जीडीपी (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट या हिंदी में सकल घरेलू उत्पाद) जैसे आर्थिकी आकलन के नियमित सांख्यिकीय आंकड़ों पर जैसी सियासत इस बार हो रही है, पहले शायद ही हुई हो। सरकार ने माहौल यूं बनाया कि मानों देश की लॉटरी लग गई हो तो विपक्ष ने इसे लुटी हुई जागीर करार देने में यह कहकर कसर नहीं छोड़ी कि आंकड़ों का आधार ही गलत है।
जीडीपी के आंकड़े हर तीन माह में जारी होते हैं, इनमें अर्थव्यवस्था की चाल के मुताबिक घट-बढ़ होती रहती है। मोटे तौर पर इसे देश की आर्थिक सेहत के आईने में देखा जाता है, बावजूद इसके कि ये आंकड़े जमीनी हकीकत की सही तस्वीर पेश नहीं करते। फिर भी देश में जीडीपी पर सियासी तलवारें खिंची तो इसके पीछे अपने-अपने नरेटिव गढ़ने की कोशिश ज्यादा है, जिसका आम आदमी की जिंदगी से कम ही लेना-देना है। यानी न तो तस्वीर उतनी गुलाबी है, जैसी आंकड़ों की व्याख्या से बताने की कोशिश हुई और न ही उतनी निराशाजनक है, जिसका कि दावा किया गया।
भारत की ‘डेड’ अर्थव्यवस्था
दरअसल आंकड़ों पर इस सियासत के पीछे सारा खेल नरेटिव का है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल अपने एक कमेंट में भारतीय अर्थ व्यवस्था को ‘डेड’ बताया था। उसके बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी इस साल के शुरू में उसी बात को दोहराया। आशय यही था कि मोदी सरकार की नीतियों के कारण भारत की अर्थव्यवस्था मुर्दा हो चुकी है। हालात बहुत खराब है। काम धंधे ठप हैं। ट्रंप ने तो बाद में अपने बयान से यू-टर्न ले लिया, लेकिन राहुल गांधी अपनी बात पर डटे रहे।
इसी बीच भारत सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026 की प्रथम तिमाही अर्थात अप्रैल से जून तक के आंकड़ों में देश की जीडीपी ग्रोथ रेट 7.8 प्रतिशत बताई। सरकार का दावा है कि यह वृद्धि दर पश्चिम एशिया में युद्ध और वैश्विक ऊर्जा संकट के बावजूद हासिल हुई है, जो भारत की आर्थिक प्रगति और माली मजबूती को दर्शाती है।
इन आंकड़ों से गदगद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी विदेश यात्रा के दौरान ही सोशल मीडिया पर वीडियो के जरिए देशवासियों को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी। साथ ही परोक्ष रूप से राहुल गांधी को भी नसीहत दी कि वो आंखें खोलकर देख लें कि देश की अर्थव्यवस्था कैसे छलांगे मार रही है।
शुरू में तो विपक्ष ने इन आंकड़ों पर खास प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन मामले में नया मोड़ तब आया जब मोदी सरकार में ही पूर्व वित्त सचिव रहे सुभाषचंद्र गर्ग ने 7.8 प्रतिशत की जीडीपी ग्रोथ रेट को ‘अवास्तविक’ बताया। उन्होंने आंकड़ों के हवाले से कहा कि चूंकि सरकार ने पिछले वर्ष के जीडीपी और विभिन्न क्षेत्रों के आंकड़ों को काफ़ी कम कर दिया है, जिससे यह वृद्धि बहुत बड़ी दिखाई जा रही है।
गर्ग ने सांख्यिकी विभाग के उन आंकड़ों पर भी सवालिया निशान लगाया, जिसमें कहा गया था कि देश में अप्रैल-जून 2026 में रियल जीडीपी में 7.8% की वृद्धि हुई, जबकि नॉमिनल जीडीपी 10.3% बढ़ी।
गर्ग का दावा है कि यदि वित्त वर्ष 2026–27 की पहली तिमाही के 88.27 ट्रिलियन रुपए की तुलना वित्त वर्ष 2025–26 की पहली तिमाही के पहले जारी किए गए 86.05 ट्रिलियन रुपए की नॉमिनल जीडीपी से की जाती है, तो वृद्धि वास्तव में 2.6 फीसदी ही बैठती है न कि 10.3 प्रतिशत।
विपक्षी कांग्रेस, गर्ग की इस बात को ले उड़ी और उसने जीडीपी ग्रोथ के सुनहरे दावो को खारिज करना शुरू कर दिया। बाकी विपक्ष ने भी उसके सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक्स पर लिखा कि देश में बेरोज़गारी 50 साल के उच्चतम स्तर पर है। 40 फीसदी युवा ग्रेजुएट बेरोजगार हैं।
हर साल दो करोड़ नौकरियां देने का वादा बिखर चुका है।" उधर वर्ल्ड बैंक के कार्यकारी निदेशक (ईडी) नीलकंठ मिश्रा ने गर्ग के दावों को खारिज करते हुए कहा कि देश की आर्थिक गतिविधियों के ये आंकड़े ठोस और अचूक हैं। इन्हें किसी भी तरह से झुठलाया नहीं जा सकता। देश की जमीनी आर्थिक गतिविधियों से जुड़े जिन संकेतकों में हेरफेर करना नामुमकिन है। जैसे कि देश में वाहनों की बंपर बिक्री, टैक्स कलेक्शन और क्रेडिट ग्रोथ में उछाल, इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश में मजबूत स्थिति और अनुकूल मौद्रिक नीतियां आदि।
