भारत में गधों की घटती आबादी न केवल एक पर्यावरणीय और सामाजिक चिंता का विषय है, बल्कि यह मानवता की कृतघ्नता और प्रकृति से बढ़ते अलगाव को भी दर्शाती है। गधे, जो सहस्राब्दियों से मानव सभ्यता के सहयोगी रहे हैं, आज उपेक्षा, क्रूरता और तेजी से कम होती संख्या का सामना कर रहे हैं। गधों की घटती आबादी और उनके प्रति हमारी उदासीनता हमारी प्रकृति और सहजीवी प्राणियों के प्रति बढ़ते अलगाव को दर्शाती है।
गधे, जो कभी मानव सभ्यता के आधार थे, आज उपेक्षा और शोषण का शिकार हैं। उनकी आबादी में 90% तक की कमी, क्रूरता और यंत्रीकरण के कारण उनकी उपयोगिता में कमी, और वैश्विक मांग जैसे ईजियाओ चीनी औषधि ने इस संकट को और गहरा किया है।
यह समय है कि हम गधों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार करें और उनके संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाएँ। गधों का संरक्षण केवल एक प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि हमारी मानवता और प्रकृति के साथ हमारे रिश्ते को पुनर्जनन का एक अवसर है।
गधों की आबादी में भयावह कमी
भारत में गधों की आबादी में पिछले कुछ दशकों में भयावह कमी देखी गई है। 1992 में देश में गधों की संख्या 96,77,000 थी, जो 2012 में घटकर 3,20,000 हो गई और 2019 तक यह और कम होकर मात्र 1,12,000 रह गई। 20वें पशुधन सर्वेक्षण (2019) के अनुसार, 1992 से 2019 तक गधों की आबादी में 90% की कमी आई।
2012 से 2019 के बीच ही उनकी संख्या में 61% की गिरावट दर्ज की गई। मध्य प्रदेश की नवीनतम जनगणना के अनुसार, वहाँ अब केवल 3,052 गधे बचे हैं, जो 1997 की तुलना में 94% की कमी को दर्शाता है।
स्टुअर्ट एल. नॉरिस और उनके सहयोगियों के 2021 के एक तुलनात्मक अध्ययन के अनुसार, 1997 से 2018 के बीच भारत में गधों और खच्चरों की संख्या में 74% की गिरावट आई, जो चीन की 72% की गिरावट से भी अधिक है।
राजस्थान में गधों की सबसे अधिक आबादी
2019 के पशुधन सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में गधों की सबसे अधिक आबादी राजस्थान में है, जहाँ उनकी संख्या लगभग 23,000 है। हालांकि, राजस्थान में भी 2012 से 2019 के बीच गधों की आबादी में 71.31% की कमी आई है। इसके विपरीत, पूर्वोत्तर राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मिजोरम और मणिपुर में गधों की संख्या बहुत कम है, जहां अरुणाचल प्रदेश में यह 100 से भी कम है।
यह भौगोलिक विविधता गधों के उपयोग और उनकी आबादी को प्रभावित करने वाले क्षेत्रीय कारकों को दर्शाती है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एक रिपोर्ट में 2019 में गधों की आबादी को 18 लाख अनुमानित किया गया था।
यह आंकड़ा 20वें पशुधन सर्वेक्षण के 1,12,000 के आंकड़े से भिन्न है, जो डेटा संग्रह में असंगतियों और सर्वेक्षण की सीमाओं को दर्शाता है। फिर भी, दोनों स्रोत इस बात पर सहमत हैं कि गधों की संख्या में तेजी से कमी आ रही है।
गधों की आबादी में कमी के कई कारण
गधों की आबादी में कमी के कई कारण हैं। भारत में कृषि और परिवहन में मशीनीकरण का बढ़ता उपयोग गधों की पारंपरिक भूमिकाओं को समाप्त कर रहा है। ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल और अन्य मोटर चालित वाहनों ने गधों को बड़े पैमाने पर प्रतिस्थापित कर दिया है, जो तेज और अधिक कुशल हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में, जहाँ गधे पहले सामान और लोगों को ऊबड़-खाबड़ इलाकों में ले जाने के लिए उपयोग किए जाते थे, अब मोटर चालित वाहनों का उपयोग बढ़ गया है।
