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देव की डायरी: रिश्तों का चार्जर बाजार में क्यों नहीं मिलता ?

सार

यह हर घर की कहानी है। अब आने वाला  मेहमान बैठने की जगह बाद में ढूंढता है, सॉकेट पहले। घर में चार्जर इतने हैं कि लगता है परिवार नहीं, बिजली से चलने वाली चीजों की पंचायत लगी है। हर सदस्य का अपना उपकरण है और हर उपकरण का अपना चार्जर। बस बातचीत के लिए कोई चार्जर नहीं है।

रिश्तों को चार्ज करने वाला उपकरण बाजार में नहीं मिलता। और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस दिन घर में बिजली चली जाती है, हम सबसे पहले मोबाइल की बैटरी देखते हैं। कभी यह नहीं देखते कि घर में बातचीत की ‘बैटरी’ कब से खत्म है?
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रिश्तों का चार्जर - फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार
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घर में अब आदमी कम और चार्जर ज्यादा हैं। हर उपकरण का अपना चार्जर है। मोबाइल का अलग, घड़ी का अलग, लैपटाप का अलग, ईयरफोन का अलग। यहां तक कि कुछ उपकरण ऐसे हैं जिनका इस्तेमाल कम होता है, लेकिन उनका चार्जर हमेशा सुरक्षित रखा जाता है। लेकिन उसे फेंकने की हिम्मत नहीं होती। हो सकता है कभी काम आ जाए।

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इस ‘कभी’ ने घर में इतनी चीजें बचा रखी हैं कि यदि पुरानी चीजों का संग्रहालय खुले तो प्रवेश टिकट अलग से लेना पड़े।  एक चार्जर दूसरे के काम आ जाए तो विज्ञान में नई खोज मान ली जाएगी। घर के सदस्यों और रिश्तेदारों का मामला उलटा है। उनका कोई चार्जर नहीं होता। वे बिना चार्ज हुए  धीरे-धीरे दूर होते जा रहेे हैं। और फिर एक दिन बहुत दूर। 

किसी दिन घर में गिनती हो तो पता चलता है कि आदमी चार हैं और चार्जर नौ। मुझे यह अनुपात ठीक नहीं लगा।

श्रीमती जी  से चर्चा की तो उन्होंने कहा, “सबके अलग-अलग हैं।”
मैंने कहा, “लोग भी तो अलग-अलग हैं।”
उन्होंने फिर कहा, “लोग तो फिर भी एक-दूसरे से काम चला लेते हैं, चार्जर में ऐसा नहीं हो सकता।”


अब आप अपनी जिंदगी के दस से पंद्रह साल पीछे रिवांइ़ड कर के देखिए। घर में कोई आता था तो हम पूछते थे, ‘चाय लेंगे या पानी?’ आने वाला भी पूछता था,“हाल-चाल क्या है? छोटू की पढ़ाई कैसी चल रही है? और भी ढेर सारी बातें।” अब हालत यह है कि घर में कोई मेहमान आ जाए तो उसे बैठाने से पहले पूछा जाता है, “आपका फोन कितने प्रतिशत है?” वह कहता है, “दस।” हम कहते हैं, “उधर लगा दीजिए।” फिर वह फोन चार्ज करता रहता है और हम उसके पास बैठे रहते हैं।
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रिश्तों की लो होती बैटरी...

यह हर घर की कहानी है। अब आने वाला  मेहमान बैठने की जगह बाद में ढूंढता है, सॉकेट पहले। घर में चार्जर इतने हैं कि लगता है परिवार नहीं, बिजली से चलने वाली चीजों की पंचायत लगी है। हर सदस्य का अपना उपकरण है और हर उपकरण का अपना चार्जर। बस बातचीत के लिए कोई चार्जर नहीं है।

मोबाइल की बैटरी दस प्रतिशत रह जाए तो हम बेचैन हो जाते हैं। चार्जर ढूंढते हैं, प्लग लगाते हैं, बची हुई ऊर्जा को बचाते हैं। लेकिन बातचीत दस दिन से बंद हो तो कोई बेचैनी नहीं होती। रिश्ते महीनों से डिस्चार्ज पड़े रहें, हमें खबर तक नहीं होती।  

रिश्तों की बैटरी कब पांच प्रतिशत हुई, इसकी कोई सूचना नहीं आती। उसकी कोई लाल बत्ती नहीं जलती। कोई संदेश नहीं आता, “आपका भाई आपसे काफी समय से बात नहीं कर रहा है। कृपया उसे चार्ज करें।” लेकिन रिश्तों का चार्जर बाजार में नहीं मिलता। वह शायद घर में ही कहीं रखा है। बस हम उसे ढूंढ नहीं पा रहे।

वह कोई और समय था, जब रास्ते में मिलने के बाद बातचीत के बीच एक सहज और आत्मीय संदेश होता था, “कभी घर आओ।” अब हम सब बिना किसी झिझक और संकोच के कहते हैं, “कभी-कभी वीडियो कॉल कर लेना।” फिर वह वीडियो कॉल भी नहीं होता। उसकी जगह एक संदेश आ जाता है,"बिजी था।"  

आज के इस दौर में यह ‘बिजी’ शब्द भी बड़ा सुविधाजनक है। इससे कोई पूछ नहीं सकता कि किस काम में व्यस्त थे। मोबाइल पर चार घंटे क्या कर रहे थे, यह पूछना निजी स्वतंत्रता में सीधा हस्तक्षेप है। लेकिन रिश्तेदार का फोन न उठाना व्यस्तता है। 

रिश्तों को कब करेंगे चार्ज?

हमने उपकरणों को चार्ज करने की पूरी व्यवस्था कर ली है, रिश्तों को चार्ज करने की नहीं। चार्जिंग का तार उलझ जाए तो हम बैठकर सुलझाते हैं। रिश्तों की गांठ उलझ जाए तो कहते हैं, “अब क्या रखा है?” शायद इसीलिए घर में अब चार्जर ज्यादा हैं, रिश्तेदार कम। चार्जर कम हो जाए तो बाजार से नया खरीद लेंगे। रिश्तेदार कम हो जाएं तो बाजार में नहीं मिलते। और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस दिन घर में बिजली चली जाती है, हम सबसे पहले मोबाइल की बैटरी देखते हैं।

कभी यह नहीं देखते कि घर में बातचीत की ‘बैटरी’ कब से खत्म है। मोबाइल को चार्ज करने के लिए हमें बस एक सॉकेट चाहिए। रिश्ते चार्ज करने के लिए आदमी चाहिए। ऐसे आदमी हर घर में हैं जरूर, लेकिन अपने-अपने मोबाइल में।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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