पत्रकारिता केवल घटनाओं का वीडियो बनाने, किसी आंदोलन में पहुँचने या कैमरे के सामने खड़े होकर सवाल पूछने का नाम नहीं है। इसका वास्तविक आधार तथ्यपरकता, निष्पक्षता, स्रोतों की विश्वसनीयता, संदर्भों की समझ और सार्वजनिक जवाबदेही है। जब इन मूलभूत मानकों के स्थान पर लोकप्रियता, व्यूज, सब्सक्राइबर और राजनीतिक प्रभाव प्रमुख होने लगते हैं, तब पत्रकारिता के पेशेवर चरित्र पर विचार करना आवश्यक हो जाता है।
कंटेंट क्रिएटर्स की राजनीतिक निष्पक्षता पर सवाल
वर्तमान समय में कुछ स्वतंत्र पत्रकारों और सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर्स की राजनीतिक निष्पक्षता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। आरोप लगाए जाते हैं कि विभिन्न राजनीतिक दल अपने प्रचार और जनमत को प्रभावित करने के उद्देश्य से डिजिटल माध्यमों का उपयोग करते हैं। राजनीतिक संचार में सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपने आप में अनुचित नहीं है।
समस्या तब उत्पन्न होती है, जब प्रायोजित सामग्री और स्वतंत्र पत्रकारिता के बीच का अंतर छिपा दिया जाता है। यदि किसी वीडियो, रील या अभियान के लिए राजनीतिक अथवा आर्थिक भुगतान किया गया है, तो उसकी पारदर्शिता आवश्यक है। दर्शकों को यह जानने का अधिकार है कि वे स्वतंत्र संपादकीय सामग्री देख रहे हैं या किसी प्रायोजित राजनीतिक अभियान का हिस्सा हैं।
डिजिटल पत्रकारिता भी आर्थिक गतिविधि का माध्यम
सोशल मीडिया से आय अर्जित करना गलत नहीं है। प्रत्येक पेशे की तरह डिजिटल पत्रकारिता भी आर्थिक गतिविधि का माध्यम हो सकती है। लेकिन आर्थिक लाभ के लिए तथ्यों से समझौता करना, एकतरफा सामग्री प्रस्तुत करना अथवा राजनीतिक हितों के अनुरूप जनमत को प्रभावित करना गंभीर नैतिक प्रश्न खड़े करता है।
पत्रकारिता का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि किसी रील को कितने व्यूज मिले या किसी व्यक्ति के कितने सब्सक्राइबर हैं, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि उसकी सामग्री कितनी प्रमाणिक, संतुलित और जनहितकारी है।
निर्भीक पत्रकारिता बनाम गोदी मीडिया
इस संदर्भ में एक दूसरी प्रवृत्ति भी ध्यान देने योग्य है। जो पत्रकार सरकार की आलोचना करता है, उसे प्रायः स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता का प्रतिनिधि माना जाता है, जबकि सरकार की उपलब्धियों और विकास कार्यों की चर्चा करने वाले पत्रकार को कभी-कभी ‘गोदी मीडिया’ कहकर खारिज कर दिया जाता है।
यह दृष्टिकोण पत्रकारिता की स्वतंत्रता को एकतरफा कसौटी में बाँधने का प्रयास है। सरकार की आलोचना करना पत्रकारिता का महत्त्वपूर्ण दायित्व है, लेकिन सरकार के अच्छे कार्यों को सामने रखना भी उतना ही वैध और आवश्यक है। इसी प्रकार विपक्षी दलों की आलोचना करना किसी पत्रकार को सत्ता का समर्थक नहीं बना देता।
क्या पत्रकार राजनीतिक पक्षों के लिए समान मापदंड अपनाते हैं?
वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या पत्रकार सभी राजनीतिक पक्षों के लिए समान मापदंड अपनाता है? यदि किसी राज्य में भाजपा की सरकार है और दूसरे राज्य में किसी विपक्षी दल की सरकार है, तो क्या पत्रकार दोनों जगह प्रशासनिक विफलताओं, भ्रष्टाचार के आरोपों, पुलिस की कार्रवाई और जनता की समस्याओं पर समान गंभीरता से सवाल उठाता है?
यदि रिपोर्टिंग में लगातार एकतरफापन दिखाई देता है, तो उसके दृष्टिकोण की समीक्षा होनी चाहिए। हालांकि, निष्पक्षता का आकलन किसी व्यक्ति की राजनीतिक पसंद का अनुमान लगाकर नहीं, बल्कि उसके प्रकाशित कार्य, तथ्यों और रिपोर्टिंग के व्यापक रिकॉर्ड के आधार पर किया जाना चाहिए।
पत्रकारिता के लिए प्रमाणपत्र कितना जरूरी?
