के लिए फ्लैशबैक पर गौर जरूरी है। दो दशक पहले पंजाब के बठिंडा जिले के जेठुके गांव में ग्रामीण बस किराया विवाद से जुड़े दो रुपये के विवाद में जेठुके किसान आंदोलन हुआ था, तब वहां प्रकाश सिंह बादल की अकाली सरकार थी और पंजाब की निजी परिवहन व्यवस्था पर कई अकाली नेताओं की पकड़।
भारतीय किसान यूनियन एकता (उगराहा) के झंडा सिंह जेठुके की अगुवाई में न केवल सड़क जाम आंदोलन कई हफ्तों तक चला वरन जब प्रशासन ने बल प्रयोग किया तो वे रेल पटरी जा डटे। ट्रेनों का परिचालन रोक दिया गया। अंततः प्रशासनिक फायरिंग में दो आंदोलनकारियों को जान गंवानी पड़ी उसके बाद आंदोलन और बड़ा हो गया। अंततः सरकार और निजी परिवहन तंत्र को बैकफुट पर आना पड़ा।
आज भाकियू एकता उगराहा गुट के वही झंडा सिंह जेठुके अपने साथियों सिंघाड़ा सिंह व अन्य के साथ दिल्ली-एनसीआर बॉर्डर पर कृषि कानून के खिलाफ जुटे हैं। इसी तरह, करीब 32 साल पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश से महेंद्र सिंह टिकैत को दिल्ली जाने से तत्कालीन दिल्ली सरकार नहीं रोक पाई थी और किसानों ने टिकैत के नेतृत्व में बोट क्लब पर कब्जा जमा लिया था। हुक्का गुड़गड़ाने वाले महेंद्र सिंह टिकैत ने एक तरह से दिल्ली की राजीव गांधी की सरकार का हुक्का-पानी बंद कर दिया था। आज टिकैत के बेटे राकेश टिकैत भी इस किसान आंदोलन का हिस्सा हैं।
ग्राउंड जीरो पर क्या हैं हाल?
दिल्ली-एनसीआर के बॉर्डर हों या पंजाब के शहर, हालात एक जैसे हैं। पंजाब के आंदोलन स्थलों पर कंवर ग्रेवाल के खीच ले जट्टा खीच तैयारी, हुन फसलां दे फैसले किसान करुगा के गीत गाए जा रहे हैं। किसान संगठन पिंड-पिंड (गांवों) तक यह संदेश पहुंचा चुके हैं कि यह जमीन की नहीं, जमीर की लड़ाई है। वजूद की लड़ाई किसान लड़ रहे हैं, किसान संगठन और सियासी दल।
आंदोलन के चलते पिछले दो-ढ़ाई महीने से पंजाब के सभी टोल प्लाजा पर मुफ्त आवाजाही हो रही है। रेल पटरी से आंदोलनकारी किसान भले स्टेशन परिसरों के बाहर आ गए, लेकिन पंजाब में कई निजी पेट्रोल पंपों और शॉपिंग स्टोर्स में बिक्री महीनों से बंद है। इस आंदोलन में पंजाब की 32 किसान जत्थेबंदियां जुटी हैं। पंजाब के अलावा हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान से मिले समर्थन के बाद संयुक्त संघर्ष कमेटी में और किसान संगठन जुड़ते जा रहे हैं।
अभी सरकार से पांच दौर की हुई बातचीत में 40 किसान संगठनों के नुमाइंदे शामिल हो चुके हैं। भले किसानों का यह आंदोलन पूरी तरह से पंजाब के बाद आंशिक तौर पर हरियाणा, राजस्थान, यूपी के पश्चिमी हिस्से में पसर रहा है, लेकिन इस आंदोलन को विदेशों कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका, लंदन से समर्थन मिल रहा है। दरअसल, पंजाब के हर शहर या गांव का कोई न कोई (एनआरआई) विदेश से जुड़ा है।
गतिरोध की वजहें और किसानों की मांंगेंं
किसान जत्थेबंदियों के दिल्ली कूच में कृषि कानूनों के विरोध का मंसूबा तो था, लेकिन वे अपनी 30-33 मांगों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की देशभर में गारंटी के अलावा बिजली 2020, पराली-पर्यावरण कानून में एक करोड़ तक के जुर्माना प्रावधान, विवादों के एसडीएम दायरे से न्यायालयी निपटारे, मंडियों में निजी पार्टियों के प्रवेश पर नकेल जैसे 8-10 बड़े बिंदुओं पर समझौते के पक्षधर थे।