असफल छात्रों अगर आपसे कोई परीक्षा परिणाम के बारे में पूछे तो सिर्फ इतना ही कहना - फेल हुआ तो हुआ फर्क क्या पड़ता है। लेकिन यार ये कौन – सा कायरतापूर्ण कदम उठाते हो, परीक्षा परिणाम के जारी होते ही समाज और अपनों के भय से जान देने पर तुल जाते हो । तुमसे ऐसा कोई पाप तो किया नहीं जो समझा से भय खाते हो। जब कोई शर्मिंदगी वाला काम नहीं किया तो फिर क्यों अपनी जिंदगी को दांव पर लगाते हो ?
दर्जनों विद्यार्थी फेल होने पर अपने जीवन लीला को समाप्त कर देते हैं। ऐसे में उनके पीछे उनके माता-पिता और भाई-बहनों को सिर्फ दर्ज मिलता है, इसके सिवा और कुछ नहीं मिलता। दरअसल, हम जिस दौर में रह रहे उस दौर में शिक्षा ने व्यवसायिक रुप ले लिया है। गुरुकुल के अनुरुप शिक्षा का चलन समाप्त हो चुका है। कई बार तो बच्चों को सही मार्गदर्शन करने वाले शिक्षक तक नहीं मिलते हैं। दुकानों की तरह गली-गली स्कूल या कोचिंग संस्थान खुल रहे हैं लेकिन एक भी ऐसा संस्थान नहीं जहां पैसों का खेल न हो। ऐसे में आप समझ सकते हैं कि शिक्षा की स्थिति क्या हो सकती है। ऊपर से अभिभावक भी अपने बच्चों को सुबह से शाम तक एक ही ताना देते हैं- वो है 90 से 99 फिसदी नंबर लाओ। अगर नहीं लाये तो मेरी नाक कट जाएगी।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि असफलता ही सफलता की सीढ़ी है। दुनियाभर के प्रसिद्ध लोग शुरुआत में असफल हुए हैं।थॉमस एडीसन को तो स्कूल तक से निकाल दिया था। प्रसिद्ध साहित्यकार रबीन्द्रनाथ टैगोर भी अपने स्कूल के दिनों में फेल हुए थे। लेकिन बाद में उनकी रचनाओं पर पूरे देश ने गर्व किया। टैगोर ने लिखा- “ हर ओक का पेड़,पहले जमीन पर गिरा एक छोटा सा बीज होता है”। मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आंईस्टीन के जन्मदिन को ‘जीनियस डे’ के रूप में मनाया जाता है, लेकिन वे बचपन में मंदबुद्धि बालक समझे जाते थे। दरअसल आइंस्टाइन बचपन से डिसलेक्सिया नामक बीमारी से पीड़ित थे। इस बीमारी के कारण उन्हें अक्षरों को ठीक से पहचान पाने में बहुत मुश्किल होती थी, उनकी स्मरण शक्ति कमजोर थी साथ ही लिखने, पढ़ने व बोलने में भी उन्हें बहुत परेशानी का सामना करना पड़ता था। हालत यह थी कि वे 13 साल की उम्र तक अपने जूतों के फीते भी ठीक ढंग से नहीं बांध पाते थे। डॉक्टरों ने उन्हें मानसिक रूप से विकलांग घोषित किया हुआ था। लेकिन उन्हीं आइंस्टीन को 1921 में ‘ला ऑफ फोटोइलेक्ट्रिक इफेक्ट’ की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।