सात या आठ वर्ष पहले की बात है। किसी अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में अमेरिका-इराक के बीच हुए युद्ध से संबंधित एक हॉलीवुड की सिनेमा दिखाई गई थी, नाम था- टर्टल कैन फ्लाई। एक 14 साल की लड़की एक साल के बच्चे को जान से मारने की खातिर ऊंचे पहाड़ी पर ले जाती है, ताकी उसे धक्का दे सके। लेकिन पीछे से लड़की का भाई आ जाता है। एक बार फिर वह कोशिश करती है और बच्चे के पैर से पत्थर बांधकर उसे तालाब में फेक देती है। उस समय भी कोई उसे बचा लेता है। हालांकि फिल्म के क्लाइमेक्स में वह बच्चे को मार ही डालती है।
अगर आपने यह फिल्म नहीं देखी होगी तो सोच रहे होंगे कि आखिर क्यों वह लड़की छोटे बच्चे को मारना चाहती थी। दोनों के बीच क्या रिश्ता था? क्या वे भाई-बहन थे, अड़ोसी-पड़ोसी थे या कोई रिश्तेदार? इस सवाल का जवाब मिलता है, इंटरवल यानी मध्यांतर के बाद। दरअसल, एक साल का वह बच्चा उस 14 साल की किशोरी का बेटा होता है। वह उसे इसलिए मारना चाहती थी क्योंकि वह बच्चा अमेरिकी सैनिकों द्वारा उस इराकी बच्ची के बलात्कार की त्रासदी से पैदा हुआ था।
यह वही त्रासदीपूर्ण बलात्कार होता है, जिसमें स्त्री चाहे किसी भी आयु, वर्ग, धर्म, नस्ल या जाति की हो वह एक योनि से अधिक कुछ भी नहीं मानी जाती है। और यह वही रेप कल्चर है जो एक इंसान को वहशी बनाकर स्त्रियों पर यौन हिंसा करने की छूट देता है। आज ‘रेप कल्चर’ नामक शब्द कई कारणों से चर्चित हो रहा है, जिसका इस्तेमाल हर उस संस्था द्वारा होता है जहां स्त्री को हीन और पराधीन समझने की मानसिकता फलती-फूलती है। चाहे वह स्कूल-कॉलेज, सेना, मीडिया, कार्पोरेट जगत, साहित्य या फिर सिनेमा हो।
फिमेल बॉडी शेमिंग की परंपरा बहुत नई नहीं है। अबतक यह कुंठित किंतु संभ्रांत से दिखने वाले लोगों के भीतर ही भीतर कुलांचे मार रहा था। भले ही कानून की धाराओं और सजा के मद्देनजर लोग इसे अभिव्यक्त नहीं कर पा रहे थे, लेकिन यह गुप्त तरीके से लोगों के विभिन्न वर्चुअल या रियल इमेजिनेशन का हिस्सा होता था। अबतक यह किसी व्यक्तिगत पुरुष-महिला समूह, पार्टी या गुप्त स्थानों तक सीमित था। लेकिन इंटरनेट, जो आज हमारे घर के हर कोने में मौजूद है, वहां सोशल नेटवर्किंग के विभिन्न माध्यमों ने एक हिडेन स्पेस यानी छिपा हुआ स्थान उपलब्ध कराया है।
'ब्वायज लॉकर रूम' भी इसी तरह का एक हिडेन स्पेस है। यूं तो लॉकर रूम में लोग अपनी व्यक्तिगत और कीमती चीजें रखते हैं, लेकिन इंटरनेट के वर्चुअल हिडेन स्पेस का किशोर और युवा पीढ़ी गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। नई पीढ़ी जिन बातों को सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त नहीं कर सकती, उस प्लेजर(सुख) को भोगने के लिए लॉकर रूम जैसी जगहों पर अपनी गुप्त बातें करते हैं।
इसका कारण यह है कि स्त्री संबंधित हिंसा कानूनी अपराध की श्रेणी में आता है। उन्हें इस बात का भी डर है कि जो बातें वे लॉकर रूम में करते हैं, वह सामाजिक रूप से स्वीकृत नहीं है, बल्कि जघन्य अपराध है। इंस्टाग्राम पर दिल्ली के एक बड़े स्कूल के 16-17 वर्ष के छात्रों द्वारा बनाया गया यह लॉकर रूम कोई बहुत नई और चमत्कारी तथ्य के रूप में हमारे समक्ष प्रकट नहीं हुआ है।
बल्कि व्हाट्सएप, टिंडर और तमाम हैंगआउट ग्रुप में पुरुष अपने प्लेजर के लिए फीमेल बॉडी शेमिंग से संबंधित अश्लील बातें सालों से करते रहे हैं। नॉन वेज जोक्स, एडल्ट सेक्शुअल बातें, स्त्री शरीर पर की गई टिप्पणियां उनके कंटेंट का हिस्सा रही हैं। ऐसे सोशल ग्रुप में लोग स्त्री देह पर गुप्त तरीके से हंसते हैं, लेकिन सामूहिक दुष्कर्म जैसी योजना नहीं बनाते हैं। इन ग्रुप्स को सभी व्यस्क, अधेड़ या वृद्ध लोग अपने प्लेजर के लिए इस्तेमाल करते हैं।
ब्यायज लॉकर रूम इससे आगे की एक उत्तर-आधुनिक घटना है। यहां नई पीढ़ी के, छोटी उम्र के अवयस्क लड़के, छोटी-बड़ी उम्र की लड़कियों के सामूहिक बलात्कार की योजना बनाते हैं। यह सबसे अधिक त्रासदी से भरा और दुखद है। अपराध को हमेशा अभावहीनता से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन यहां तो सारे बच्चे पढ़े-लिखे संपन्न घरों के हैं। निर्भया केस और अपराधियों को मिली फांसी ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर किया था कि आर्थिक विपन्नता और अभाव ही अपराधियों को बलात्कार करने के लिए प्रेरित करते हैं। हैदराबाद में वेटनरी डॉक्टर के साथ हुए बलात्कार में भी ट्रक चालक और लेबर क्लास के लोगों की भूमिका थी।
अगर यह सच है तो फिर इतने संपन्न घरों के बच्चे यौन कुंठा से संबंधित अपराध क्यों करते हैं! क्या यह उत्तर-आधुनिकता और सम्पन्नता ही इन अवयस्क किशोरों को स्वच्छंद और यौन रूप से कुंठित बना रही है जो स्त्रियों को चलती-फिरती वेजाइना के रूप में देखते हैं। और उनका बलात्कार करने की वर्चुअल योजना बनाते हैं।