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देव दीपावली के बहाने हिंदू परंपराएं और डिजिटल विज्ञापन: ऑनलाइन दीपदान का ऑफर कितना उचित?

सार

समय के साथ कुछेक मंदिर सेवाओं के ऑन लाइन होने में कोई बुराई नहीं है। दैनंदिनी पूजा,अभिषेक से लेकर उत्सव विशेष पर इसके माध्यम से भक्तों को श्रद्धा निवेदन का अवसर उपलब्ध कराया जा सकता है। मसलन प्रसाद, श्रृंगार, पुष्प इत्यादि अर्पण की सुविधा ऑन लाइन की जा सकती है। किंतु एक बार धर्म परंपराओं के जानकारों से राय लेकर ही ऐसा निर्णय किया जाना चाहिए। ताकि ये सुविधाओं के नाम पर सांस्कृतिक मूल्यबोधो पर कुठाराघात न हो। 

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बनारस की देव दिवाली पूरे भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय है। - फोटो : freepik
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विस्तार
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देश और दुनिया तेजी से बदल रही है। इस बदलाव का एक बड़ा उदाहरण ऑन लाइन सेवाओं का उपयोग भी है। इसका प्रचलन लोगों के नियमति जीवन में तीव्र गति से बढ़ा है। दैनिक उपयोगी वस्तुओं के खरीद बिक्री से लेकर चिकित्सा और शिक्षा क्षेत्र तक में इसका प्रभाव दिख रहा है। लोगबाग छोटे से लेकर बड़े भुगतान तक के लिए ऑन लाइन सेवाओं का भरपूर उपयोग कर रहे हैं। किंतु हर चलन का अपना फायदा और नुकसान दोनों है। ऐसे में इस वक्त ऑन लाइन सेवाओं की सर्वाधिक चोट सनातन परंपराओं पर है। एक के बाद एक आघात का सिलसिला लगातार जारी है। हालिया मामला काशी के सुप्रसिद्ध उत्सव देव दीपावली से संबंधित है।

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दरअसल, देव दीपावली पर्व उन कुछेक प्रतीकों में से एक है जिससे इस नगरी की एक विशिष्ट पहचान बनती है। प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व इस वर्ष 15 नवंबर को है। इस समय पूरी काशी नगरी सजी हुई होती है। उत्तर प्रदेश शासन के प्रयास के नाते यहां के गंगा घाट देखने योग्य होते है। किंतु इस अवसर पर काशी विश्वनाथ मंदिर समिति की ओर से एक विज्ञापन बेहद आपत्तिजनक है। इसके अनुसार लोगबाग घर बैठे ही दीपदान सुविधा का लाभ ले सकते है। प्रथम दृष्टि इसमें कुछ भी अनुचित नजर नहीं आता है। पर यदि दीपदान होता क्या है इसको विचारें तो यह निश्चित ही एक निंदनीय कृत्य है। यह दीपदान महज प्रकाश के लिए जलाए जाने वाला कोई सामान्य दिया-बाती नहीं है। यह श्रद्धा भक्ति के साथ अपने पितरों की स्मृति में अर्पित किए जाने वाला एक पूरा धार्मिक विधान है।

ठीक इसी प्रकार एक दीपक हर दीपावली उत्सव के पूर्व संध्या प्रत्येक हिंदू घर से निकाला जाता है। दीपोत्सव का यह प्रथम दीप मृत्यु देव यमराज के नाम होता है। इससे संबंधित समस्त आख्यान ऋग्वेद के दशम मंडल में उपलब्ध है। बात काशी के देव दीपावली की करें तो मान्यताओं के अनुसार यह भी दीपावली के समान एक विजय पर्व है। दीपावली रावण विजय उपरांत श्रीराम के राज्यारोहण से संबंधित उत्सव है। इसकी एक अन्य कथा समुद्र मंथन के पूर्ण होने से भी संबंधित है, तब अमूल्य रत्नों के संग अमृत कलश, आरोग्य देव धन्वंतरि एवं देवी लक्ष्मी का आगमन हुआ था। इन कारणों से दीपावली उत्सव एक विजय पर्व है।
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बात काशी के देव दीपावली की करें तो इसकी कथा अत्यंत रोचक है। इस पुरातन कथानुसार तब भगवान शिव ने त्रिपुरासुर दानव का वध कर सभी को उसके त्राण से मुक्ति दिलाई थी। यह बेला देवताओं के जागरण और उनके दिन की शुरुआत से भी संबद्ध है। इस समय भगवान विष्णु योग निद्रा से बाहर निकलते है। वही चार माह की लंबी अवधि उपरांत सभी देवता धरती के भ्रमण पर होते है। ऐसे में अंधकार की समाप्ति और दानवता के नाश पर प्रकाश उत्सव तो बनता ही है। इस अवसर पर समस्त देवता गण महादेव की नगरी में दीपावली उत्सव मनाने को जुटते हैं।

इसी दौरान ये भी इस पुरातन नगरी में कार्तिक मास स्नान पूर्ण करते है। स्वयं सदाशिव महादेव के एक ऐसे स्नान का भी वर्णन आया है। तब यहां राजा दिवोदास का राज्य हुआ करता था। ऐसी सभी कथाये पुराणों में वर्णित है। देव दीपावली के दीपदान वाले दीपकों को जला कर जल मे प्रवाहित किया जाता है। ये पूरी श्रद्धा और संकल्प के साथ किया जाने वाला विधान है। इस दौरान हर श्रद्धालु काशी के किसी गंगा घाट पर मौजूद होता है। कार्तिक पूर्णिमा स्नान और चातुर्मास पर्व के समापन के नाते भी लोगों का तब हुजूम उमड़ पड़ता है।

