राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के लिए जारी 7.8 प्रतिशत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर अब अर्थशास्त्रियों के बीच तीखी बहस का विषय बन गई है। विवाद के केंद्र में पूर्व केंद्रीय वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग का यह दावा है कि पिछले वर्ष के आधार आंकड़ों में किए गए बड़े संशोधन के बिना मौजूदा तिमाही की नाममात्र वृद्धि केवल 2.6 प्रतिशत बैठती और वास्तविक वृद्धि इसके मुकाबले बेहद कम होती।
इस विवाद ने जीडीपी की गणना, आधार वर्ष में बदलाव और पुराने आंकड़ों के संशोधन जैसे जटिल सांख्यिकीय सवालों को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। एक पक्ष का कहना है कि गर्ग अलग-अलग जीडीपी शृंखलाओं के आंकड़ों की तुलना कर रहे हैं, जो तकनीकी रूप से उचित नहीं है। दूसरा पक्ष इस विवाद को राष्ट्रीय आय के आंकड़ों की पारदर्शिता और जमीनी अर्थव्यवस्था से उनके संबंध की पड़ताल का अवसर मान रहा है।
6 लाख करोड़ के अंतर से शुरू हुआ विवाद
गर्ग की आपत्ति मुख्यतः पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही के चालू मूल्यों पर जीडीपी के आधार आंकड़े को लेकर है। उनका कहना है कि पहले यह करीब 86.05 लाख करोड़ रुपये था, जबकि नई शृंखला में इसे लगभग 80 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया। इस तरह तुलना का आधार करीब छह लाख करोड़ रुपये कम हो गया।
उनकी गणना के अनुसार चालू तिमाही की लगभग 88.27 लाख करोड़ रुपये की जीडीपी की तुलना यदि पहले प्रकाशित 86.05 लाख करोड़ रुपये से की जाए तो नाममात्र वृद्धि करीब 2.6 प्रतिशत ही निकलती है। गर्ग का सवाल है कि आधार में इतनी बड़ी कमी क्यों हुई और इसका घोषित वृद्धि दर पर कितना असर पड़ा?
यहीं से विवाद की असली तकनीकी गांठ शुरू होती है। गर्ग के आलोचकों का कहना है कि 86.05 लाख करोड़ रुपये पुरानी आधार-वर्ष शृंखला का आंकड़ा है, जबकि 88.27 लाख करोड़ रुपये नई शृंखला का। इसलिए दोनों की सीधी तुलना नहीं की जा सकती।
आंकड़ों से आगे जमीनी अर्थव्यवस्था का सवाल
बहस का दूसरा पहलू ज्यादा व्यापक है। पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु जैसे अर्थशास्त्रियों का तर्क रहा है कि आधिकारिक वृद्धि दर और रोजगार, वास्तविक मजदूरी तथा उपभोग जैसे जमीनी संकेतकों के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे तो सांख्यिकीय पद्धति और संशोधनों की स्वतंत्र पड़ताल से परहेज नहीं होना चाहिए।
पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम भी भारतीय राष्ट्रीय लेखा प्रणाली में मूल्य सूचकांकों और असंगठित क्षेत्र के आकलन को लेकर पहले सवाल उठा चुके हैं। निजी कॉरपोरेट निवेश और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की स्थिति को देखते हुए ऊंची जीडीपी वृद्धि को दूसरे आर्थिक संकेतकों की कसौटी पर परखने की जरूरत बताई जाती रही है।
पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद् प्रणब सेन का भी लंबे समय से यह तर्क रहा है कि शुरुआती तिमाही अनुमान उपलब्ध सीमित आंकड़ों और संगठित क्षेत्र से प्राप्त संकेतकों पर अपेक्षाकृत अधिक निर्भर होते हैं। ऐसे में विशाल असंगठित क्षेत्र की वास्तविक स्थिति पूरी तरह पकड़ पाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
यानी गर्ग के दावे से सहमत होना अलग बात है, लेकिन विवाद ने उस पुराने सवाल को फिर सामने ला दिया है कि भारत जैसी विशाल और बड़े असंगठित क्षेत्र वाली अर्थव्यवस्था की वास्तविक गति को तिमाही जीडीपी आंकड़े कितनी सटीकता से पकड़ पाते हैं।
विरोधी पक्ष बोला- दो अलग शृंखलाओं को जोड़ना गलत
पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में भारत के कार्यकारी निदेशक कृष्णमूर्ति वी. सुब्रमण्यन ने गर्ग की गणना पर मूलभूत आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि पुरानी 2011-12 आधार वर्ष वाली शृंखला के आंकड़े की तुलना नई 2022-23 आधार वर्ष वाली शृंखला के आंकड़े से नहीं की जा सकती। आधार वर्ष बदलने के साथ उत्पादन, कीमतों और विभिन्न क्षेत्रों के भार सहित पूरी गणना पद्धति में बदलाव हो सकता है।
दूसरी आपत्ति नाममात्र और वास्तविक वृद्धि के अंतर को लेकर है। चालू मूल्यों पर जीडीपी में कीमतों का प्रभाव शामिल होता है, जबकि वास्तविक जीडीपी स्थिर मूल्यों पर आर्थिक उत्पादन में बदलाव बताने का प्रयास करती है। इसलिए केवल चालू मूल्यों के दो आंकड़ों का अनुपात निकालकर उससे वास्तविक वृद्धि का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य और भारतीय स्टेट बैंक के समूह मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष ने भी गर्ग की तुलना को तकनीकी रूप से त्रुटिपूर्ण बताया है।
उनका तर्क है कि समान नई शृंखला के पिछले वर्ष के आंकड़े से तुलना करने पर नाममात्र वृद्धि करीब 9.7 प्रतिशत रहती है और मूल्य प्रभाव हटाने के बाद वास्तविक वृद्धि करीब 7.4 प्रतिशत निकलती है, जो आधिकारिक 7.8 प्रतिशत के काफी निकट है।
आर्थिक विश्लेषक नीलकंठ मिश्रा का भी तर्क है कि आधार वर्ष बदलने पर पूरी समय-शृंखला को नए सिरे से तैयार किया जाता है। इसलिए पुरानी शृंखला के किसी एक आंकड़े को नई शृंखला के आंकड़े के साथ रखकर वृद्धि दर निकालना सांख्यिकीय रूप से सही तुलना नहीं होगी।
सरकार ने कहा- उत्पादन के संकेतक भी दे रहे मजबूती का संकेत
सांख्यिकी मंत्रालय ने भी जीडीपी अनुमान पर उठे सवालों का प्रतिवाद किया है। सरकार का कहना है कि नई शृंखला में अद्यतन प्रशासनिक आंकड़ों, कॉरपोरेट सूचनाओं और नए मूल्य सूचकांकों का इस्तेमाल किया गया है। उसके मुताबिक सीमेंट, स्टील, बिजली और वाहन जैसे वास्तविक उत्पादन तथा खपत से जुड़े कई संकेतक आर्थिक गतिविधियों में मजबूती की पुष्टि करते हैं।
मंत्रालय का यह भी कहना है कि पुराने अनुमानों में संशोधन अपने आप में असामान्य नहीं है। शुरुआती अनुमानों के समय सभी स्रोतों से अंतिम आंकड़े उपलब्ध नहीं होते और बाद में अधिक पूर्ण जानकारी मिलने पर राष्ट्रीय खातों में संशोधन किया जाता है।
असल बहस 7.8 बनाम 2.6 से कहीं बड़ी
इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यह है कि इसे केवल 7.8 और 2.6 प्रतिशत की दो परस्पर विरोधी दरों तक सीमित नहीं किया जा सकता। तकनीकी स्तर पर गर्ग की गणना पर यह गंभीर आपत्ति है कि उसमें दो अलग आधार-वर्ष शृंखलाओं के आंकड़ों को मिलाया गया है। यदि यह आपत्ति सही है तो 2.6 प्रतिशत को आधिकारिक 7.8 प्रतिशत वृद्धि दर का सीधा विकल्प मानना उचित नहीं होगा।
लेकिन इससे राष्ट्रीय आय के आंकड़ों को लेकर उठने वाले व्यापक सवाल समाप्त नहीं होते। आधार वर्ष बदलने पर पुराने आंकड़ों में इतना बड़ा परिवर्तन क्यों आया, असंगठित क्षेत्र का आकलन कितना विश्वसनीय है और तेज जीडीपी वृद्धि रोजगार, वास्तविक आय, उपभोग तथा निजी निवेश में किस हद तक दिखाई दे रही है—इन सवालों का जवाब भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इसलिए मौजूदा विवाद का निष्कर्ष केवल यह नहीं हो सकता कि कौन-सा आंकड़ा सही है। असली कसौटी यह होगी कि नई सांख्यिकीय शृंखला अपनी पद्धति और संशोधनों को कितनी पारदर्शिता से समझा पाती है और 7.8 प्रतिशत की दर्ज वृद्धि आने वाली तिमाहियों में निवेश, रोजगार, आय और घरेलू मांग में कितनी स्पष्ट दिखाई देती है।
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