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कुरुक्षेत्र: पांच राज्यों के चुनाव- मुद्दे ही मुद्दे किसे चुनें किसे छोड़ें

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पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है। राजनीतिक दलों में जिताऊ उम्मीदवारों के साथ ही जिताऊ मुद्दों की खोज भी शुरु हो गई है। लेकिन मुद्दों की कहीं कोई कमी नहीं है। मुद्दे इतने कि राजनीतिक दल किसे चुनें और किसे छोड़ें, उनके लिए यह एक बड़ी उलझन है।

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एक नाबालिग से बलात्कार और उसमें आरोपित एक उत्तर भारतीय मजदूर का नाम सामने आने के बाद गुजरात में उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी मजदूरों के खिलाफ स्थानीय लोगों का गुस्सा फूट पड़ा और हजारों की तादाद में उत्तर प्रदेश, बिहार के प्रवासी मजदूरों ने अपने- अपने घरों के लिए पलायन कर दिया। 

उधर सोशल मीडिया में शुरू हुए मी टू अभियान ने पहले बॉलीवुड के कई दिग्गजों को लपेटा लेकिन जल्दी ही इसकी आंच मीडिया घरानों के नामचीन लोगों से होती हुई केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर तक पहुंच गई। मी टू कैंपने में केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे का नैतिक दबाव इसलिए भी बढ़ गया है कि मीडिया और विपक्ष के अलावा सत्ताधारी भाजपा की महिला नेताओं के स्वर भी शिकायत करने वाली महिलाओं के पक्ष में उठ रहे हैं। 
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राफेल में फ्रेंच अखबार मीडिया पार्ट के नए खुलासे ने राहुल गांधी को सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला करने का एक और मौका दे दिया है। उधर तेल के बढते दामों और किसानों के असंतोष को विपक्ष चुनावी मुद्दा न बना सके इसके लिए भाजपा ने असम की तर्ज पर देश के अन्य राज्यों में भी एनआरसी बनाने के मुद्दे को गरमाना शुरु कर दिया है। 

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, भाजपा उपाध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह अपनी हर सभा में एनआरसी बनाने और रोहिंग्या व बांग्लादेशी घुसपैठियों का नाम लेकर वोटों के ध्रुवीकरण का दांव चल रहे हैं। उधर गंगा मुक्ति अभियान के योद्धा प्रो जीडी अग्रवाल स्वामी सानंद की अनशन के दौरान अस्पताल में मृत्यु ने केंद्र सरकार के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है। विपक्ष इसे सरकार की नमामि गंगे परियोजना की विफलता और संवेदनहीनता से जोड़ रहा है।

भाजपा को सबसे ज्यादा फिक्र राजस्थान की

अब पांच राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना मिजोरम के विधानसभा चुनावों में यह सारे मुद्दे गरम रहेंगे। दरअसल इन विधानसभा चुनावों में हिंन्दी पट्टी के तीन राज्यों मध्य प्रदेश में करीब 15 साल का शिवराज राज और छत्तीसगढ़ में डेढ़ दशक के रमन राज और राजस्थान में वसुंधरा शासन के पांच साल के कामकाज से ज्यादा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की अग्निपरीक्षा है। 

वैसे भी 2014 के बाद से जिनतने भी विधानसभा चुनाव हुए सब में भाजपा ने नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और उनके आक्रामक प्रचार अभियान को ही भुनाया है। भाजपा की पूरी चुनाव रणनीति आखिर में मोदी के प्रचार अभियान पर ही आकर टिक जाती है। इसलिए अब जबकि लोकसभा चुनावों में महज पांच से छह महीनों का ही वक्त शेष रह गया है, तब भाजपा की निभर्रता नरेंद्र मोदी पर और भी ज्यादा बढ़ गई है।

 हालांकि भाजपा को सबसे ज्यादा फिक्र राजस्थान की है जहां वसुधरा सरकार को लेकर सबसे ज्यादा असंतोष की खबरें जयपुर से दिल्ली तक हैं, लेकिन उसका संकट यह भी है कि पार्टी के पास वसुंधरा के अलावा कोई ऐसा चेहरा भी नहीं है जिसे आगे रखकर चुनाव मैदान में जाया जा सके। 

इसलिए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने पहल जहां यह घोषणा कर दी कि वसुंधरा राजे ही भाजपा की अगली मुख्यमंत्री की दावेदार हैं, वहीं अब उन्होंने राज्य की जनता से मोदी के नाम पर वोट देने की अपील भी शुरु कर दी है। 

इससे लगता है कि वसुंधरा के करिश्मे पर भाजपा को अब भरोसा नहीं रहा है। क्योंकि राजस्थान में कांग्रेस के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलौत की अपील लोगों में इस कदर बढ़ती जा रही है कि खुद भाजपा नेता भी मानते हैं कि अगर कांग्रेस सचिव पायलट को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दे तो भाजपा की राह आसान हो जाएगी लेकिन अगर अशोक गहलौत को  ही पार्टी ने आगे रखा तो भाजपा के लिए सत्ता वापसी मुश्किल होगी। 

इसलिए गहलौत की काट के लिए भाजपा मोदी कार्ड का ही सहारा ले रही है। मध्य प्रदेश में भाजपा को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मेहनत और सामाजिक जनाधार पर भरोसा तो है, लेकिन उससे ज्यादा पार्टी की उम्मीद इस पर टिकी है कि कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ, प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया और वरिष्ठ नेता दिग्विजिय सिंह ही एक दूसरे का खेल बिगाड़ने के चक्कर में पार्टी का ही खेल बिगाड देगे। 

