आज जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) कुछ सेकंड में किसी भी सवाल का जवाब दे सकता है, तब शिक्षक की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। दुनिया भर की जानकारी मोबाइल की स्क्रीन पर उपलब्ध है। बच्चे किसी विषय को समझने के लिए किताब खोलने से पहले इंटरनेट पर खोज लेते हैं।
कई बार शिक्षक से पहले एआई से सवाल पूछते हैं। ऐसे समय में यह सोचना जरूरी है कि जब मशीन जानकारी देने में इंसान से तेज हो गई है, तब शिक्षक की जरूरत आखिर क्यों है? इसका जवाब शिक्षा के उस हिस्से में छिपा है, जिसे कोई मशीन पूरी तरह नहीं दे सकती, वो है, विवेक, संवेदना, अनुशासन, प्रेरणा और जीवन की सही दिशा।
भारत की परंपरा में गुरु का स्थान इसलिए बड़ा रहा, क्योंकि गुरु को केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं माना गया। वह शिष्य को जीवन समझने की दृष्टि देता था। गुरुकुल में शिक्षा का मतलब केवल किसी विषय की जानकारी हासिल करना नहीं था। व्यवहार, अनुशासन, जिम्मेदारी, आत्मसंयम और समाज के प्रति कर्तव्य भी शिक्षा का हिस्सा थे।
समय बदला और शिक्षा व्यवस्था भी बदली। गुरु की जगह शिक्षक या टीचर ने ले ली। आज स्कूलों में पाठ्यक्रम, परीक्षा, अंक, डिग्री और नौकरी की तैयारी शिक्षा के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। इस व्यवस्था में शिक्षक भी कई बार पाठ्यक्रम पूरा करने, परीक्षा परिणाम सुधारने और प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाने के दबाव में आ जाता है।
हालांकि, यह बदलाव केवल शिक्षक की कमजोरी नहीं है। आधुनिक शिक्षा की अपनी जरूरतें हैं। तकनीक ने सीखने के अवसरों को पहले से कहीं अधिक व्यापक बनाया है। आज गांव में बैठा कोई छात्र दुनिया के किसी भी हिस्से की शैक्षणिक सामग्री देख सकता है। वह किसी कठिन विषय को बार-बार समझ सकता है।
एआई से अपनी जरूरत के अनुसार सवाल पूछ सकता है, लेकिन इसी सुविधा ने एक नई चुनौती भी पैदा की है। जानकारी जितनी बढ़ी है, सही और गलत जानकारी में फर्क करना उतना ही मुश्किल हुआ है। यहीं शिक्षक की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
एआई जानकारी दे सकता है, लेकिन उस जानकारी को समझना, उसकी सत्यता परखना और उसका सही इस्तेमाल करना छात्र को कौन सिखाएगा? एक अच्छा शिक्षक केवल उत्तर नहीं देता, अपितु वह सवाल करना सिखाता है।
वह छात्र को किसी तथ्य को आंख बंद करके स्वीकार करने के बजाय उसके पीछे का कारण समझने के लिए प्रेरित करता है। यही क्रिटिकल थिंकिंग (समीक्षात्मक चिंतन) है, जिसकी जरूरत एआई के दौर में और बढ़ने वाली है।
एआई किसी छात्र को इतिहास की घटना के बारे में तथ्य बता सकता है, लेकिन उसके सामाजिक और मानवीय संदर्भ को समझने में शिक्षक की भूमिका अलग है। वह गणित के सवाल का सही उत्तर दे सकता है, लेकिन छात्र की गलती के पीछे की सोच को समझकर उसे सुधारने का काम शिक्षक बेहतर तरीके से कर सकता है।
मशीन पढ़ाई की योजना बना सकती है, लेकिन असफलता के बाद निराश छात्र के भीतर दोबारा कोशिश करने का विश्वास पैदा करना एक मानवीय रिश्ता है। इसलिए एआई शिक्षक का विकल्प नहीं, अपितु शिक्षक के हाथ में एक नया साधन बन सकता है।
आने वाले समय में शिक्षक का काम सूचना देने से अधिक मार्गदर्शक और मेंटर की भूमिका निभाने का होगा, लेकिन इसके साथ एक दूसरा गंभीर सवाल भी है, क्या समाज में शिक्षक का सम्मान उसी अनुपात में बढ़ रहा है, जिस अनुपात में उसकी जिम्मेदारी बढ़ रही है? जवाब बहुत उत्साहजनक नहीं है।
