दोबारा पीएम बनें तो मोदी के सामने होंगी कई चुनौतियां
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कमजोर और बिखरा विपक्ष क्यो पिछड़ गया?
दरअसल, नतीजे जो भी आए लेकिन 2019 का यह चुनाव कई बातों के लिए जाना जाएगा। इनमें सबसे महत्वपूर्ण बात होगी बिखरा कमजोर और अपरिपक्व विपक्ष जिसका नेतृत्व अघोषित तौर पर राहुल गांधी करते रहे। सपा-बसपा बेमेल गठजोड़, ममता बनर्जी की झुंझलाहट, अरविंद केजरीवाल और उनकी तरह अलग किस्म की राजनीति करने वालों का बिल्कुल अलग-थलग पड़ जाना, कन्हैया, प्रकाश राज जैसे इक्का-दुक्का चेहरों के समर्थन में एंटी मोदी लोगों का इकट्ठा होना।
देखा जाए तो राजनीति में विपक्ष की अपनी अहमियत है और विपक्ष को ही लोकतंत्र की आवाज कहा गया है, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष अपनी ही आवाज को तलाशने में नाकाम रहा है। आने वाले 5 साल विपक्ष के लिए तो कठिन होंगे ही भारतीय राजनीति को भी नए सिरे से परिभाषित करेंगे।
दोबारा पीएम बनें तो मोदी के सामने होंगी ये चुनौतियां
यह समय, खास तौर पर मोदी के लिए विशेष महत्व का होगा यदि वे दोबारा प्रधानमंत्री बनते हैं तो। अब बात विदेश यात्राओं, फोटो सेशन और योजनाओं के नाम भर तक से नहीं चलेगी। बीते 5 साल के प्रयासों और आने वाले 5 सालों में नए बीजारोपण से ही उनका आकलन होगा।
2014 में उनसे उम्मीदें बहुत पाल ली गई थीं। समय कम था और ऐसे में काम करने के साथ-साथ उसे दिखाना भी जरूरी था, जो मोदी सरकार ने किया भी। अब जरूरत है जमीनी स्तर पर इन योजनाओं के ठीक-ठीक क्रियान्वयन की भी।
इस बीच उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की क्षेत्रीय राजनीति भी नए परिदृश्य में सामने आएगी। पूरी तरह हाशिए पर जा चुके वामपंथी, क्षेत्रीय राजनीति में बीजेपी का बैक सपोर्ट करते दिखे तो आश्चर्य नहीं होगा और सपा बसपा गठबंधन कुछ सीटें लोकसभा में लेकर आए तो विधानसभा चुनाव में भी इनके साथ लड़ने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का मन कब डोल जाए पर भी टिप्पणी नहीं की जा सकती।
खैर 2019 का महायज्ञ पूर्ण हुआ और इसमें किसे क्या फल मिला यह भी 23 को तय हो जाएगा, लेकिन 2019 से 2025 का समय भारतीय राजनीति और भारत के विकास के लिए महत्वपूर्ण होगा।
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