नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 को लेकर देशभर में फैली आशंकाओं का कोहरा अभी थमा भी नहीं कि केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) का खाता भी खोल दिया। ऊपर से सरकार की ओर से आ रहे विरोधाभासी बयानों ने स्थितियों को स्पष्ट करने की बजाय आशंकाओं के धुंध को और अधिक गहरा दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के एनआरसी पर भिन्न-भिन्न बयानों के बाद अब डिटेंशन कैंपों पर भी सरकार की ओर से आ रहे परस्पर विरोधी बयानों ने नया विवाद छेड़ दिया है।
सीएए के बाद एनपीआर
केंद्र सरकार ने नागरिकता संबंधी 1955 के कानून में संशोधन कराने के तत्काल बाद एनपीआर की घोषणा भी कर डाली। इस योजना के तहत एक अप्रैल से लेकर 30 सितम्बर 2020 तक देश में रह रहे प्रत्येक व्यक्ति का डाटा तैयार किया जाना है।
पहली बार एनपीआर 2011 की जनगणना के दौरान तैयार किया गया था, जिसे 2015 में अपडेट किया गया। अब इसे 2021 की जनगणना के लिए इसे अद्यतन किया जाना है। पिछली बार की तुलना में इस बार कुछ अतिरिक्त जानकारियां भी मांगी जा रही हैं, जिस कारण देश में कई तरह की आशंकाएं उभर रही हैं।
जनसंख्या गणना का यह काम दो चरणों में किया जाएगा। पहले चरण के तहत अप्रैल-सितंबर 2020 तक प्रत्येक घर और उसमें रहने वाले व्यक्तियों की सूची बनाई जाएगी। असम को छोड़कर देश के अन्य हिस्सों में एनपीआर रजिस्टर के अद्यतन का काम भी इसके साथ किया जाएगा, जबकि दूसरे चरण में 9 फरवरी से 28 फरवरी 2021 तक पूरी जनसंख्या की गणना का काम होगा।
जनगणना प्रक्रिया पर 8754.23 करोड़ रुपये तथा एनपीआर के अद्यतन पर 3941.35 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। इस काम को पूरा करने के लिए 30 लाख कर्मियों को देश के विभिन्न हिस्सों में भेजा जाएगा। जनगणना 2011 के दौरान ऐसे कर्मियों की संख्या 28 लाख थी।
सरकार का कहना है कि जनसंख्या से जुड़े सभी आंकड़े मंत्रालयों, विभागों, राज्य सरकारों और अनुसंधान संगठनों सहित सभी हितधारकों और उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध कराए जाएंगे।
एनआरसी पर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के परस्पर विरोधी बयान
राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर या एनपीआर कोई पहली बार नहीं हो रहा है। इस बार नागरिकता संशोधन कानून के तत्काल बाद यह कार्य शुरू कराने के अलावा गृहमंत्री और प्रधानमंत्री के परस्पर विरोधी बयानों के कारण भी स्थिति और अधिक अस्पष्ट और भ्रामक हो गई है। प्रधानमंत्री ने 22 दिसंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित जनसभा को संबोधित कर नागरिकता कानून के बारे में फैली भ्रांतियों को दूर करने के लिए स्पष्ट रूप से कहा कि, ‘‘मैं 130 करोड़ देशवासियों को कहना चाहता हूं कि कहीं पर भी एनआरसी शब्द पर कोई चर्चा नहीं हुई, कोई बात नहीं हुई। सिर्फ जब सुप्रीमकोर्ट ने कहा तो असम के लिए करना पड़ा।’’
जबकि गृृहमंत्री अमित शाह ने नवंबर में ही लोकसभा में कहा था कि एनआरसी की प्रक्रिया देशभर में शुरू होगी और उस समय असम में भी यह प्रक्रिया फिर से की जाएगी। इसमें मैं फिर से स्पष्ट करना चाहता हूं कि किसी भी धर्म के लोगों को डरने की जरूरत नहीं है। इन सारे लोगों को एनआरसी में समाहित करने की व्यवस्था है ही है।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 20 जून 2019 को संसद में अपने अभिभाषण में कहा था ''सरकार ने तय किया है कि घुसपैठ की समस्या से जूझ रहे क्षेत्रों में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस की प्रक्रिया को प्राथमिकता के आधार पर अमल में लाया जाएगा। सरकार जहां घुसपैठियों की पहचान कर रही है, वहीं आस्था के आधार पर उत्पीड़न के शिकार हुए लोगों के प्रति भी प्रतिबद्ध है। इसके लिए भाषायी, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को उचित संरक्षण देते हुए नागरिकता कानून में संशोधन का प्रयास किया जाएगा।’’
राष्ट्रपति का अभिभाषण कैबिनेट द्वारा ही अनुमोदित किया जाता है। नागरिकता कानून पर बवाल मचने के बाद गृहमंत्री ने भी कुछ इसी तरह का आश्वासन एक टीवी न्यूज चैनल को दिए गए इंटरव्यू में दिया था। जबकि पिछले ही महीने झारखंड की चुनावी सभाओं में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि देश में एनआरसी लागू कर चुन-चुन कर विदेशी घुसपैठियों को बाहर कर दिया जाएगा।
इसी माह 4 दिसंबर को अमित शाह के ऑफिशियल ट्विटर पर कहा गया था कि हम संपूर्ण देश में एनआरसी का क्रियान्वयन सुनिश्चित कर बौद्ध, हिंदू और सिखों के अलावा बाकी घुसपैठियों को बाहर करेंगे।’’ नागरिकता कानून पर बबाल मचने के बाद इस ट्वीट को 19 दिसंबर को हटा दिया गया। यही नहीं, इसी साल लोकसभा चुनाव में भाजपा के घोषणापत्र में भी देशभर में चरणबद्ध तरीके से एनआरसी लागू करने का वायदा किया गया था।