यहां हर कोई दीपोत्सव में सहभागिता एवं दीपदान का आकांक्षी होता है। यह पूरी प्रक्रिया खुद से पूरी की जाने वाली एक पुरातन परंपरा है। ऐसे में महज मंदिर के आय में बढ़ोतरी हेतु इस प्रकार का दुष्प्रयास कतई उचित नहीं है। यह धार्मिक मान्यता, रीति रिवाज और लोगों के रोजगार संबंधित अवसरों पर चोट है। इसके न केवल सांस्कृतिक पर्यटन और विरासत को नुकसान पहुंचता है अपितु परंपरा भी चोटिल होती है। यह अंततः उत्सव तीर्थ मंदिर सभी के पहचान को धूमिल करता है।

किंतु ना तो ये पहली और ना ही एकलौती घटना है। इससे पहले पितृपक्ष को लेकर बिहार सरकार का ऐसा ही एक दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय आया है। इसके अनुसार गया में ऑन लाइन पिंडदान सुविधा प्रारंभ की गई है। ज्ञात हो कि गया की प्रसिद्धि उसके पितृविधान संबंधित विशेषताओं के नाते है। यही नहीं देश के हर प्रसिद्ध देवालय में दर्शन पूजन और अनुष्ठानों संबंधित सेवाओं के नाम पर ऑन लाइन वाला कारोबार जारी है। इसे देखते हुए बाकी के मंदिर भी इसी राह पर बढ़ रहे हैं। अब तीर्थ विशेष के अधिकांश उत्सव और सुप्रसिद्ध मंदिरों के हर पर्व निशाने पर हैं। यह सीधे सीधे श्रद्धा और जनभावनाओं पर आघात है।

वैसे इसका एक और पक्ष भी है। इसको लेकर सरकारें और मंदिर प्रबंधन समितियां अक्सर इसे जन आकांक्षा वाली जनसुविधा बताती है। भीड़-भाड़ पर नियंत्रण और श्रद्धालु विशेष के पास समयाभाव के होने को इसके कारण के तौर पर प्रचारित किया जाता है। जब कभी इसपर प्रश्न उठता है तो इसे लोगों की मांग पर लिया गया निर्णय बता दिया जाता है। आखिर ये मांग करने वाले लोग कौन हैं? क्या कहीं के स्थानीय कारोबारी और पूजा पाठ संबंधित व्यवसाय से जुड़े व्यापारियों ने ऐसी कोई मांग उठाई है? अथवा तीर्थ पुरोहित एवं स्थानीय पुजारियों के द्वारा ऐसी कोई अभिलाषा प्रगट की गई है।

बाकी रहा आम श्रद्धालुओं का सवाल तो भला वो क्यों ऐसी किसी मांग का हिस्सा बनेंगे। यहां तो लोग आवागमन संबंधित सुविधाओं के घोर अभाव के बावजूद पीढ़ियों से तीर्थ यात्रा करते रहे हैं, क्योंकि इन तीर्थों की यात्रा का महत्व उनके वैदिक वांग्मय से लेकर रामायण एवं पुराण गाथाओं तक भरा पड़ा है।

बाकी दुनिया लाख तरक्की कर जाए इसके बावजूद भी कुछ चीजें केवल प्रत्यक्ष ही संभव है। ठीक इसी प्रकार सनातन हिंदू धर्म के कुछेक विधान सशरीर सहभागी होकर ही पूरा किया जा सकता है। यहां किसी भी पूजा एवं यज्ञ के लिए कुछेक चीजें अनिवार्य हैं। इनमें स्नान, पवित्रीकरण, आचमन, शिखा-दिशा इत्यादि का बंधन और आसन वस्त्र सब की शुद्धि का अतिशय महत्व है। ये अनिवार्य विधान है इसके बिना शुद्ध अंतःकरण से किया गया अनुष्ठान भी अपूर्ण ही रहता है।


हां, समय के साथ कुछेक मंदिर सेवाओं के ऑन लाइन होने में कोई बुराई नहीं है। दैनंदिनी पूजा,अभिषेक से लेकर उत्सव विशेष पर इसके माध्यम से भक्तों को श्रद्धा निवेदन का अवसर उपलब्ध कराया जा सकता है। मसलन प्रसाद, श्रृंगार, पुष्प इत्यादि अर्पण की सुविधा ऑन लाइन की जा सकती है। किंतु एक बार धर्म परंपराओं के जानकारों से राय लेकर ही ऐसा निर्णय किया जाना चाहिए। ताकि ये सुविधाओं के नाम पर सांस्कृतिक मूल्यबोधो पर कुठाराघात न हो। 


वैसे मंदिर द्वारा संचालित विभिन्न धार्मिक सांस्कृतिक गतिविधि और सेवा प्रकल्पों के संचालन हेतु यह एक बेहतर व्यवस्था है। इसको लेकर किसी को आपत्ति भी नहीं होगी। यह मंदिर द्वारा समाज उपयोगी कार्यों संग सनातन धर्म प्रचार का एक पावन कर्तव्य होगा। किंतु मंदिर एवं तीर्थो के हर सेवा का ऑन लाइन होना देख कर लगता है की यदि इनका बस चले तो ये कुंभ मेला के स्नान को भी ऑन लाइन कर दे।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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