पत्रकारिता की पेशेवर योग्यता पर चर्चा करते समय प्रशिक्षण और प्रमाणपत्रों का प्रश्न भी उठता है। पत्रकारिता में डिप्लोमा, डिग्री और औपचारिक प्रशिक्षण तथ्य-जांच, मीडिया नैतिकता तथा कानूनी दायित्वों की समझ विकसित करने में सहायक होते हैं। फिर भी केवल प्रमाणपत्र न होने के आधार पर किसी व्यक्ति को पत्रकारिता से बाहर नहीं किया जा सकता, क्योंकि पत्रकारिता की विश्वसनीयता उसके वास्तविक कार्य से भी निर्धारित होती है।
इसी प्रकार, डिग्री प्राप्त कर लेना भी निष्पक्षता की गारंटी नहीं है। आवश्यक यह है कि प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह पारंपरिक मीडिया से जुड़ा हो या डिजिटल मंच से, पेशेवर मानकों और जवाबदेही का पालन करे।
पत्रकारिता का मंच असहज प्रश्नों से बचने के लिए नहीं
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के संदर्भ में सामने आए घटनाक्रम को भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। उपलब्ध कराए गए विवरण के अनुसार, वहां सवाल पूछने वाले कुछ लोगों के संबंध में 50 या 100 रुपये देकर बाहर करने जैसी टिप्पणी की गई और बाद में हूटिंग भी हुई। इस विवरण की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन यदि घटनाक्रम ऐसा ही था, तो यह सार्वजनिक संवाद की गरिमा से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।
किसी सवाल से असहमत होना और सवाल पूछने वाले को अपमानित करना दो अलग बातें हैं। पत्रकारिता का मंच असहज प्रश्नों से बचने के लिए नहीं, बल्कि उनके उत्तर देने के लिए होना चाहिए। प्रेस क्लब जैसे संस्थानों की प्रतिष्ठा इसी बात से निर्धारित होती है कि वहाँ असहमति और आलोचना के लिए कितना सम्मानजनक स्थान उपलब्ध है।
पेपर लीक पर जवाबदेही
नीट परीक्षा से जुड़े विवाद ने भी विद्यार्थियों, अभिभावकों और परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता के प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। प्रश्नपत्र लीक होने और परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर विद्यार्थियों तथा अभिभावकों ने जवाबदेही की मांग की। उस समय उनकी चिंताएं केवल राजनीतिक नहीं थीं; उनके भविष्य, परिश्रम और परीक्षा की निष्पक्षता का प्रश्न भी उनसे जुड़ा था। ऐसे मामलों में सरकार और संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों की पहचान की जाए और प्रभावित विद्यार्थियों को उचित समाधान मिले।
हालांकि, किसी आंदोलन की प्रकृति समय के साथ बदल भी सकती है। प्रारंभ में विद्यार्थियों और अभिभावकों की समस्याओं पर केंद्रित आंदोलन में बाद के चरणों में राजनीतिक दलों की भागीदारी बढ़ सकती है। यदि ऐसा होता है, तो आंदोलन की मांगों, नेतृत्व और राजनीतिक दिशा की समीक्षा करना स्वाभाविक है।
यह देखना आवश्यक है कि मूल मुद्दे अभी भी केंद्र में हैं या आंदोलन व्यापक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बनता जा रहा है। फिर भी, विपक्षी दलों की भागीदारी मात्र से किसी आंदोलन की वैधता समाप्त नहीं हो जाती। आंदोलन का मूल्यांकन उसकी मांगों, प्रमाणों, उद्देश्यों और आचरण के आधार पर होना चाहिए।
कानून के अनुसार कार्रवाई
यही कसौटी चुनाव आयोग के संबंध में उठाए जाने वाले सवालों पर भी लागू होती है। यदि किसी राजनीतिक दल या समूह को चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची या आयोग की निष्पक्षता पर संदेह है, तो उसे अपने आरोपों के समर्थन में दस्तावेज, आंकड़े, विशिष्ट उदाहरण और अन्य उपलब्ध प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए।
गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और अनियमितता प्रमाणित होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। किसी संवैधानिक संस्था को आलोचना से परे नहीं माना जा सकता, लेकिन आरोप लगा देना और आरोप प्रमाणित हो जाना दो अलग स्थितियां हैं।
लोकतांत्रिक अंतर समझना आवश्यक
