देश में बहुत सी महिलाएं हैं जो तलाक लेना तो चाहती हैं, मगर उनके हालात ऐसे नहीं हैं।
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तलाक लेना चाहती हैं लेकिन
दरअसल, हमारे देश में बहुत सी महिलाएं हैं जो तलाक लेना तो चाहती हैं, मगर उनके हालात ऐसा नहीं है कि वो अकेले अपने और अपने बच्चों की परवरिश कर पाएं। हमारे समाज में आज भी अकेली, तलाकशुदा औरतों को इज्ज़त की निगाह से नहीं देखा जाता। चंद महिलाएं ज़रूर हिम्मत दिखाते हुए घुटनभरे रिश्ते से आज़ादी पा लेती हैं, मगर उनके लिए भी यह सब आसान नहीं होता। तलाक के बाद आसपड़ोस के लोगों की चुभती निगाहें और हजारों सवालों का जवाब देना पड़ता है।
कुल मिलाकर बच्चों की परवरिश, समाज का डर, आत्मनिर्भर न होना, अकेले जिंदगी बिताने का आत्मविश्वास न होना ही महिलाओं को ऐसी शादी निभाने के लिए मजबूर करता है जिसमें प्यार और सम्मान जैसी कोई चीज़ नहीं बची होती। वे घुट- घुटकर जीने को मजबूर होती हैं। भारत में ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में महिलाएं ऐसी ही परिस्थितियों में जीने को मजबूर हैं।
मीनल को यदि एक प्रतीक के तौर पर भी देखा जाए तो भारत में विवाहित स्त्रियों की सामाजिक स्थिति अच्छी नहीं है। अच्छी भी है तो सम्मानजक नहीं है। उनके पास घर-परिवार की जिम्मेदारियों के बीच वो स्वतंत्रता नहीं है जो एक मनुष्य के रूप में उन्हें मिलना चाहिए। बाहर आने-जाने की इजाजत, इच्छा से पहनने और ओढ़ने की आजादी, शिक्षा का अभाव और भावनात्मक रूप से उपेक्षा की वजह से भी शादी के बाद ससुराल और पति से परेशान महिलाएं तलाक नहीं ले पातीं।
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