राजनीति में स्थाई मित्र या स्थाई शत्रु जैसी कोई चीज नहीं होती। यहां परिस्थितियां, जनमत और सत्ता का समीकरण इतनी तेजी से बदलते हैं कि कल तक अजेय दिखने वाला राजनीतिक दल भी कुछ समय बाद अस्तित्व के संकट से जूझता नजर आ सकता है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में हाल के दिनों में आया अभूतपूर्व घटनाक्रम इसी अनिश्चितता की एक बड़ी मिसाल बनकर सामने आया है। चुनावी परिणामों के बाद जिस तेजी से तृणमूल कांग्रेस का संसदीय ढांचा दरका और उसके कई सांसदों ने एक नए राजनीतिक मंच का रुख किया, उसने केवल पश्चिम बंगाल की राजनीति को ही नहीं झकझोरा, बल्कि देश में दलबदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता और उसकी सीमाओं पर भी नए सिरे से बहस छेड़ दी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या निर्वाचित प्रतिनिधियों के सामूहिक रूप से दल बदल लेने को केवल कानूनी प्रक्रिया मान लिया जाए या इसके नैतिक पहलुओं पर भी गंभीर चर्चा होनी चाहिए? आखिर जनता ने वोट किसी व्यक्ति को दिया था, किसी विचारधारा को या उस राजनीतिक दल को जिसके प्रतीक और नेतृत्व के आधार पर चुनाव लड़ा गया था?
पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक चर्चा उस नई राजनीतिक इकाई 'नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' की हो रही है, जिसके बारे में आम राजनीतिक विमर्श में पहले बहुत कम जानकारी थी। पार्टी के सोशल मीडिया अकाउंट्स भी 14 जून को सक्रिय हुए हैं, जिन पर तृणमूल कांग्रेस से आए सांसदों का स्वागत किया गया है। ये सांसद अब मोदी सरकार को बाहर से सशर्त समर्थन देंगे।
इन सांसदों में कई सांसद तो ऐसे हैं, जो पानी पी-पीकर रोज भाजपा नेतृत्व को कोसते थे। अचानक इस मंच पर कई सांसदों का एक साथ आ जाना स्वाभाविक रूप से अनेक सवाल खड़े करता है। क्या यह वास्तव में एक नई राजनीतिक विचारधारा की शुरुआत है या फिर केवल दलबदल विरोधी कानून की सीमाओं के भीतर रहते हुए राजनीतिक अस्तित्व बचाने की एक रणनीति?
क्या जनता ऐसे नए राजनीतिक प्रयोग को स्वीकार करेगी या इसे केवल सत्ता की बदलती दिशा के साथ खुद को जोड़ने की कोशिश के रूप में देखेगी?
कार्यकर्ता, संगठन और विचार से बनता है राजनीतिक दल
भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि केवल नेताओं का समूह किसी दल को जनाधार नहीं दिला सकता। किसी राजनीतिक दल की वास्तविक शक्ति उसके कार्यकर्ताओं, संगठन, विचार और जनता से उसके संबंधों में निहित होती है। यही कारण है कि कई बड़े राजनीतिक प्रयोग शुरुआत में चर्चा का विषय तो बने, लेकिन समय की कसौटी पर टिक नहीं सके।
भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे दलबदल विरोधी कानून कहा जाता है, 1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से लागू की गई थी। इसका उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता और अवसरवादी दलबदल पर रोक लगाना था। बाद में 91वें संविधान संशोधन के जरिए यह व्यवस्था की गई कि यदि किसी विधायी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरे दल में विलय का निर्णय लेते हैं तो उसे दलबदल नहीं माना जाएगा और उनकी सदस्यता सुरक्षित रह सकती है।
यही वह कानूनी प्रावधान है, जो ऐसे मामलों में सबसे अधिक विवाद का कारण बनता है। कानून यह अनुमति देता है, लेकिन क्या यह व्यवस्था मतदाता की मूल भावना के अनुरूप है? क्या दो-तिहाई सदस्यों के एक साथ चले जाने से जनता का जनादेश भी स्वतः स्थानांतरित माना जा सकता है?
शायद यही वह प्रश्न है जिस पर भविष्य में संसद और न्यायपालिका दोनों को व्यापक विमर्श करना पड़ सकता है।
पश्चिम बंगाल में अब क्या?
भारतीय राजनीति में गोवा, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के कई उदाहरण बताते हैं कि बड़े राजनीतिक दल भी टूटे हैं और नए राजनीतिक समीकरण बने हैं, लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि राजनीति में कोई भी शून्य हमेशा के लिए नहीं रहता। पश्चिम बंगाल ने पिछले पांच दशकों में कई बड़े परिवर्तन देखे हैं। कभी कांग्रेस प्रमुख शक्ति थी, फिर वामपंथ का लंबा दौर आया, उसके बाद तृणमूल कांग्रेस का उदय हुआ। यह इतिहास संकेत देता है कि जनता अंततः नए विकल्प भी तैयार कर सकती है।
इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि पश्चिम बंगाल में विपक्ष की राजनीति हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी। हालांकि, यह जरूर कहा जा सकता है कि यदि तृणमूल कांग्रेस अपने संगठन और जनाधार को पुनर्जीवित नहीं कर पाती तो राज्य की राजनीति में एक बड़ा रिक्त स्थान पैदा हो सकता है, जिसे भरने के लिए नई राजनीतिक शक्तियां सामने आएंगी।
पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर भारतीय लोकतंत्र के सामने एक मूल प्रश्न खड़ा कर दिया है, क्या दलबदल विरोधी कानून का वर्तमान स्वरूप जनता की राजनीतिक इच्छाओं की पूरी तरह रक्षा कर पा रहा है? कानूनी रूप से दो-तिहाई सदस्यों का विलय वैध माना जा सकता है, लेकिन लोकतंत्र केवल कानूनी प्रावधानों से नहीं चलता, बल्कि जनता के विश्वास और राजनीतिक नैतिकता से भी संचालित होता है।
पश्चिम बंगाल में जो कुछ घटित हुआ है, उसका वास्तविक फैसला न केवल विधानसभा या संसद के भीतर होगा, बल्कि आने वाले चुनावों में जनता के बीच भी होगा। जनता यह तय करेगी कि यह परिवर्तन राजनीतिक आवश्यकता था, अवसरवाद था या फिर राज्य की राजनीति में किसी नए अध्याय की शुरुआत।
पश्चिम बंगाल का यह राजनीतिक भूचाल केवल एक दल के टूटने या नए दल के बनने की कहानी नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र के उस जटिल प्रश्न की ओर संकेत करता है, जहां कानून और नैतिकता कई बार एक-दूसरे के समानांतर खड़े दिखाई देते हैं।
सत्ता परिवर्तन लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती इस बात से तय होती है कि वहां सत्ता के सामने एक सक्षम, सक्रिय और वैचारिक विपक्ष मौजूद है या नहीं। पश्चिम बंगाल की राजनीति आज जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां सबसे बड़ा प्रश्न किसी एक दल का भविष्य नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन का भविष्य है।
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