मुझे पहले लगता था कि आदमी दो ही चीजों से बनता है- एक शरीर और दूसरी आत्मा। हाल के दिनों में पता चला कि तीसरी चीज भी होती है- कागज। बल्कि सच पूछिए तो पहली दो चीजें बाद में आती हैं, कागज पहले आता है।
एक आम आदमी की जिंदगी बहुत साधारण होती है। सुबह दफ्तर, शाम को बाजार, रात को बिजली का बिल और महीने के आखिर में फीस। उसने कभी यह कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन उसे अपने ही होने का सबूत देना पड़ेगा।
वह सोचता है कि उसका चेहरा काफी होगा। मोहल्ले वाले पहचानते हैं, पत्नी पहचानती है, बच्चे बिना देखे उसकी आहट पहचान लेते हैं। लेकिन ये सब घरेलू प्रमाण हैं। सरकारी भाषा में इनका कोई महत्व नहीं है।
आज आदमी पहले पैदा नहीं होता, पहले उसका कागज पैदा होता है। आदमी तो बाद में धीरे धीरे उसके अनुरूप ढलता है।
पहले वेदों में लिखा गया था- "अहं ब्रह्मास्मि।" अब संशोधित संस्करण है-"कागजं ब्रह्मास्मि।"
अब आदमी नहीं चलता, उसका फोल्डर चलता है।
वह पहला कागज निकालता है। बाबू कहते हैं, "बहुत अच्छा। अब दूसरा दिखाइए।"
दूसरा निकालता है। बाबू कहते हैं, "इसमें आपका नाम पहले वाले से अलग है।"
तीसरा निकालता है। बाबू कहते हैं, "इसमें पिता का नाम पूरा नहीं है।"
चौथा निकालता है। बाबू कहते हैं, "इसमें पता पुराना है।"
पांचवां निकालता है। बाबू कहते हैं, "इसकी फोटोकापी कहां है?"
तभी उसे समझ में आता है कि इस देश में सबसे बडा संयुक्त परिवार कागजों का है।
एक को बुलाइए, पूरा खानदान हाजिर हो जाता है।
वह घर लौटता है। पुरानी अलमारी खुलती है। लोहे का संदूक खुलता है। कपड़ों के नीचे से एक लिफाफा निकलता है। लिफाफे से दूसरा लिफाफा। फिर पॉलीथीन। फिर अखबार में लिपटा हुआ वह कागज, जिसे बरसों पहले इस विश्वास से रखा गया था- "कभी काम आएगा।"
सचमुच, हमारे यहां कागज कभी बूढे़ नहीं होते। आदमी रिटायर हो जाता है, कागज सेवा में बने रहते हैं।
सबसे दिलचस्प दृश्य तब होता है जब आदमी से कहा जाता है, "जरा अंगूठा लगाइए।"
वह अंगूठा रखता है। मशीन सोचती है। फिर बीप करती है। फिर कहती है- "नहीं।"
यह ‘नहीं’ बहुत छोटा शब्द है, लेकिन इसके भीतर पूरी जिंदगी फंस जाती है।
जिस हाथ ने खेत जोते, ईंटें उठाईं, बच्चों की उंगलियां पकड़ी, उसी हाथ से मशीन कहती है- "पहचान नहीं पाई।"
आदमी अपनी हथेली को ऐसे देखता है, जैसे पहली बार देख रहा हो। वह मशीन से नहीं झगड़ता। मशीन से कौन झगडे़? बाबू से भी नहीं लड़ता। बाबू भी आखिर किसी दूसरे कागज के अधीन काम कर रहा होता है।
वह केवल इतना पूछता है, "अब क्या लाऊं?"
