साधारण दुख अब कहीं दिखता ही नहीं। दुकानदार कहता है, “सर, आउट ऑफ स्टॉक। प्रीमियम मेंबरशिप ले लीजिए।
तब दुख का इलाज भी बड़ा सीधा था कि दुख को दुख की तरह सहो। आज आदमी इतना समझदार हो गया है कि न दुख को अकेले सहता है और न ही देखता है। बाढ़ का पानी गले तक आ जाए तो पहले मोबाइल निकालता है, फिर पीछे से डूबता हुआ घर फ्रेम में लाता है और अंत में दूसरे को दिखाकर पूछता है- “भाई, रील कैसी बनी?” आदमी दुखी होने से ज्यादा इस बात को लेकर चिंतित है कि उसका दुख वायरल क्यों नहीं हुआ।
नए भारत का दुख
आदमी संकट में भी साधारण नहीं दिखना चाहता। पुराने जमाने में बाढ़ में घर डूबता था, अब लाइफस्टाइल फ्लोट करती है। दुख की वजह वही है, बस उसका पूरा पैकेज बदल गया है। बारिश में पहाड़ों पर जाइए। होटल में ठहरिए। लौटते वक्त पहाड़ खिसक जाए और रास्ता बंद हो जाए, तो रील बनाइए। फिर दोस्तों को फोन घुमाकर कहिए, “व्हाट एन एक्सपीरियंस, यार!”
यह जो ‘एक्सपीरियंस’ वाला भाव है, यही आपको प्रीमियम बनाता है। घर में नेटवर्क न आए तो वह ‘परेशानी’ है, लेकिन यही परेशानी जब पहाड़ों पर ‘डिजिटल डिटॉक्स’ में बदल जाती है, तो क्रांति होने जैसा अहसास होता है। हमारे समाज की असली प्रतिभा यही है कि वह हर कष्ट को किसी न किसी दिन अनुभव में बदल देता है। इसीलिए बारिश अब एक ऐसा मौसम हो गया है, जिसमें गरीब भीगता है और प्रीमियम आदमी ‘एन्जॉय’ करता है। बाकी लोग छाता ढूंढ़ते रहते हैं।
साहित्यकार अपने दुख को कविता में ढाल रहे हैं, नेता अपने दुख को बयानों में घोल रहे हैं और अभिनेता अपने दुख को इंटरव्यू में फिट करने की कला में पारंगत हुए पड़े हैं। फिर जनता ताली बजाकर कहती है, “क्या मार्मिक अभिव्यक्ति है!”
यह जो मार्मिक अभिव्यक्ति वाली बात है, यही प्रीमियम है और इस प्रीमियम काल में हम लोगों के लिए दुख चार श्रेणियों के ‘पैकेज’ में उपलब्ध है। पहला है बेसिक दुख। यह एकदम ठेठ, बिना मिलावट वाला और देहाती दुख है। इसमें कोई ताम-झाम नहीं होता। आदमी बस किसी कोने में चुपचाप बैठकर रो लेता है। दूसरा है सिल्वर दुख। यहां दुख को थोड़ा-सा ढांढ़स मिलता है। दो दोस्त कंधे पर हाथ रखते हैं और सहानुभूति से कहते हैं, “भाई, तेरा दर्द हम समझ सकते हैं।” इसके बाद आती है गोल्ड दुख की श्रेणी। इसमें हमदर्दी का दायरा और बढ़ता है।
वहीं दो दोस्त पीठ थपथपाने के साथ-साथ किसी नामी मनोचिकित्सक का नंबर भी थमा देते हैं। चौथी श्रेणी है प्रीमियम दुख की। यह दुख की सबसे शानदार और एलीट श्रेणी है। इसमें रोने के लिए जगह इतनी भव्य और लोकेशन इतनी सही होती है कि किसी भी एंगल से तस्वीर खींचें, अच्छी ही आती है और बिना किसी तरह के फिल्टर के सोशल मीडिया अकांउट में डाली जा सकती है।
आप जिधर भी नजर दौड़ाएं, प्रीमियम होने की होड़ मची है। हमें हर समस्या का प्रीमियम समाधान चाहिए, चाहे जेब पूरी खाली हो जाए। ‘लिमिटेड एडिशन’ हमारी सबसे कमजोर नस है। वैसे भी हमारा जीवन अब ‘लिमिटेड एडिशन’ में ही चल रहा है। नींद चाहिए तो स्लीप थेरेपी, भोजन चाहिए तो ऑर्गेनिक, दूध चाहिए तो ए2, कपड़ा चाहिए तो हैंडक्राफ्टेड, घर चाहिए तो लग्जरी, गाड़ी चाहिए तो एसयूवी, मोबाइल चाहिए तो प्रो मैक्स और उदासी दूर करनी हो तो वेलनेस रिट्रीट!
साधारण होना सबसे कठिन
साधारण आदमी इस समय सबसे असाधारण और दुर्लभ प्रजाति है। उसे न प्रीमियम पानी चाहिए था, न प्रीमियम कॉफी। वह बस इतना चाहता था कि शाम को घर लौटे तो कोई पूछ ले, “थक गए क्या?” लेकिन बाजार ने इसका भी पैकेज बना दिया- ‘इमोशनल केयर प्रीमियम फैमिली पैक!’ इसलिए रिश्त-नाते भी सब्सक्रिप्शन मॉडल पर चल रहे हैं। सामान्य मित्र वह है, जो कभी-कभार फोन पर बात कर ले।
प्रीमियम मित्र आपकी पोस्ट पर तुरंत रिएक्ट करता है और कभी-कभी आपकी ‘डार्क पोस्ट’ देखकर इनबॉक्स में पूछ भी लेता है, “ऑल गुड?” इसके बाद भी अगर उसने पूछ लिया कि “कॉल करूं क्या?” तो समझिए उदासी का पैकेज पूरी तरह वसूल हो गया!
याद रखें, आधुनिक आदमी को दुखी भी सलीके से होना पड़ता है। उसके पास अच्छा सोफा हो, सामने महंगी कॉफी हो, बैकग्राउंड में ‘लो-फाई’ संगीत बज रहा हो और वह इंस्टाग्राम पर लिख रहा हो- “सम पेन्स आर टू डीप टू एक्सप्लेन।” इसके तुरंत बाद कमेंट बॉक्स में ‘स्टे स्ट्रॉन्ग’ के संदेशों की बाढ़ आ जाती है और आदमी अपने इस ‘प्रीमियम दुख’ के अहसास में धीरे से मुस्कुरा उठता है।
दुख अब महज वेदना नहीं, एक सजा-धजा ‘कंटेंट’ है। बाजार ने सब कुछ प्रीमियम कर दिया, लेकिन एक चीज पर बंपर डिस्काउंट जारी रखा है। वह है आदमी की कीमत। शायद इसीलिए आदमी को हर चीज प्रीमियम चाहिए। अपने लिए नहीं, बल्कि दुनिया में यह साबित करने के लिए कि वह ‘साधारण’ होकर मरने वालों में से नहीं है।
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