यहां एक बुनियादी लोकतांत्रिक अंतर समझना आवश्यक है। किसी पदाधिकारी का इस्तीफा मांगना राजनीतिक अभिव्यक्ति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह तय करना कि इस्तीफा अनिवार्य है या किसी पदाधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए, केवल राजनीतिक दबाव का विषय नहीं हो सकता। इसके लिए संबंधित संवैधानिक प्रावधानों, कानूनी प्रक्रियाओं और उपलब्ध प्रमाणों का सहारा लेना आवश्यक है।
चुनाव आयोग हो या कोई अन्य संवैधानिक संस्था, उसकी जवाबदेही और स्वतंत्रता दोनों का सम्मान होना चाहिए। लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार है, लेकिन हर संस्था के प्रमुख का इस्तीफा राजनीतिक मांग के आधार पर अनिवार्य नहीं किया जा सकता।
आंदोलनों और पुलिस की कार्रवाई
आंदोलनों और पुलिस की कार्रवाई के संदर्भ में भी इसी प्रकार संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है। यदि पुलिस पर बर्बरता या अनुचित कार्रवाई के आरोप हैं, तो उनकी जाँच होनी चाहिए। यदि प्रदर्शनकारियों पर हिंसा, अनुशासनहीनता या कानून उल्लंघन के आरोप हैं, तो उन पर भी उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर विचार होना चाहिए। किसी एक पक्ष के दावे को बिना जांच स्वीकार करना और दूसरे पक्ष को बिना प्रमाण दोषी ठहराना, दोनों ही निष्पक्षता के विरुद्ध हैं।
नेपाल और बांग्लादेश के उदाहरणों के माध्यम से भारत की राजनीतिक परिस्थितियों की तुलना की जाती है, तो उन तुलनाओं के सामाजिक, संवैधानिक और राजनीतिक आधारों की भी जाँच आवश्यक है। केवल किसी उदाहरण का उल्लेख करने से किसी आंदोलन के उद्देश्य या परिणाम के बारे में निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
लोकतंत्र में सरकार की आलोचना का महत्व
लोकतंत्र में सरकार की आलोचना, विपक्ष की आलोचना, शांतिपूर्ण विरोध और स्वतंत्र अभिव्यक्ति सभी का महत्व है। लेकिन इन अधिकारों के साथ तथ्यपरकता और जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। किसी व्यक्ति या समूह के आचरण पर सवाल उठाना उचित है, पर कुछ व्यक्तियों की गतिविधियों के आधार पर पूरे पत्रकार समुदाय या पूरे आंदोलन को अराजक घोषित कर देना भी उचित नहीं होगा। इसी तरह, पत्रकारिता की स्वतंत्रता का दावा करने वाले व्यक्ति को भी अपने दावों की पुष्टि करने, असहमति का सम्मान करने और गलत सूचना सामने आने पर उसे सुधारने की जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए।
प्रमाणों को प्राथमिकता दे
अंततः, पत्रकारिता का पहला दायित्व जनता के प्रति है, किसी राजनीतिक दल, सरकार या विपक्ष के प्रति नहीं। सरकार की उपलब्धियों को सामने लाना और उसकी कमियों पर सवाल उठाना परस्पर विरोधी कार्य नहीं हैं। विपक्ष की भूमिका की समीक्षा करना और उसके वैध सवालों को स्थान देना भी एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं है। आवश्यकता ऐसी पत्रकारिता की है जो राजनीतिक पक्षधरता के बजाय प्रमाणों को प्राथमिकता दे, आर्थिक संबंधों में पारदर्शिता रखे और जनता को सूचित निर्णय लेने में सहायता करे।
हर कैमरा पत्रकारिता नहीं करता, हर माइक सच नहीं बोलता और हर वायरल वीडियो जनहित की आवाज नहीं होता। पत्रकारिता की असली पहचान उसके तथ्यों, निष्पक्षता, नैतिक साहस और जवाबदेही से होती है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब सवाल सरकार से भी पूछे जाएं, विपक्ष से भी, मीडिया से भी और आंदोलनों का नेतृत्व करने वालों से भी। किसी को भी सवालों से ऊपर नहीं रखा जा सकता। यही स्वतंत्र पत्रकारिता का वास्तविक गुणधर्म है।
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नोट- ये लेख श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज डीयू के असिस्टेंट प्रोफेसर, डॉ. अमरेंद्र कुमार पाण्डेय के विचारों पर आधारित है।
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