अमेरिका इस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता नहीं समझता कि पाकिस्तान में चीन के ग्वादर बंदरगाह के उत्तर में भारत ईरान में चाबहार बंदरगाह बनाता है तो उसके बंद होने अथवा उससे कारोबार ठप्प होने के क्या अर्थ हैं और भारत को उससे क्या नुकसान है।
इसके बाद भी वे हैरत में डालने वाला बयान देते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें काफी पसंद हैं लेकिन वे इस बात से खफा हैं कि हिंदुस्तान ने अमेरिका के साथ कभी अच्छा बरताव नहीं किया। इसलिए वे अपनी भारत यात्रा के दौरान कोई बड़ा कारोबारी करार नहीं करेंगे।
अलबत्ता दो-चार बिलियन डॉलर का कोई औसत अनुबंध किया जा सकता है। ट्रंप ने इस बयान के बहाने भारत के लोगों को बता दिया कि जब उनके देश ने अमेरिका के प्रति रूखा रवैया रखा तो उसका कारण नरेंद्र मोदी नहीं, बल्कि पुरानी कांग्रेस सरकारें थीं।
इसके अलावा यह कि नरेंद्र मोदी के रहते भारत से किसी व्यापक व्यापारिक समझौते की संभावनाएं बनी रहेंगीं। एक संकेत अमेरिका में बसे गुजरातियों के लिए भी है कि वे अपने मुल्क के साथ बिजनेस का बड़ा सपना पाल सकते हैं।
दरअसल जब डोनाल्ड ट्रंप कहते हैं कि भारत ने उनके देश के साथ कभी अच्छा सुलूक नहीं किया तो लगता है कि वे अमेरिका का इतिहास पढ़ना भूल गए हैं। यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि आजादी के बाद से ही अमेरिका का पलड़ा पाकिस्तान की ओर झुका रहा है।
कश्मीर समस्या को भारत के कलेजे की फांस बनाने का काम हरदम अमेरिका ने किया है। पाकिस्तान के फौजी तानाशाह जनरल अयूब के जमाने से ही वर्षों तक अमेरिका पाकिस्तान को खुल्लमखुल्ला मदद करता रहा है। उसने ही आठ सौ अरब रूपए का फौजी साजो सामान पाकिस्तान को साठ-पैंसठ साल पहले उपलब्ध कराया और पाकिस्तान में अपने सैनिक अड्डे की जमीन तैयार करता रहा।
यह अमेरिका ही था ,जिसने कश्मीर समस्या का अंतरराष्ट्रीयकरण होने दिया। क्या यह भुलाया जा सकता है कि पाकिस्तान के साथ 1965 और 1971 की जंग में उसने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया। इसके बाद भी डोनाल्ड ट्रंप कश्मीर समस्या सुलझाने में बार बार मध्यस्थता का प्रस्ताव देते हैं। भारत आखिर उन पर यकीन करे भी तो कैसे?
दुनिया के इस सबसे बड़े चौधरी को समझना होगा कि वर्तमान विश्व में कोई भी बड़ा देश लंबे समय तक अपने हितों की उपेक्षा नहीं कर सकता। भारत की निर्वाचित सरकार को भी इस देश के एक सौ तीस करोड़ लोगों के सामने उत्तर देना ही होगा कि किसी ऐसे देश पर वह क्यों भरोसा कर रही है, जिसका भूत और वर्तमान भारत विरोधी रहा है।
यह सत्य है कि देशों के बीच संबंध कालखंड के हिसाब से बदलते रहते हैं। अगर अमेरिका किसी पवित्र अंतरात्मा की आवाज सुनकर हिन्दुस्तान के साथ किए अतीत के अपराधों का प्रायश्चित करना भी चाहता है तो उसे समझना होगा कि पाकिस्तान अब लाइलाज मर्ज बन चुका है। इसके बाद भी वह एक डूबते जहाज की सवारी करना चाहता है तो इसके लिए आजाद है।