हालांकि उन्होंने माना कि देश में वास्तविक मजदूरी वृद्धि की दर धीमी है। राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के कार्यकारी अध्यक्ष रहे पीसी मोहनन भी सुभाष गर्ग के तर्कों को खारिज करते हुए कहते हैं कि जब हमारा जीडीपी रिवीजन हुआ तो नए संशोधित बेस ईयर में कुल जीडीपी लेवल थोड़ा नीचे हो गया है।
गर्ग अगर जीडीपी बेस ईयर का ठीक से हिसाब करते, तो उन्हें 2.6 प्रतिशत नहीं, 7.8 प्रतिशत ही वृद्धि दर मिलती। मोहनन मानते हैं कि मेथड के लेवल पर कोई मसला नहीं है, क्योकि संयुक्त राष्ट्र की सिस्टम ऑफ नेशनल अकाउंट्स के हिसाब से ही भारत जीडीपी गणना कर रहा है। मुद्दा यह है कि आप मेथड में कौन सा डेटा इस्तेमाल कर रहे हैं। वैसे सुभाष गर्ग कोई पहले अधिकारी नहीं हैं, जिन्होंने भारत की जीडीपी ग्रोथ के आँकड़ों पर संदेह जताया है।
आंकड़ों की प्रामाणिकता पर सवाल
सरकार के आंकड़ों की प्रामाणिकता, डेटा सोर्स और मेथड को लेकर पर भारत के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम भी संदेह जता चुके हैं। इसका आधार वो भारत का औद्योगिक उत्पादन घटना, परचेसिंग मैनेजर्स इंडेक्स में घटत और रोजगार में कमी को मानते हैं। हालांकि वित्तीय मामलों का अध्ययन करने वाली अमेरिकी कंपनी ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि जून तिमाही का प्रदर्शन एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को मार्च 2027 तक के 12 महीनों में 7% से ज़्यादा की वृद्धि दर हासिल करने की राह पर भी ले जाता है।
यद्यपि 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपने को पूरा करने के लिए इससे भी तेज़ गति से विस्तार करना होगा।''
यहां उल्लेखनीय है कि जीडीपी की गणना मुख्य रूप से तीन पैमानों पर की जाती है। ये हैं उत्पादन विधि, आय विधि और व्यय विधि। जीडीपी भी दो प्रकार की होती है। पहली है नॉमिनल या सांकेतिक जीडीपी, जिसकी गणना वर्तमान बाजार की कीमतों पर की जाती है, जबकि रियल या वास्तविक जीडीपी की गणना महंगाई के लिए एक तय वर्ष को आधार ( बेस ईयर) बनाकर की जाती है, इसके तिमाही आंकड़े राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय जारी करता है। वैसे भी जीडीपी बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि सभी की आमदनी बढ़ गई। इसीलिए जीडीपी में लोक कल्याण का सही मापदंड परिलक्षित नहीं होता।
दरअसल जीडीपी अवधारणा की आरंभिक शुरुआत दुनिया में 17 वीं सदी में ब्रिटेन में अर्थशास्त्री सर विलियम पेटी ने कर युद्ध काल में कर भार की गणना करते समय की थी। 1695 में चार्ल्स डेवनेंट ने इस पद्धति को और आगे बढ़ाया। लेकिन जीडीपी की आधुनिक अवधारणा को 1934 में अमेरिका में साइमन कुजनेट्स ने विकसित किया।
साथ ही अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट में उन्होंने चेतावनी दी थी कि इसे लोककल्याण के मापदंड के रूप में उपयोग न किया जाए। लेकिन 1944 में ब्रेटन वुड्स सम्मेलन के बाद जीडीपी को किसी देश की अर्थव्यवस्था को मापने का मुख्य उपकरण माना जाने लगा। हालांकि इसमें कई खामियां हैं।
पहले भी छठे स्थान पर, अब भी
जीडीपी के हिसाब से आज भारत 4.15 ट्रिलियन डॉलर इकॉनामी के साथ छठे नंबर की अर्थव्यवस्था है। हमसे थोड़ा आगे यूके और जापान हैं, जिन्हें हम आने वाले कुछ वर्षों में ही पीछे छोड़कर चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकते हैं। एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि अविभाजित भारत ब्रिटिश उपनिवेश का हिस्सा रहते 1947 में दुनिया की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था था और अभी भी हम छठी अर्थव्यवस्था तक पहुंचे हैं। लेकिन तब विश्व में स्वतंत्र देशों की संख्या केवल 74 थी, जबकि आज यह तादाद 195 हो चुकी है।
हैरानी की बात यह भी है कि भारत की जीडीपी वृद्धि दर पर ऐसा बवाल तब भी नहीं मचा था, जब कोविड काल के बाद देश की जीडीपी वृद्धि दर 9.7 फीसदी दर्ज की गई थी। लेकिन इस बार 7.8 प्रतिशत पर ही भारी सियासी रस्साकशी और इसका राजनीतिक श्रेय लेने और न लेने देने की होड़ मची है। सरकार चाहती है कि लोग इस महान उपलब्धि के तौर पर देखें। जबकि आम आदमी के लिए आर्थिक प्रगति के स्वाभाविक मायने रोटी, कपड़ा और मकान की सुलभता और सुरक्षा का अहसास है।
लिहाजा आंकड़ों को आंकड़ों की तरह ही देखा जाना चाहिए। नरेटिव का जवाब नरेटिव से देने तक तो ठीक है, लेकिन इस पर सियासी तलवार भांजने से किसी को कोई विशेष लाभ नहीं होगा।
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