अमित शाह के राजनीतिक जीवन में संघर्ष, जूझने और संगठन के लिए पूरी निष्ठा से मेहनत करने की कई कहानियां हैं।
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बहरहाल, इस सवाल को यहीं छोड़कर यह सवाल भी उठाया जाना स्वाभाविक है कि वे भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नहीं रहे, लिहाजा दिल्ली की हार या जीत के लिए उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं रही। इसके बावजूद वे ना केवल पार्टी के प्रचार में पर्चे बांट रहे हैं तो ये चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न तो बन ही गया है। ।
दरअसल, कम से कम अमित शाह का दिल्ली की गलियों में पर्चे बांटने उतरना इस बात का भी द्योतक है कि भाजपा चुनौती की गंभीरता को समझ रही है। इस रूप में भी कि दिल्ली में बीते-2 दशकों से सरकार का सपना देख रही भाजपा के लिए दिल्ली की जीत इतनी आसान नहीं है। बिजली पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों के जरिए आम आदमी पार्टी ने केवल भाजपा ही नहीं बल्कि मुख्यधारा की कई पार्टियों के लिए चुनौती खड़ी कर दी है। विकास के दावे कितने सही और जमीन पर कितने झूठे हैं ये और बात है, लेकिन जनता में चर्चा होने को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बहरहाल, वैसे भी देखा जाए तो हकीकत तो यह है कि दिल्ली में जीत हो या फिर हार, आलोचना के घेरे में ना सिर्फ अमित शाह, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी रहने वाले हैं। अगर दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की जीत हुई तो आलोचक यह कहते नहीं थकेंगे कि केजरीवाल के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पूरी फौज उतार दी और मुकाबला बराबरी का नहीं रहा। लेकिन अगर दिल्ली के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की हार हुई तो अमित शाह और नरेंद्र मोदी की आलोचना के शब्दों की डिग्री और कम होगी।
इस तरह देखा जाए तो भाजपा के लिए दिल्ली का चुनाव कई तरह के मानकों पर खरा उतरने वाला होगा। जाहिर है पार्टी ये चुनाव हारती है तो इस हार से भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल जरूर टूट जाएगा।
पहले महाराष्ट्र में सरकार ना बनने, हरियाणा में कमजोर प्रदर्शन और झारखंड में हार के चलते भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल वैसे ही कमजोर है। जाहिर है कि दिल्ली की हार इस मनोबल को और तोड़ देगी, जो भारतीय जनता पार्टी की भावी सेहत के लिए और खराब ही होगा।
राजनीति के चाणक्य की उपमा पा चुके अमित शाह को पता है कि लड़ाई कहां और कैसे लड़नी है। निचले स्तर पर केजरीवाल की पैठ को वहीं जाकर चुनौती देने की ये रणनीति कितनी कारगर होगी ये तो वक्त ही बताएगा, पर शाह ने कमर कस रखी है और वो दिख रहा है।
भाजपा अरविंद केजरीवाल के खिलाफ कोई चेहरा क्यों नहीं तलाश पाई ये तो भाजपा को ही सोचना है पर फिलवक्त अमित शाह ने आमने-सामेन की लड़ाई का बीड़ा उठा रखा है।
दरअसल, अमित शाह राजनीति को लेकर कितने गंभीर हैं और बेहतर नतीजे हासिल करने के लिए कितने सजग, इसका जिक्र अनिर्वान गांगुली की लिखी किताब ‘अमित शाह: भाजपा की यात्रा’ में वर्णित एक प्रसंग का उदाहरण देना समीचीन होगा।
इस प्रसंग के मुताबिक, 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान अमेठी के जगदीशपुर में अमित शाह ने एक बैठक बुलाई थी। जो अमेठी की डालडा फैक्ट्री के गोदाम में हुई थी। इस बारे में इस किताब में लिखा गया है, ‘संभवतः यह आकस्मिक बुलाई गई बैठक हो। बैठक देर रात दो बजे तक चली।
अमेठी के भाजपा कार्यकर्ताओं ने यह सोचकर अमित शाह के रुकने की व्यवस्था नहीं कराई कि बैठक के बाद वे वापस चले जाएंगे। लेकिन उन्हें इसका अनुमान नहीं रहा कि शाह संगठन प्रवास में रात्रि निवास को लेकर अत्यंत प्रतिबद्ध हैं। बैठक के बाद जब सभी पदाधिकारी लखनऊ लौटने लगे, तो पता चला कि वहां भाजपा अध्यक्ष के ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं हुई है।
अमेठी से लखनऊ डेढ़ घंटे का रास्ता है। देर रात हो चुकी थी। शाह ने उसी गोदाम में ठहरने का निश्चय किया। वे छत पर गए और रात्रि विश्राम के लिए माकूल स्थान तलाशने लगे। वहां एक छोटा सा कमरा था, अव्यवस्थित ढंग से रात्रि विश्राम की थोड़ी गुंजाइश थी। शाह ने डालडा फैक्ट्री के उसी गोदाम में रात्रि निवास किया।’
अऱविंद केजरीवाल भाजपा के लिए चुनौती बने हुए हैं।
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बहरहाल, अमित शाह के राजनीतिक जीवन में संघर्ष, जूझने और संगठन के लिए पूरी निष्ठा से मेहनत करने की कई कहानियां हैं, लेकिन दिल्ली का चुनाव उनके लिए इतना आसान नहीं होगा।
जाति, धर्म, वर्ग और संप्रदाय की राजनीति से देश की राजनीति को अलग कर केवल सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास का नारा देने वाली भाजपा को अब विकास केंद्रित राजनीति को जमीन पर आकार देना होगा और अमित शाह के लिए इसी संदेश को दिल्ली की जनता तक पहुंचाना चुनौती होगी।
दरअसल, बड़बोले नेता अपनी बयानबाजियों से पीएम मोदी के लिए भी मुसीबत खड़ी करते रहे हैं, ऐसे में शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, रोजगार के मुद्दे पर विकास केंद्रित राजनीति करने की छवि भी अब पार्टी को खड़ी करनी होगी। यही अमित शाह के लिए चुनौती भी हैं और जाहिर है वे यह समझ चुके हैं कि स्वच्छता अभियान से लेकर, उज्वला योजना जैसी सफलता उसी विकास केंद्रित राजनीति का हिस्सा है और इसे गलियों में उतरकर ही समझाया जा सकता है।
जाहिर है देखने वाली बात यह होगी कि अमित शाह का यह जुझारूपन पार्टी को दिल्ली में कितनी सीटें दिलवा पाता है?
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