अब तक हम सभी ने कुत्ते और बंदर की छेड़छाड़ और दोस्ती की खबरें ही पढ़ी सुनी थीं। प्रतिशोध की बात पहली बार सामने आई।
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लावुल गांव से एक कहानी यह भी सामने आई कि कुछ कुत्तों ने बंदर के एक बच्चे को मार डाला, इसलिए अब बंदर बदला ले रहे हैं। तो क्या यह माना जाना चाहिए कि बंदर कुत्तों से प्रतिशोध ले रहे हैं? या उनके बीच यह जीवन का संघर्ष है?
यही सवाल हमने एशिया के माने जाने शोध संस्थान भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान बरेली के प्रधान वैज्ञानिक और वन्य जीव केंद्र के प्रभारी डॉ. अजीत पावड़े से पूछी। उन्होंने कहा कि जानवरों में प्रतिशोध की भावना नहीं होती है, क्योंकि उनका दिमाग इतना विकसित नहीं होता। वह कुछ तकनीकी बातें इनसानों से सीख जरूर लेते हैं, लेकिन जटिल भावनाओं को वह कॉपी नहीं कर पाते हैं।
बंदर सॉफ्ट ड्रिंक की बोतल खोलना, दरवाजे की कुंजी खोलना या फिर फ्रिज खोलकर सामान निकालना सीख जाते हैं। इसे उनके विकास के तौर पर नहीं बल्कि एक प्रैक्टिस के तौर पर देखना चाहिए। वह सिर्फ हमारी आदतों को कॉपी कर रहे होते हैं, जिसे वह देखते हैं।
डॉ. पावड़े ने एक दिलचस्प वाकिया बताया-
एक बार वह फौज के एक घोड़े का इलाज करने के लिए गए। जब वह घोड़े के पास गए तो वह प्यार से उनका हाथ चाटने लगा। उन्होंने इलाज के तौर पर उस घोड़े को एक इंजेक्शन लगाया। इसके बाद वह जब भी घोड़े के इलाज के लिए जाते, वह घोड़ा उन्हें देखते ही गुस्से से अपने बाड़े की बल्ली पर दोलत्ती मारने लगत।
डॉ. पावड़े कहते हैं, “इसे घोड़े का प्रतिशोध नहीं बल्कि प्रतिरोध कहेंगे। वह मुझसे उसे मिलने वाली तकलीफ के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर करता था।”
जानवर अपने खिलाफ होने वाले व्यवहार को कई बार पूरी जिंदगी याद रखते हैं। जब स्निफर कुत्ते के पिल्ले को ट्रेनिंग दी जाती है, तो वह किसी का दिया हुआ कुछ भी न खाएं, इसके लिए उन्हें बचपन में ही एक बड़ा सबक दे दिया जाता है। सड़क पर जाते किसी अनजान व्यक्ति को बुलाया जाता है। इसके बाद उसे पिल्ले की पसंद की कोई चीज देकर कहा जाता है कि जब पिल्ला इसे खाने के लिए अपना मुंह आगे बढ़ाए तो वह उसके मुंह पर भरपूर झापड़ रसीद करे।
इनसानों के साथ रहने वाले बंदरों के बिहैवियर में बदलाव हो रहा है, लेकिन वह जटिल भावनाएं नहीं सीख पाते हैं।
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पिल्ले के साथ ऐसा ही कई बार किया जाता है। वह जब भी वह वस्तु खाने के लिए मुंह आगे करता है, वह अजनबी उसे जोर का झापड़ रसीद करता है। इसके बाद यह झापड़ उसके लिए जीवन भर का सबक बन जाता है। वह मानने लगता है कि उसने किसी बाहरी का दिया कुछ खाने को मुंह बढ़ाया तो उसे भरपूर झापड़ खाने को मिलेगा। इस व्यवहार के बावजूद वह पिल्ला बड़ा होने पर किसी भी अजनबी से प्रतिशोध लेने के बारे में नहीं सोच पाता है।
मेरे एक पत्रकार मित्र अपनी बाईपास सर्जरी करा कर लौटे थे। उन्हें डॉक्टर ने सुबह के वक्त थोड़ा सा चलने के लिए बताया था। गर्मियों की एक सुबह वह घर से बाहर टहलने के लिए निकले तो एक बंदर उनका पैर पकड़ कर बैठ गया। सर्जरी की वजह से वह कुछ कर भी नहीं पा रहे थे। इसके बाद उनका बेटा चना लेकर आया और पास में बिखेर दिए। बंदर पैर छोड़कर चला गया। इसी तरह से मथुरा के बंदर चश्मा या मोबाइल लेकर भाग जाते हैं। बाद में खाने का सामान दिए जाने पर वह सामान छोड़ देते हैं। यह बातें बताती हैं कि इनसानों के साथ रहने वाले बंदरों के बिहैवियर में बदलाव हो रहा है, लेकिन वह जटिल भावनाएं नहीं सीख पाते हैं।
डॉ. हरि सिंह गौर सागर केंद्रीय विश्वविद्यालय की कुलपति और एनिमल साइंस की प्रोफेसर नीलिमा गुप्ता बंदरों के प्रतिशोध की बात पर कहती हैं-
जानवरों में कम्यूनल फीलिंग्स पाई जाती हैं, लेकिन यह रिवेंज नहीं है। उन्होंने कहा, “जानवर इनसान की तरह नहीं सोचते हैं। बंदरों में पैरेंटल केयर बहुत ज्यादा होती है। वह इसे टालरेट नहीं करते।”
उन्होंने महाराष्ट्र के लावुल गांव की घटना के बारे में कहा कि वहां के बंदरों का व्यवहार को सुरक्षा के नजरिए से देखा जाना चाहिए। सुरक्षा की यह भावना उनमें कुदरती तौर पर पाई जाती है। अगर किसी कार से कोई बंदर कुचल जाता है तो वह हर कार पर हमला करने लगते हैं, क्योंकि इससे उन्हें खुद के लिए खतरा महसूस होता है। यह प्रतिशोध नहीं, बल्कि सुरक्षात्मक व्यवहार है।
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