हालांकि कांग्रेसी कहते हैं कि इस बार ये तीनो नेता एकजुट होकर कांग्रेस सरकार बनाने के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की एकता की असली परीक्षा टिकट बंटवारे के दौरान और उसके बाद चुनाव में होगी। राहुल गांधी अगर इनकी एकता में कामयाब रहे तो भोपाल के विधानसभा भवन में इस बार कांग्रेसी तिरंगे रंग की बहार आ सकती है।

जिस तरह 1993 में मध्य प्रदेश के ग्वालियर के डबरा सम्मेलन से बनी बड़े नेताओं अर्जुन सिंह, माधवराव सिंधिया, श्यामाचरण शुक्ला, विद्याचरण शुक्ला, कमलनाथ, मोतीलाल वोरा की एकता रंग लाई थी और कांग्रेस अपनी सरकार बनाने में कामयाब रही थी। लेकिन अगर यह एकता जमीन पर नहीं उतरी तो भाजपा फिर गुजरात जैसी कामयाबी पा सकती है। राहुल के नेतृत्व की परीक्षा की यह एक बड़ी चुनौती है। 

दिलचस्प है छ्त्तीसगढ़ की कहानी

छ्त्तीसगढ़ की कहानी सबसे दिलचस्प है। यहां पिछले तीन विधानसभा चुनावों में लगातार भाजपा और कांग्रेस के बीच मत प्रतिशत का फर्क मात्र 0.75 फीसदी का ही रहा है। लेकिन सीटों का फर्क दस का हो जाता है। कांग्रेस को भरोसा है कि जब पिछली बार अपने खराब समय में कांग्रेस अपने जनाधार को साथ में एकजुट रखने में कामयाब रही तो इस बार कोई वजह नहीं कि उसका जनाधार उससे अलग हो। 

पार्टी को लगता है कि पिछले 15 साल के रमन सरकार के कामकाज को लेकर सरकार विरोधी रुझान की वजह से भाजपा वोटों का प्रतिशत कांग्रेस से कम रहेगा और कांग्रेस अपनी सत्ता वापसी कर सकेगी। लेकिन भाजपा को अजीत जोगी और बसपा के गठबंधन के मैदान में होने से उम्मीद है कि कांग्रेस का वोट बंटेगा और भाजपा की राह आसान होगी। जबकि जोगी को लगता है कि विधानसभा त्रिशंकु होगी और वह किंग मेकर या फिर सौदा सही पटने पर किंग भी बन सकते हैं।

लेकिन जोगी के कांग्रेस से अलग होने का एक फायदा कांग्रेस को यह जरूर हो रहा था कि पिछले तीनों चुनावों में भाजपा अपने प्रचार तंत्र के जरिए यह प्रचार करती थी कि अगर कांग्रेस को बहुमत मिला तो जोगी फिर मुख्यमंत्री बन जाएंगे और इसका लाभ भाजपा को शहरी क्षेत्रों में जोगी विरोधी भावना को अपने पक्ष वोटों में बदलने की कामयाबी के रूप में मिलता था। इस बार भयादोहन का यह हथियार बेअसर हो रहा है।
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तेलंगाना में टीआरएस के सामने कड़ी चुनौती

उधर तेलंगाना में अचानक विधानसभा भंग करके चुनाव में जाने वाले तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने जो दांव चला था, उसकी काट के लिए कांग्रेस और तेलुगू देशम ने गठबंधन करके टीआरएस के सामने कड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

धुर विरोधी रहे कांग्रेस और तेलुगू देशम का यह गठबंधन अगर तेलंगाना में कामयाब हुआ तो आंध्र प्रदेश में भी जगन रेड्ड़ी की वाईएसआर कांग्रेस के मुकाबले कांग्रेस तेलुगू देशम का मजबूत गठबंधन लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों के लिए बन सकता है। जबकि पूर्वोत्तर के मिजोरम में भाजपा लड़ाई में नहीं है, लेकिन कांग्रेस के सामने मुख्य विपक्षी दल मिजो नेशनल फ्रंट के मुकाबले अपनी सरकार बचाने की चुनौती है। 

कांग्रेस के कई नेता और विधायक मिजो नेशनल फ्रंट में शामिल हो चुके हैं। लेकिन कांग्रेस को भरोसा है कि इस पूर्वोत्तर राज्य में वह दोबारा सत्ता में आ जाएगी। जबकि भाजपा की कोशिश है कि यहां से किसी भी तरह कांग्रेस सत्ता से बाहर हो जाए। ऐसा होने पर पूरे पूर्वोत्तर में कांग्रेस के पास एक भी राज्य नहीं बचेगा। क्योंकि असम और त्रिपुरा में भाजपा ने चुनाव जीतकर अपनी सरकार बनाई। अरुणाचल प्रदेश में पूरी कांग्रेस सरकार ही दलबदल करके भाजपा में शामिल हो गई।

मेघालय, सिक्किम और नगालैंड में भाजपा के सहयोगी दलों की सरकार है और मणिपुर में कांग्रेस से पीछे रहने के बावजूद भाजपा अपनी सरकार बनाने में कामयाब रही। कुल मिलाकर पांच राज्यों के चुनाव नतीजे तय करेंगे कि अगले साल अप्रैल में होने वाले लोकसभा चुनावों में देश का राजनीतिक तापमान क्या और कैसा रहेगा।
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