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विमर्श: हम बाघ और चीता सहेजते रहे, कहीं हाथी हाथ से न निकल जाए?

सार

यह विडंबना ही है कि जहां एक तरफ भारत में हाथियों की संख्या बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ उनके प्राकृतिक आवास तेजी से घट रहे हैं। एशियाई हाथियों की सबसे ज्यादा संख्या भारत में है, जो पूरी दुनिया में मौजूद एशियाई हाथियों की कुल संख्या का तकरीबन 60 प्रतिशत है।
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एशियन हाथियों ने पूरे एशिया में अपने प्राकृतिक आवास का करीब दो तिहाई हिस्सा खो दिया है। - फोटो : Twitter
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विस्तार
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ऑस्कर में "द एलिफेंट व्हिस्पर्स" ने भारतीय हाथियों के प्रति पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित किया है। अभी इसका जश्न ठंडा भी नहीं पड़ा है कि हाथियों से जुड़े एक अंतरराष्ट्रीय शोध पत्र ने बेहद चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। यह रिपोर्ट कहती है कि एशियन हाथियों ने पूरे एशिया में अपने प्राकृतिक आवास का करीब दो तिहाई हिस्सा खो दिया है। हम मनुष्यों ने विकास के नाम पर जंगलों की कटाई और अवैध कब्जे कर इन हाथियों के प्राकृतिक आवास को नष्ट कर दिया है। इसके कारण जहां एक तरफ इनके अस्तित्व पर संकट गहरा गया है, वहीं मनुष्यों के साथ हिंसक टकराव की आशंका और बढ़ गई है।

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शोधकर्ताओं ने अपने रिसर्च में बताया है कि एशिया महाद्वीप के 13 देशों में पाए जाने वाले हाथियों ने वर्ष 1700 के बाद से अपने वन और घास के मैदानों का 64% से अधिक हिस्सा खो दिया है। हाथियों के प्राकृतिक आवास में सबसे बड़ी गिरावट चीन में दर्ज की गई है। जहां 1700 और 2015 के बीच 94% उपयुक्त भूमि खो गई। इसके बाद भारत है, जिसने 86% भू-भाग को खो दिया।

यह बेहद चौंकाने वाले तथ्य हैं और बताने के लिए काफी हैं कि क्यों हाल के वर्षों में भारत में हाथियों और मनुष्यों के बीच हिंसक टकराव बढ़ गया है।

नेचर की जर्नल साइंटिफिक की रिपोर्ट बताती है कि भारत और चीन के अलावा बांग्लादेश, थाईलैंड, वियतनाम और इंडोनेशिया के सुमात्रा में आधे से अधिक उपयुक्त हाथी आवास खत्म हो गए हैं। भूटान, नेपाल और श्रीलंका में भी कमोबेश हालात यही हैं। यहां तो हाथियों की संख्या में भी काफी गिरावट दर्ज की जा रही है। रिपोर्ट कहती है कि पहले जहां हाथी अपने आवासीय क्षेत्र के 45 प्रतिशत भू-भाग में स्वच्छंद विचरण करते थे, वहीं अब यह घटकर 7.5 प्रतिशत रह गई है।   

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 हाथियों से संघर्ष में प्रतिवर्ष 500 से अधिक की मौत

भारत में हाथियों के साथ संघर्ष में औसतन प्रतिदिन एक व्यक्ति मारा जा रहा है। भारत में झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़िसा, असम, छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु में यह संघर्ष कुछ अधिक है। केंद्रीय वन मंत्रालय की एक रिपार्ट कहती है कि भारत में प्रतिवर्ष करीब पांच सौ लोगों की मौत इस संघर्ष में हो रही है।

हालांकि ऐसा नहीं है कि सिर्फ मनुष्यों की जान जा रही है। नुकसान हाथियों को भी हो रहा है। साल 2020 की उस दर्दनाक तस्वीरों को कोई कैसे भूल सकता है। पूरी दुनिया ने देखा था कि केरल के साइलेंट वैली नेशनल पार्क में एक गर्भवती मादा हाथी ने कैसे तड़प तड़प कर अपनी जान दे दी थी। किसी ने उसे पटाखों से भरा अनानास खिला दिया था। मुंह के अंदर ही पटाखा फट जाने से उसका जबड़ा पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। अपनी जलन को कम करने के लिए वह गभर्वती करीब दो सप्ताह तक झील में खड़ी रही। जलन के कारण वो न कुछ खा सकती थी और न पी सकती थी। अंततः उसने गर्भ में पल रहे बच्चे के साथ ही झील में दम तोड़ दिया।

इस भयानक, दुखद, क्रूर और अमानवीय कृत्य ने पूरे विश्व को झकझोर कर रख दिया था। भारत सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि हर साल करीब सौ हाथी इस तरह के संघर्ष में अपनी जान गंवा देते हैं।

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हाथियों के घटते प्राकृतिक आवास - फोटो : Pixabay
उत्तराखंड के हरिद्वार-देहरादून के बीच संचालित रेलवे लाइन राजाजी नेशनल पार्क के बीच से गुजरती है। करीबन हर साल यहां ट्रेन से कटकर हाथियों की दर्दनाक मौत होती है। हाथियों के लिए इस खूनी ट्रैक पर बीते कुछ वर्षों में 32 हाथी मर चुके हैं। पर आज तक इन हादसों को रोकने का स्थाई समाधान नहीं निकाला जा सका है।

ऐसा भी नहीं है कि हाथियों के संरक्षण के लिए प्रयास नहीं हो रहे हैं। पूरे विश्व में बाघ, चीते और अन्य विलुप्त हो रहे जीवों के साथ हाथियों को भी शेड्यूल के तहत संरक्षण दिया गया है। इनके प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए साल 2012 से हर साल 12 अगस्त को विश्व हाथी दिवस मनाया जाने लगा है।

भारत सरकार ने तो वर्ष 1992 में ही हाथी परियोजना का शुभारंभ कर दिया था। इसके अच्छे परिणाम भी सामने आए हैं। देश में हाथियों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। केंद्रीय वन मंत्रालय ने एलिफेंट प्रोजेक्ट के तहत वर्ष 2017 में देश में हाथियों की जनगणना कराई थी। इसके अनुसार देश में हाथियों की कुल संख्या 29,964 थी, जो 1993 में 25569 थी।

पर यह विडंबना ही है कि जहां एक तरफ भारत में हाथियों की संख्या बढ़ रही है वहीं दूसरी तरफ उनके प्राकृतिक आवास तेजी से घट रहे हैं। एशियाई हाथियों की सबसे ज्यादा संख्या भारत में है, जो पूरी दुनिया में मौजूद एशियाई हाथियों की कुल संख्या का तकरीबन 60 प्रतिशत है।

दूसरी तरफ तेजी से घट रहे हाथियों के प्राकृतिक आवास ने मनुष्यों के साथ उसके बढ़ते संघर्ष को और गंभीर बना दिया है। विकास समय की मांग है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। पर विकास के साथ ही हाथियों के सुरक्षित कॉरिडोर को और अधिक बढ़ाने की जरूरत से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है।

यह वैसे ही संभव किया जा सकता है जैसे हम बाघ और चीतों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्धता दिखा रहे हैं। ऐसा न हो कि हम बाघ और चीता सहेजते रहें, कहीं हाथी हाथ से न निकल जाए।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें। 
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