दिल्ली में शिक्षा आज भी आम आदमी की पहुंच से बाहर है।
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अब जानते हैं दिल्ली में छात्रों की संख्या के अनुपात में दिल्ली में बढ़िया स्कूलों की कमी का कारण। दरअसल मांग और आपूर्ति में इस अंतर का सबसे बड़ा कारण स्कूलों को मान्यता प्रदान करने का आधार छात्रों के शैक्षणिक प्रदर्शन की बजाए निवेश आधारित मानकों का होना है। निवेश आधारित मानक अर्थात स्कूल खोलने के लिए जमीन, बिल्डिंग, प्ले ग्राऊंड, क्लासरूम का आकार, शिक्षक-छात्र अनुपात, शिक्षकों का वेतन, परिवहन एवं सुरक्षा संबंधी नियमन आदि आदि।
इस प्रकार, दिल्ली में एक स्कूल स्थापित करने के लिए कम से कम 50 से 100 करोड़ रूपए के निवेश की आवश्यकता पड़ती है। शिक्षा का गैरलाभकारी वृति होने के कारण न तो बैंकों से ऋण मिलता है और न ही इतनी बड़ी मात्रा में निवेश करने के लिए जल्दी कोई तैयार नहीं होता।
यदि कोई हिम्मत करे भी तो स्कूल खोलने की प्रक्रिया इसे लंबी और दुष्कर बना देती है। थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी ने हाल ही में इस संबंध में एक शोधपत्र प्रकाशित किया है। शोधपत्र के मुताबिक दिल्ली में स्कूल खोलने के लिए शिक्षा विभाग द्वारा जारी 3 सर्टिफिकेट हासिल करने की जरूरत होती है जिसके लिए 125 दस्तावेजों की आवश्यकता पड़ती है। कई दस्तावेजों को एक से अधिक बार जमा कराना होता है।
सबसे पहला सर्टिफिकेट एसेंसियालिटी सर्टिफिकेट यानी कि जिस क्षेत्र में स्कूल खोलना है वहां इसकी वास्तव में आवश्यकता है इसे साबित करना पड़ता है। इसके लिए 29 प्रकार के दस्तावेजों की जरूरत होती है और 16 अधिकारियों के चक्कर काटने होते हैं और इस दौरान 68 चरणों से होकर गुजरना होता है। मजे की बात है कि शैलजा चंद्रा कमेटी ने वर्ष 2012 में ही इस सर्टिफिकेट की आवश्यकता को समाप्त करने की सिफारिश की थी जिसका अबतक अनुपालन नहीं हो सका है।
दूसरा सर्टिफिकेट रिकॉग्निशन सर्टिफिकेट यानी स्कूल के लिए मान्यता की अनुमति संबंधी सर्टिफिकेट होता है। इसके लिए 82 प्रकार के दस्तावेजों की जरूरत होती है और 16 अधिकारियों के चक्कर काटने होते हैं। इस दौरान भी 68 चरणों से होकर गुजरना होता है।
तीसरा सर्टिफिकेट अप्रूवल फॉर द स्कीम ऑफ मैनेजमेंट की अनुमति से संबंधित होता है। यानी स्कूल का प्रबंधन किस प्रकार करना है इसकी मंजूरी। इसे हासिल करने के लिए 14 प्रकार के दस्तावेजों की आवश्यकता होती है और आठ अधिकारियों के चक्कर काटने होते हैं। इसके लिए 19 चरणों से होकर गुजरना पड़ता है।
इन तीनों सर्टिफिकेट को हासिल करने के लिए सरकार द्वारा तय समय सीमा 6 माह निर्धारित की गई है लेकिन सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के मुताबिक वास्तव में उक्त प्रक्रिया में पांच वर्ष तक का समय लग सकता है। शोधपत्र के मुताबिक दूसरे विभागों से प्राप्त किए जाने वाले वाटर टेस्ट रिपोर्ट और फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट कई बार हासिल करने होते हैं क्योंकि इनकी वैधता सीमित समय के लिए होती है और जबतक शिक्षा विभाग से सर्टिफिकेट प्राप्त होता हैं तबतक उनकी वैधता समाप्त हो चुकी होती है।
मजे की बात ये है कि ऐसा कोई सिंगल विंडो सिस्टम नहीं है जहां से उक्त सारी जानकारी हासिल की जा सके। इस कारण विभाग में लगाए जाने वाले चक्करों की संख्या असीमित हो जाती है।
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