हाथियों के घटते प्राकृतिक आवास
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उत्तराखंड के हरिद्वार-देहरादून के बीच संचालित रेलवे लाइन राजाजी नेशनल पार्क के बीच से गुजरती है। करीबन हर साल यहां ट्रेन से कटकर हाथियों की दर्दनाक मौत होती है। हाथियों के लिए इस खूनी ट्रैक पर बीते कुछ वर्षों में 32 हाथी मर चुके हैं। पर आज तक इन हादसों को रोकने का स्थाई समाधान नहीं निकाला जा सका है।
ऐसा भी नहीं है कि हाथियों के संरक्षण के लिए प्रयास नहीं हो रहे हैं। पूरे विश्व में बाघ, चीते और अन्य विलुप्त हो रहे जीवों के साथ हाथियों को भी शेड्यूल के तहत संरक्षण दिया गया है। इनके प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए साल 2012 से हर साल 12 अगस्त को विश्व हाथी दिवस मनाया जाने लगा है।
भारत सरकार ने तो वर्ष 1992 में ही हाथी परियोजना का शुभारंभ कर दिया था। इसके अच्छे परिणाम भी सामने आए हैं। देश में हाथियों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। केंद्रीय वन मंत्रालय ने एलिफेंट प्रोजेक्ट के तहत वर्ष 2017 में देश में हाथियों की जनगणना कराई थी। इसके अनुसार देश में हाथियों की कुल संख्या 29,964 थी, जो 1993 में 25569 थी।
पर यह विडंबना ही है कि जहां एक तरफ भारत में हाथियों की संख्या बढ़ रही है वहीं दूसरी तरफ उनके प्राकृतिक आवास तेजी से घट रहे हैं। एशियाई हाथियों की सबसे ज्यादा संख्या भारत में है, जो पूरी दुनिया में मौजूद एशियाई हाथियों की कुल संख्या का तकरीबन 60 प्रतिशत है।
दूसरी तरफ तेजी से घट रहे हाथियों के प्राकृतिक आवास ने मनुष्यों के साथ उसके बढ़ते संघर्ष को और गंभीर बना दिया है। विकास समय की मांग है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। पर विकास के साथ ही हाथियों के सुरक्षित कॉरिडोर को और अधिक बढ़ाने की जरूरत से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है।
यह वैसे ही संभव किया जा सकता है जैसे हम बाघ और चीतों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्धता दिखा रहे हैं। ऐसा न हो कि हम बाघ और चीता सहेजते रहें, कहीं हाथी हाथ से न निकल जाए।
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