भारतीय राजनीति के लिए गंभीर चेतावनी है। सियासी पार्टियों और उनके नेताओं की गिरती साख अब गले की फांस बनती जा रही है। चुनाव आयोग ने 2013 में पांच विधानसभाओं के पिछले चुनाव में नोटा यानी 'नन ऑफ द एबव' मतलब 'इनमें से कोई नहीं' का विकल्प मतदान मशीनों में उपलब्ध कराया था।
कहा गया था कि इससे भारतीय राजनीति साफ सुथरी होगी और आपराधिक छवि के नेताओं को मतदाता बिना भय के नकार सकेंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा था कि मतदान के अधिकार की तरह प्रत्याशी को खारिज करने का हक भी वोटर के पास होना चाहिए। इस आदर्शवाद की आमतौर पर सराहना ही की गई थी। लेकिन इसके थोड़े समय बाद ही आयोग ने यू टर्न लिया।
चुनाव अधिकारियों को संदेश मिला कि नोटा प्रणाली का बहुत प्रचार न किया जाए। चुनाव आयोग संभवतः यह मानता था कि लोकतांत्रिक प्रणाली में यह अच्छी बात नहीं है कि एक मतदाता उम्मीदवारों के बारे में इस तरह की नकारात्मक धारणा बनाए। लेकिन अब चुनाव आयोग का रवैया कुछ अलग है। कुछ महीने पहले आयोग ने नोटा का प्रचार- प्रसार करने की सलाह दी है। चार पांच साल में आयोग के नजरिए में आया बदलाव समझ से परे है। अलबत्ता इसका दुरुपयोग राजनीतिक दलों ने तो पिछले चुनाव में ही शुरू कर दिया था।
चुनाव के बाद आए नतीजे अलग ही कहानी कहते थे। राजस्थान और मध्यप्रदेश में करीब-करीब दो फीसदी मतदाताओं ने नोटा का उपयोग किया। इनमें सबसे अधिक आदिवासी, अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित सीटों पर इस अधिकार का इस्तेमाल किया गया। चुनाव पंडितों ने इसका विश्लेषण अपने ही तर्कों से किया।
वे उस वर्ग के प्रत्याशी को विधायक बनते भी नहीं देखना चाहते थे
उन्होंने कहा कि आरक्षित क्षेत्रों में सामान्य वर्ग के मतदाताओं ने इसका प्रयोग किया। यानी वे मजबूर थे कि आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार को पसंद नहीं करते थे, लेकिन वे उस वर्ग के प्रत्याशी को विधायक बनते भी नहीं देखना चाहते थे।
इसका सबूत छत्तीसगढ़ ने अपने अंदाज में दिया। देशभर में पांच साल में नोटा का इस्तेमाल जितना विधानसभा चुनावों में हुआ, छत्तीसगढ़ उनमें अव्वल है। वहां 3.06 फीसदी नोटा वोट पड़े थे और आदिवासी बाहुल्य विधानसभा सीटों के थे। इस राज्य के बारे में भी विश्लेषकों का आकलन यही था कि आदिवासी वर्ग के उम्मीदवारों को सामान्य वर्ग के मतदाता पसंद नहीं करते।
आधार यह था कि इन वर्गों के प्रत्याशी आर्थिक रूप से बहुत मजबूत नहीं होते। विधायक बनते ही उनकी अमीरी के अनेक दरवाजे खुल जाते हैं। फिर वे सामान्य वर्ग से ढंग से बर्ताव नहीं करते और न ही उनके कामों में दिलचस्पी दिखाते हैं। उदाहरण के तौर पर सिर्फ मध्यप्रदेश की बात करें। पिछले विधानसभा चुनाव में कुल 6,43,171 वोट नोटा के खाते में गए। सबसे अधिक इस्तेमाल कांग्रेस के दिग्गज कमलनाथ के इलाके छिंदवाड़ा में हुआ।
वहां सात विधानसभा क्षेत्रों में 39,235 वोट नोटा जी को मिले। इसके अलावा बड़वानी, बैतूल, डिंडोरी, उमरिया और आलीराजपुर जिलों की कुछ सीटों पर यह संख्या चौंकाने वाली थी। कुल 17 विधानसभा सीटें ऐसी थीं, जिनमें नोटा जी ने परिणामों पर प्रहार किया था।
उनकी हार के अंतर से नोटा के वोट अधिक थे
अर्थात उन सीटों पर कांग्रेस और बीजेपी में हार- जीत के अंतर से अधिक वोट नोटा को पड़े। इनमें उस समय के शिवराज मंत्रिमंडल में तीन वरिष्ठ मंत्री -लक्ष्मीकांत शर्मा, हरिशंकर खटीक और करणसिंह वर्मा नोटा के निशाने पर आए और हार गए। उनकी हार के अंतर से नोटा के वोट अधिक थे। इसके अलावा अनेक खांटी नेता भी नोटा से हार मान गए थे।
इन चुनावों में हारते नजर आ रहे उम्मीदवार भी नोटा का उपकार मानते हुए जीत गए थे। इस बार स्थिति बेहद दिलचस्प है। लंबे समय से सत्ता संभाल रही बीजेपी के लिए व्यवस्था विरोधी वोट को संभालना टेढ़ी खीर लग रहा है।
कांग्रेस की तरह भारतीय जनता पार्टी में भी पार्टी के अंदर अनेक पार्टियां साफ साफ नजर आ रही हैं। दोनों दलों के उम्मीदवार हार से आशंकित हैं। जिन प्रत्याशियों के नाम घोषित हो चुके हैं अथवा जिन्हें खुद को टिकट मिलने का पूरा भरोसा है, वे अभी से मतदाताओं की शरण में हैं। जहां उन्हें अपनी स्थिति कमजोर लगती है, वहां वे मतदाताओं से भावुक प्रार्थना कर रहे हैं कि भले ही वे उसे वोट न दें, लेकिन उसके प्रतिद्वंद्वी को भी वोट न दें। बेशक नोटा पर ही मुहर लगा दें।
नाराज वोटर यह सोचते हैं कि वे नोटा करके भी उस उम्मीदवार का समर्थन नहीं कर रहे हैं जिससे खफा हैं और दूसरी पार्टी को तो वोट देने का सवाल ही नही है। इस दांव में अगर जीतने का अवसर हाथ लग जाए तो क्या बुराई है? तुम डाल डाल, हम पात पात वाले अंदाज में राजनेताओं ने नोटा को जीतने के लिए तुरुप का इक्का मान लिया है।
आदिवासी, अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए सुरक्षित सीटों पर अगर यह तुरुप चल गई तो चुनाव के नतीजों में उलटफेर से कोई इंकार नहीं कर सकता। ऐसे में कोई भी चुनाव आयोग क्या कर सकता है?