शिक्षा के बढ़ते व्यावसायीकरण ने शिक्षक और छात्र के रिश्ते को भी प्रभावित किया है। कई जगह शिक्षा एक सेवा और छात्र एक ग्राहक की तरह देखे जाने लगे हैं। स्कूल की रैंकिंग, फीस, परीक्षा परिणाम और ब्रांड वैल्यू की चर्चा के बीच शिक्षक के वास्तविक योगदान की चर्चा पीछे छूट जाती है।
सोशल मीडिया ने भी इस तस्वीर को बदला है। आज लोकप्रियता कई बार योग्यता का पैमाना बन जाती है। किसी शिक्षक के लाखों फॉलोवर्स होना उसकी शिक्षण क्षमता का प्रमाण नहीं है और कम फॉलोवर्स होना उसकी योग्यता को कम नहीं करता।
फिर भी शिक्षा के क्षेत्र में चमकदार प्रस्तुति और डिजिटल लोकप्रियता का असर बढ़ रहा है। इससे शिक्षक के वास्तविक योगदान का मूल्यांकन और कठिन हो जाता है। शिक्षकों पर बढ़ता गैर-शैक्षणिक बोझ भी चिंता का विषय है। खासकर सरकारी स्कूलों में शिक्षकों को पढ़ाने के अलावा आंकड़े जुटाने, सर्वे और दूसरी प्रशासनिक जिम्मेदारियों में लगाया जाता है।
इससे उनका समय कक्षा से बाहर चला जाता है। जिस शिक्षक के पास बच्चों के साथ बैठने और उनकी व्यक्तिगत जरूरत समझने का समय ही कम हो जाए, उससे बेहतर शिक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
निजी और संविदा व्यवस्था में काम करने वाले शिक्षकों की स्थिति भी अलग चिंता पैदा करती है। एक जैसा काम करने वाले शिक्षकों के वेतन, नौकरी की सुरक्षा और सुविधाओं में बड़ा अंतर दिखाई देता है। कम वेतन और असुरक्षित नौकरी का असर शिक्षक के मनोबल पर पड़ता है।
शिक्षक से बेहतर परिणाम की अपेक्षा तभी की जा सकती है, जब उसे सम्मानजनक काम का माहौल और आर्थिक सुरक्षा भी मिले। शिक्षक की भूमिका का मूल्य किसी आंकड़े से पूरी तरह नहीं मापा जा सकता। कई बार एक शिक्षक की कही हुई एक बात बच्चे की पूरी जिंदगी बदल देती है। कोई शिक्षक किसी बच्चे की छिपी प्रतिभा पहचान लेता है।
कोई असफल छात्र को यह भरोसा देता है कि एक परीक्षा में मिली हार जिंदगी की हार नहीं है। कोई शिक्षक बच्चे को किताबों से बाहर की दुनिया समझाता है। यही वह मानवीय रिश्ता है, जिसे तकनीक अभी पूरी तरह नहीं बना पाई है।
एक राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता का सबसे बड़ा आधार उसका शिक्षक है। अगर शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाला कर्मचारी बन जाएगा तो शिक्षा भी परीक्षा पास करने की व्यवस्था बनकर रह जाएगी। लेकिन अगर शिक्षक को सोच विकसित करने, सवाल पूछने, प्रयोग करने और बच्चों को समझने की स्वतंत्रता मिलेगी तो उसका असर कक्षा से बाहर भी दिखाई देगा।
एआई आने वाले वर्षों में शिक्षा को तेजी से बदलने वाला है। इसे रोकना न संभव है और न इसकी जरूरत है। जरूरत इस बात की है कि एआई का इस्तेमाल शिक्षक को कमजोर करने के बजाय मजबूत करने के लिए किया जाए।
एआई कठिन विषय समझाने, पढ़ाई की सामग्री तैयार करने और छात्रों की अलग-अलग जरूरतों के अनुसार सीखने में मदद कर सकता है, लेकिन मानवीय मार्गदर्शन, नैतिक समझ और अंतिम निर्णय की भूमिका शिक्षक के पास रहनी चाहिए।
एआई के दौर में शिक्षक की जरूरत कम नहीं होगी, अपितु उसका स्वरूप बदलेगा। मशीनें उत्तर देंगी, शिक्षक सवाल करना सिखाएगा। मशीनें जानकारी देंगी, शिक्षक विवेक देगा। मशीनें रास्ते बताएंगी, शिक्षक सही दिशा चुनने में मदद करेगा।
तकनीक कितनी भी आगे क्यों न निकल जाए, किसी बच्चे के भीतर आत्मविश्वास जगाने, उसकी क्षमता पहचानने और सही समय पर सही दिशा देने का काम एक इंसान ही सबसे बेहतर तरीके से कर सकता है। यही एआई के युग में गुरु की असली प्रासंगिकता है।
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