बाबू के चेहरे पर हल्की सी करुणा उतरती है। करुणा इस देश की सबसे सस्ती चीज है।
वह कहता है, "कोई और कागज ले आइए।"
आदमी फिर घर लौट जाता है। उसे लगने लगता है कि वह उस नाव में बैठा है, जो कागज की है। जिंदगी का दरिया गहरा है और हवाएं तेज हैं। उसे डर नाव के डूबने का नहीं है, डर इस बात का है कि अगर नाव का कोई एक कोना भी भीगकर गल गया, तो वह किनारे पर खडे़ होकर भी यह साबित नहीं कर पाएगा कि वह तैरकर आया है या डूबकर।
यह जो हमारे देश का सिस्टम है न, वह बहुत दूरदर्शी है। उसे आपकी आत्मा, आपके दिल या आपके चरित्र से कोई मतलब नहीं। सिस्टम जानता है कि आदमी चंचल प्राणी है। आज ईमानदार है, कल बेईमान हो सकता है। आज जिंदा है, कल विचार बदल सकता है। इसलिए उसने आदमी पर भरोसा करना बहुत पहले छोड़ दिया। उसका भरोसा अब सिर्फ कागज पर है।
आज का सबसे बड़ा दर्शन यही है- आप वही हैं, जो फाइल कहती है। आपकी पहचान आपका चेहरा नहीं, आपका डेटा है। अगर सर्वर चल रहा है तो आप नागरिक हैं, मतदाता हैं, लाभार्थी हैं। और जिस दिन सर्वर डाउन हुआ, उसी क्षण आप भी सिस्टम की नजर में डाउन हो गए। सांस लेते रहिए, धूप में चलते रहिए, लेकिन स्क्रीन पर "रिकॉर्ड नॉट फाउंड" चमक गया तो समझ लीजिए, आपका अस्तित्व भी अस्थायी रूप से स्थगित हो गया।
हमारे गांव के गुजरी गुरु पिछले सत्तर वर्षों से इसी देश में रह रहे हैं। इसी हवा में सांस लेते हैं। उन्हें पूरा भरोसा था कि वह इस देश के नागरिक हैं। लेकिन जब वोटर लिस्ट में नाम जुडवाने पहुंचे तो बाबू ने पूछा, "पहचान का प्रमाण?"
उन्होंने कहा, "साहब, सामने खडा हूं।"
बाबू ने चश्मा उतारकर उन्हें देखा और बोले, "आपको नहीं, आपको साबित करने वाला कागज चाहिए।"
गुजरी गुरु भागते हुए घर पहुंचे।
पत्नी ने पूछा, "क्या हुआ?"
उन्होंने कहा, "वह वाला कागज कहां है, जिसमें मैं हूं?"
पत्नी बोली, "तुम तो यहीं हो।"
गुजरी गुरु ने लंबी सांस ली, "घर में हूं, लेकिन सरकार को अभी इसकी खबर नहीं है।"
घर में खोज अभियान शुरू हुआ। आखिर एक फाइल मिली। उसे देखकर ऐसा लगा, जैसे पुरातत्व विभाग ने कोई प्राचीन सभ्यता खोज निकाली हो। वह विजयी भाव से दफ्तर पहुंचे।
बाबू ने कागज देखा। बोले, "बहुत अच्छा। अब इसके साथ दूसरा कागज भी लगाइए।"
गुजरी गुरु ने पूछा, "यह अकेला क्यों नहीं चल सकता?"
बाबू मुस्कराए, "अकेले तो आजकल आदमी भी नहीं चलता, कागज कैसे चलेगा?"
उसी दिन गुजरी गुरु को समझ में आ गया कि कागज भी सामाजिक प्राणी है। उसे अपने रिश्तेदार साथ चाहिए। एक के साथ दूसरा, दूसरे के साथ तीसरा, तीसरे के साथ चौथा। किसी एक की गैरहाजिरी में पूरी बरात लौट जाती है।
लगता है, हमारी व्यवस्था ने एक बात बहुत देर से खोजी। आदमी को केवल हाड़-मांस और आत्मा देकर काम नहीं चल सकता। उसके साथ एक प्रमाणित प्रति, दो स्वयं सत्यापित प्रतियां, तीन पासपोर्ट साइज फोटो और चार अलग-अलग पहचान पत्र भी होने चाहिए थे। आज का आम आदमी इसी अधूरी तैयारी की सजा भुगत रहा है।
अब मैंने एहतियात के तौर पर अपने सारे कागज एक ही फाइल में रख दिए हैं। फाइल अलमारी में है। अलमारी की चाबी जेब में रहती है। हर दस मिनट पर मेरा हाथ जेब तक चला जाता है। पत्नी पूछती है, "क्या टटोल रहे हो?"
मैं कहता हूं, "खुद को।"
अब डर यह नहीं लगता कि मैं कहीं खो जाऊंगा। डर यह लगता है कि मेरे कागज कहीं मुझसे पहले न खो जाएं, क्योंकि इस देश में आदमी के बिना कागज कुछ दिन चल सकता है, लेकिन कागज के बिना आदमी एक दिन भी नहीं।
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