तो रावण ने यही तरीका चुना। अपने हाथों तो मिट नहीं पाऊंगा राम तुम्हारे सामने, मैं बड़ा पुराना रावण हो गया, तो अब तुम्हारे सामने मिटने का एक ही तरीका है कि तुम्हें दुश्मन बना लूं और फिर तुम मुझे मिटा दो। ये बात हो सकता है उसने चैतन्य मन से न सोची हो। चैतन्य मन से हो सकता है वो यही सोच रहा हो कि, "तीर मारकर राम को खत्म ही कर देता हूं।" पर चैतन्य मन के नीचे कुछ बैठा है, उसके अपने तरीके हैं, उसके अपने क्रियाकलाप हैं।
तो वो जो नीचे बैठा है, वो रावण को घसीटकर ले गया राम के पास। जाना ही तो था पास, पहुंच गया रावण। हाथ जोड़कर नहीं पहुंचा, हाथ उठाकर पहुंचा, पर पहुंच तो गया ही न? पहुंच गया राम के पास। और फिर कथा ये भी कहती है कि राम के ही हाथों उसका उद्धार भी हो गया। जब उद्धार हो गया तो बड़ा अनुग्रहित हुआ, बोला, "यही तो था, यही तो चाहिए था। तुम्हारे अलावा किसी और के हाथों मौत मिलती तो भटकते ही रहता। भला हुआ राम कि तुमने मारा।"
तो आना तो तुम्हें है ही, दोस्त बनकर नहीं आओगे तो दुश्मन बनकर आओगे। भला होगा अगर तुम दोस्त बनकर ही आ जाओ। जब सत्य दुनिया में कहीं भी हुंकार करता है तो दुनिया दो हिस्सों में बंट जाती है। तगड़ा पोलाराइजेशन (ध्रुवीकरण) होता है: कुछ समर्थक बन जाते हैं, और कुछ घोर विरोधी। उदासीन कोई नहीं रह पाता; इंडिफरेंट आप नहीं रह सकते।
ये सत्य की हुंकार का एक प्रामाणिक लक्षण है। कुछ होंगे जो बिल्कुल उसके भक्त बन जाएंगे, मित्र बन जाएंगे, साथी हो लेंगे और बाकी जितने होंगे वो आरोप लगाएंगे, वार करेंगे, दुश्मन हो लेंगे। ऐसा लगेगा कि जैसे दुनिया दो हिस्सों में बंट गई है, और ऐसा लगेगा कि जैसे वो दोनों हिस्से एक-दूसरे के विरोधी हैं और विपरीत काम कर रहे हैं।
विपरीत नहीं काम कर रहे, दोनों ही हिस्सों में एक ही काम हो रहा है। पहला हिस्सा भी जा रहा है सच के पैगम्बर की ओर। क्या बनकर? मित्र बनकर, भक्त बनकर, श्रद्धालु बनकर। और दूसरा हिस्सा भी तो जा रहा है शत्रु बनकर। जा दोनों ही रहे हैं। काम हो गया।
संत, ऋषि मुस्कुराता है। वो कहता है, "तुम्हारी मर्जी, तुम्हें जैसे आना हो तुम आओ। ये दरवाजा मित्रों के लिए है, वो दरवाजा दुश्मनों के लिए है। तुम किसी भी दरवाजे से घुसो, सामने तो मुझे ही पाओगे। तुम दरवाजा चुनो। हां, ये है कि तुम मित्रता के दरवाजे से आओगे तो तुम्हारे लिए जरा सुविधा रहेगी, तुम शत्रुता के दरवाजे से आओगे तो तुम्हें ही समस्या आएगी।"
सबके हृदय में राम
उस बेचारे की मजबूरी बस इतनी है कि रावण हो कि हनुमान हो कि विभीषण हो, हृदय में तो सबके राम ही होते हैं। हनुमान का ये है कि राम उनके हृदय में भी हैं, और राम उनके जीवन में भी हैं। रावण का ये है कि जीवन तो उसका रावण का है, और दिल उसने राम को दे रखा है। तो फिर वहां पर क्या आ जाता है? विभाजन आ जाता है, द्वंद आ जाता है। चाहते किसी और को हो, और जी किसी और के लिए रहे हो। चाहते हो राम को और जी रहे हो रावण के लिए।
इसीलिए तो हम सब बड़े मूल्यवान हैं क्योंकि हृदय सबके रामनिष्ठ हैं, हृदय सबके राममय हैं। तुम चाहो तो खुद से ही प्यार कर लो, तुम इतने प्यारे हो। हनुमान की तो कथा है कि उन्होंने दिल चीरकर दिखा दिया वहां राम बैठे हुए थे। हनुमान भर के ही नहीं बैठे थे, तुम्हारे भी बैठे हुए हैं। तुम में और हनुमान में अंतर ये है कि हनुमान के हृदय में ही नहीं, हनुमान के मन और जीवन में भी राम थे। इसीलिए हनुमान मौज में थे, आनंद मनाते थे।
तुम्हारे साथ थोड़ी दुर्घटना हो गई है। तुम्हारे हृदय में तो राम हैं, और मन में तुम खुद हो। और न सिर्फ मन में तुम खुद हो, बल्कि तुम्हारा पूरा दावा है और इरादे हैं कि हृदय को बदलकर मानेंगे, हृदय को हराकर मानेंगे। क्योंकि दोनों एक साथ नहीं चल सकते। ये भेद, ये विभाजन चल नहीं सकता। दोनों में से एक को ही बचना होगा, या तो तुम बचोगे या राम बचेंगे।
तुम्हारा इरादा यही है कि राम को हरा दें और पूरा ही कब्जा कर लें, पर तुम्हारा इरादा पूरा होगा नहीं। परिणाम तय है, मैच फिक्स्ड है। क्यों गलत सट्टा लगा रहे हो? यहां पहले ही तय कर दिया गया है कि कौन जीतेगा, तुम गलत पक्ष पर पैसा लगाकर क्यों सब गंवाना चाहते हो? एक ही तरफ लगाओ बाजी। किस तरफ? हृदय की तरफ।
मत नाहक अड़ो, मत व्यर्थ लड़ो, तुम नहीं जीतोगे। कोई नहीं जीता सत्य से, कोई नहीं जीता आत्मा से, कोई नहीं जीता हृदय से, राम से। बात व्यक्तिगत रूप से तुम्हारी भर नहीं है। समय की शुरुआत से आज तक कोई नहीं जीता, तुम ही जीत लोगे? तुम्हारी कमजोरी या दोष नहीं बताया जा रहा कि तुम हार जाओगे क्योंकि तुम निर्बल हो। तुम हारोगे इसलिए क्योंकि जीतना संभव ही नहीं है। कभी कोई नहीं जीता। और तुम अपवाद नहीं हो सकते। कोई अपवाद नहीं हो सकता।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।