जर्नल जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में लू पर छपे एक शोध में बताया गया है कि तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के साथ लू का जोखिम लगभग तीन गुना बढ़ जाएगा। हालांकि यदि तापमान की वृद्धि को 1.5 डिग्री पर रोक लिया जाता है तो खतरे को आधा कम किया जा सकता है यद्यपि एक बड़ी आबादी इसके चपेट में तब भी होगी । भारत जहाँ आज भी खेती के लिए किसान, मजदूर दिन- रात खुले आसमान के नीचे मेहनत करते हैं खतरा और बढ़ जाता है।
जर्नल नेचर क्लाइमेट चेंज में छपे शोध के अनुसार दुनिया भर में गर्मी से होने वाली 37 फीसदी मौतों के लिए तापमान में होने वाली वृद्धि जिम्मेदार है।
पर्यावरण से छेड़छाड का खामयाजा भुगतना होगा
प्रकृति अपना हिसाब बराबर रखती है। प्रकृति यदि देने में समानता रखती है तो वापस लेने में भी समान व्यवहार रखेगी। बस फर्क इतना है जो सम्पन्न है वह थोड़ा समय बाद इस प्रकोप का सामना करेगा। लेकिन पर्यावरण से छेड़छाड का खामयाजा सबको भुगतना होगा।
पर्यावरण हमें चारों ओर से घेरे रहने वाला आवरण है। जो हमारी हर तरह से सुरक्षा करता है। मानव और प्रकृति का आपस में गहरा तालमेल है। यदि यह संतुलन बिगड़ता है तो यह मानव सहित अन्य जीवों को भी प्रभावित करेगा। पृथ्वी पर, उसके संसाधनों पर सबका बराबर का अधिकार है। शुद्ध जल, वायु और जंगलों पर, जानवरों और पक्षियों, कीट-पतंगों का भी उतना ही अधिकार है जितना की हमारा। लेकिन विडम्बना यह है कि हम न जंगल खाली छोड़ रहे हैं और न जमीन। शहरों में प्रदूषण की भरमार है। हम सब इससे रोज दो चार होते हैं लेकिन यदि यह सब ऐसा ही रहा तो वो दिन दूर नहीं जब गांव भी प्रदूषण की फैक्ट्री के रूप में जाने जाएगें। उत्तराखंड, हिमाचल, लद्दाख जैसे पहाडी़, हरे भरे खूबसूरत इलाकों पर नजर डालें तो वहां भी विकास ने विनाश की बिसाद बिछानी शुरू कर दी है।
जितने पेड़ लगाए जाते हैं, क्या वे पूरी तरह से सुरक्षित रह पाते हैं?
खेत-खलिहान, खुले मैदान, चारागाह, सब बड़ी-बड़ी इमारतों में तबदील होते जा रहे हैं। नदियां नाले का रूप ले रही है। दुनिया तीसरे विश्व के खतरे से निपटने की तैयारियां कर रही है। लेकिन प्रकृति के गर्भ में होती हलचल हमारी नींद गायब नहीं कर रही है। दुनिया भर के देश पर्यावरण संरक्षण एवं जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रतिवर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं। करोड़ों की तादाद में वृक्षारोपण करते है। बड़ी-बड़ी संगोंष्ठियां होती हैं, सम्मेलन होते हैं लेकिन फिर भी धरती से पेड़ नदारत होते जा रहे हैं । साल दर साल धरती सूनी होती जा रही है। जितने पेड़ लगाये जाते हैं। क्या वे पूरी तरह से सुरक्षित रह पाते हैं? क्या वे सभी पौधे बडे़ पेड़ों के रूप में तबदील हो पाते हैं? हममें से कोई यह जानने की चिंता नहीं करते।
हम पेड़ लगाने भर से अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर लेते हैं। दुनिया की सबसे मूल्यवान वस्तु ’
आक्सीजन’ पेड़ों से हमें निःशुल्क मिलती है। फिर भी हममें से ज्यादातर लोग कटते हुए जानदार पेड़ पर सवाल नहीं उठाते। हम पेड़ों की कराह को अनसुना कर देते हैं। जिसका खामियाजा एक दिन हमें ही उठाना पड़ेगा ।
पर्यावरण जो की सबसे मूल्यवान वस्तु के रूप में कुदरत ने हमको दिया है, निःशुल्क सेवा करने के लिए तत्पर है । लेकिन हम प्रकृति के इस वरदान को संरक्षित करने के लिए कितना तत्पर हैं विचारणीय है। घर की छोटी-मोटी चीजों के रखरखाव जैसे रोज पानी बचाने के लिए कोशिश, गीला- सूखा कचरे को अलग करने की कवायत, पक्षियों को दाना-पानी रखने की जिम्मेदारी, सड़क पर कचरा न फेंकने की हिदायत कितना पूरी करते हैं सोचना होगा ।
पर्यावरण संरक्षण के कार्य को सर्वोपरि प्राथमिकता की जरूरत
यकीनन दुनिया के विकसित देशों को हथियारों और तकनीक की होड़ ने अंधा- बहरा बना दिया है अन्यथा पर्यावरण संरक्षण के कार्य को सर्वोपरि प्राथमिकता दी जाती, न केवल 5 जून को ही पर्यावरण मुद्दों पर चर्चाएं हों। विकास की आधारशिला पर्यावरण संरक्षण के विश्वास के साथ रखी जाने की आवश्यकता है। हालांकि अभी भी समय रहते युद्ध स्तर पर काम किये गए तो पर्यावरण संरक्षण की मुहिम को सफल बनाया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील जनसंख्या को सहायता प्रदान करने की आवश्यकता है, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील समुदायों की सहायता करने की आवश्यकता है। सरकार और समाज को सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता है क्योंकि पर्यावरण की सुरक्षा सबकी जिम्मेदारी है।
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