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क्रूड से लेकर रक्षा मसलों तक, डोनाल्ड ट्रंप को समझने होंगे भारत के हित

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप गुस्से में हैं। इस बार उनका निशाना भारत है। पहले उन्होंने चाहा कि भारत ईरान से कूटनीतिक नाता तोड़ ले और नवंबर तक तेल आयात पूरी तरह बंद कर दे और अमेरिकी विदेश नीति का एक तरह से हिस्सा बन जाए। इसके बाद उन्होंने रूस से एस - 400 रक्षा समझौते पर एतराज जताया। अब वे चेता रहे हैं कि भारत को प्रतिबंधों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। 
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ट्रंप के ये तेवर एक लोकतान्त्रिक देश के मुखिया के तौर पर उन्हें राजनीतिक रूप से परिपक्व नहीं बनाते। वे इस तरह का व्यवहार उस देश के साथ कर रहे हैं, जिसने घनघोर मंदी के दौर में अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए अपने उपभोक्ता बाजार को खोल दिया था। भारत एक जिम्मेदार लोकतांत्रिक देश है और उसकी स्वतंत्र विदेश नीति है। यह अमेरिका की तरह विशुद्ध आर्थिक हितों से संचालित नहीं होती। सरोकारों के साथ हिंदुस्तान की विदेश नीति अपनी अलग पहचान रखती है। डोनाल्ड ट्रंप अगर यह सोच रहे हैं कि अमेरिकी स्वार्थ साधने के लिए भारत अपने हितों को कुर्बान कर देगा तो वे बड़ी गलतफहमी में हैं।

दरअसल भारत ने ईरान के साथ अपने संबंधों की फसल बरसों तक बोई है। तेल के आयात की मजबूत जमीन सिर्फ कारोबारी नहीं है। ईरान ने भारत और पाकिस्तान की तुलना में हमेशा भारत को तरजीह दी है। इंदिरा गांधी के कार्यकाल में चाबहार बंदरगाह की नींव पड़ी थी। आज यह बंदरगाह शुरू हो गया है। पाकिस्तान ने जब अपनी जमीन से भारत के मालवाहक ट्रकों को अनुमति देने से इनकार कर दिया तो अफगानिस्तान और उससे आगे अपने उत्पादों के निर्यात के लिए भारत के दरवाजे बंद हो गए थे। इसके बाद पाकिस्तान ने चीन को ग्वादर बंदरगाह की चाबी सौंप दी।
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ऐसे में कूटनीतिक और रणनीतिक कदम यही था कि ग्वादर के जवाब में चाबहार बंदरगाह बनाया जाए। चाबहार ने वास्तव में चीन और पाकिस्तान की नींदें उड़ा दी हैं। ट्रंप ने भारतीय नजरिए से अगर इसे नहीं देखा तो दक्षिण एशिया में वो एक भरोसेमंद साथी खो देंगे। क्या उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि रूस से उनके संबंध बिगड़े हुए हैं, चीन से अमेरिका की तनातनी छिपी नहीं है। क्या भारत से रिश्तों में दरार का जोखिम वह उठा सकता है। भारत की सुरक्षा चिंताओं का सम्मान उसे करना ही होगा।
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अमेरिकी दूतावास ने ट्रंप की भूल को आंशिक तौर पर सुधारने की कोशिश

हालांकि नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास ने ट्रंप की भूल को आंशिक तौर पर सुधारने की कोशिश की है। उसे एक बयान जारी करना पड़ा। इस बयान में कहा गया है कि काटसा नाम के अमेरिकी कानून की ज़द में खिलाफ भी कार्रवाई का अधिकार देता है। एक तरह से भारत ने अमेरिका को धता बता दिया है कि अपनी सुरक्षा के लिए वह हर संभव कदम उठाएगा। रूस भारत का पुराना सहयोगी है। एस - 400 के अलावा नौसैनिक फ्रिगेट तथा क्लाशिनकोव राइफलों का  सौदा भी रूस के साथ होने वाला है।अगर भारत ने अमेरिका के प्रतिबंधों के जवाब में अपनी कार्रवाई की तो अमेरिका बड़े नुकसान में रहेगा।  यह बात ट्रंप प्रशासन को समझ लेना चाहिए।
   
वैसे भी संकट के समय अमेरिका कोई भरोसेमंद साबित नहीं हुआ है। पचास के दशक में जब भारत अनाज के गंभीर संकट से गुज़र रहा था। लोगों के भूखों मरने की नौबत आ गई थी। भारत ने तब अमेरिका और रूस से मदद मांगी थी। अमेरिका अपनी संसद में चर्चा ही करता रहा और रूस ने 50 हज़ार टन अनाज तुरन्त भेज दिया था। बांग्ला देश की आज़ादी के युद्ध में अमेरिका ने पाकिस्तान का साथ देते हुए अपना परमाणु जहाजी बेड़ा भेजा था तो यह रूस ही था जो चट्टान की तरह भारत के पक्ष में खुलकर आया और अपनी परमाणु पनडुब्बियों का घेरा भारत के चारों तरफ डाल दिया था।

पोखरण में परमाणु विस्फोट के बाद भी प्रतिबंधों का नाटक हुआ था। यही नहीं, भिलाई स्टील प्लांट से लेकर कलपक्कम परमाणु बिजलीघर तक रूस के साथ एक लंबा सिलसिला है। वह पाकिस्तान को भारत के विरुद्ध उकसाता भी रहा है और अपने हथियार भी बेचता रहा है। ऐसे में अमेरिका की विश्वसनीयता कहाँ रह जाती है। दोकलम मुद्दे पर भी उसने कोई बहुत सार्थक सहायता नहीं की।

भारत के आईटी पेशेवरों पर भी लगातार ट्रंप का शासन अपना रवैय्या सख़्त करता रहा है। डोनाल्ड ट्रंप को याद होगा कि भारत के शहरों में ट्रंप टावर उनका कितना भला कर रहे हैं। भारत की विदेश नीति में कभी भी इस तरह की जवाबी कार्रवाई को हिस्सा नहीं बनाया गया है। लेकिन आर्थिक प्रतिबंध लगे तो भारत भी अपनी कार्रवाई के लिए किसी कसम से बंधा नहीं है।
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