अखिलेश यादव: टिकट वितरण के दौरान अखिलेश कई बार अंतिम क्षणों में टिकटों में बदलाव कर रहे थे।
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सपा की रणनीति और योजना
सपा की रणनीति को देखें तो टिकट वितरण के दौरान अखिलेश कई बार अंतिम क्षणों में टिकटों में बदलाव कर रहे थे। इससे उनकी कुछ आलोचना भी हो रही थी। लेकिन अखिलेश, कांग्रेस के साथ मिलकर अपने पीडीए फॉर्मूले को हर हाल में अमल में लाने का फैसला कर चुके थे। बिना किसी दबाव में आए उन्होंने जहां जरूरत समझी वहां पूरी छानबीन के साथ टिकटों में बदलाव किया। उन्होंने मुसलमानों की पैरवी करने के आरोपों से भी अपने दामन को बचाने की कोशिश की और हर बार की अपेक्षा इस बार सपा ने कम ही टिकट मुस्लिमों को दिए।
टिकट वितरण के उनके इस पुख्ता फॉर्मूले के साथ सरकार की नाकामी के कई ऐसे मुद्दे थे जिसने इंडिया गठबंधन का रास्ता यूपी में आसान कर दिया। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की नाराजगी और पेपरलीक जैसे मुद्दों को गठबंधन ज्यादा बेहतर तरीके से जनता के सामने रख सका। रही सही कसर चार सौ सीटें आने पर संविधान में बदलाव की आशंका ने पूरी कर दी।
विपक्ष संविधान में बदलाव की आशंका को बेहतर तरीके से जनता के सामने रख सका। इससे बसपा से खिसक रहा उसका कुछ परंपरागत दलित वोटर सपा और कांग्रेस की तरफ चला गया। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से बने माहौल को भी भाजपा वोट में बदल नहीं सकी। चुनाव के लिए जुटने वाला संघ और संगठन भी इस बार प्रभावी नहीं दिखा। इस सबने राज्य में चुनाव परिदृश्य को पूरी तरह बदलकर रख दिया और यूपी के सहारे अकेले बहुमत का सपना संजोये भाजपा का सपना पूरा नहीं हो सका।
टिकट वितरण में भी भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व अति आत्म विश्वास ने भारी लापरवाही बरती। जिस पर मन आए उसे टिकट थमा दो जैसे हालात थे। न जमीनी हकीकत का गहन आकलन और न ही हार-जीत के समीकरणों पर कोई ध्यान। टिकट वितरण से यूपी में सवर्णों खासकर ब्राह्मण-ठाकुरों में भारी नाराजगी सामने आ रही थी लेकिन इसकी पूरी तरह से अनदेखी की गई। केंद्रीय नेतृत्व ने यह मान लिया गया कि इनके पास कोई विकल्प ही नहीं है, ये तो भाजपा को ही वोट करेंगे। फीडबैक मैकेनिज्म भी भाजपा का पूरी तरह नाकाम रहा। दो-तीन बार के कई सांसदों प्रति उनके कामकाज को लेकर भारी नाराजगी थी जरूरत इन टिकटों में बदलाव की थी लेकिन वहां टिकट न बदलकर उन संसदीय सीटों के टिकटों को बदल दिया जहां भाजपा की जीत आसान थी।
पिछले चुनावों में कुछ ऐसी सीटों पर सपा की हार हुई थी, जो उसकी परंपरागत थी लेकिन हार की खास वजह कुछ और थी। जैसे फिरोजाबाद पर शिवपाल के सपा से अलग रहने से भाजपा पिछली बार जीत गई थी। लेकिन इस बार ऐसा नहीं था। ऐसी ही कई सीटें थी जिन पर विशेष रणनीति की जरूरत थी लेकिन ऐसा कोई भी प्रयास नहीं किया गया।
इस चुनाव ने यह भी साबित कर दिया है कि मुफ्त राशन और लाभकारी योजनाएं लंबे समय तक चुनाव में कारगर साबित नहीं होती है। छत्तीसगढ़, तेलांगना जैसे राज्य इसका उदाहरण रहे हैं। वहां सस्ते चावल जैसी योजनाओं के बावजूद सरकारें बदल गई थीं, और अब इस लोकसभा चुनाव में भी यह साबित हुआ है।
मुफ्त योजनाओं की वजह से देश का भारी भरकम टैक्स चुकाने वाला मध्य वर्ग भी कई बार खुद को ठगा सा महसूस करता है। उसे अपने टैक्स में राहत की उम्मीदें रहती हैं लेकिन उसे जब लंबे समय तक उसे राहत नहीं मिलती तो उसकी नाराजगी भी उदासीनता के रूप में सामने आती है। इसलिये नीतियां बनाने वाले सत्ता में बैठे लोगों को अब यह भी गहनता से सोचना होगा कि आम लोगों को राहत पहुंचाने के ऐसे कारगर उपाय किये जाएं जिससे जो सुधार हो वह भी स्थायी और व्यापक हो।
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