गधों की आबादी पर एक और गंभीर खतरा चीनी पारंपरिक औषधि में उपयोग होने वाली "ईजियाओ" (गधे की खाल से बनी जिलेटिन) की बढ़ती मांग है। 2011 में लोकप्रिय चीनी धारावाहिक "Empresses in the Palace" और चीन की समृद्धि व वृद्ध जनसंख्या के कारण इस उत्पाद की माँग में भारी वृद्धि हुई।
यह मांग वैश्विक स्तर पर गधों की आबादी को प्रभावित कर रही है, क्योंकि गधों की खाल के लिए उनका शिकार और निर्यात बढ़ गया है। यदि अन्य देश अपने गधों की सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाते, तो यह वैश्विक संकट इतना गंभीर न होता।
भारत में गधों को पर्यटन गतिविधियों, जैसे सवारी और सफारी, में उपयोग के दौरान क्रूरता, उपेक्षा और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। कई गधे अपर्याप्त भोजन, पानी और पशु चिकित्सा देखभाल के कारण कष्ट झेलते हैं। यह उनकी जीवन प्रत्याशा और प्रजनन दर को और कम करता है।
विकासशील देशों में गधों की कीमतों में वृद्धि ने गरीब समुदायों, विशेष रूप से महिलाओं और लड़कियों, पर बोझ बढ़ा दिया है। गधों की अनुपस्थिति में, परिवहन और बोझ ढोने का काम अक्सर इन समुदायों की महिलाओं और लड़कियों पर आ जाता है, जिससे उनकी मेहनत और कठिनाई बढ़ जाती है।
गधे और मानव के बीच एक गहरा रिश्ता
गधे केवल उपयोगी पशु ही नहीं, बल्कि मानव सभ्यता का एक अभिन्न अंग रहे हैं। सात हजार वर्षों से गधे और मानव के बीच एक गहरा रिश्ता रहा है। प्राचीन काल में, गधों ने कारीगरों, व्यापारियों और प्रशासकों के लिए माल ढोने और यात्रा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारत में, गधों ने काफिलों को खींचा, जो शहरों को जोड़ते थे, और यहाँ तक कि संतों और देवताओं को ढोने का काम भी किया। कुछ ही पीढ़ियों पहले तक, गधे ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे।
आज भी, भारत के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां मोटर चालित परिवहन संभव या किफायती नहीं है, गधे सामान और लोगों को ले जाने के लिए उपयोग किए जाते हैं। इसके अलावा, इको-टूरिज्म में गधों का उपयोग बढ़ रहा है, जहाँ वे पर्यटकों के लिए सवारी या पैक पशु सेवाएँ प्रदान करते हैं।
हालांकि गधे विश्व स्तर पर विलुप्त होने के खतरे का सामना नहीं कर रहे हैं, क्योंकि उनकी आबादी वैश्विक स्तर पर स्थिर है, लेकिन भारत जैसे क्षेत्रों में उनकी संख्या में भारी कमी चिंता का विषय है। कुछ क्षेत्रीय आबादी निवास स्थान की हानि, बीमारी और अत्यधिक शोषण के कारण संकटग्रस्त हो सकती है।
भारत में, गधों को संकटग्रस्त प्रजाति के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है, लेकिन उनकी घटती संख्या और खराब कल्याण स्थिति को संबोधित करने की तत्काल आवश्यकता है।
गधा मुर्ख नहीं बुद्धिमान जीव है
गधों को अक्सर "मूर्ख" या "जिद्दी" जानवर के रूप में देखा जाता है, जो एक गलत धारणा है। वास्तव में, गधे अत्यधिक बुद्धिमान, अनुकूलनीय और संवेदनशील प्राणी हैं। वे कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने, भारी बोझ ढोने और ऊबड़-खाबड़ इलाकों में स्थिरता बनाए रखने की अपनी क्षमता के लिए जाने जाते हैं।
गधे सामाजिक जानवर हैं, जो अपने मालिकों और झुंड के साथियों के साथ मजबूत बंधन बनाते हैं। वे समस्या-समाधान, संचार और सामाजिक सीखने जैसे जटिल व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। उचित प्रशिक्षण और देखभाल के साथ, गधे सौम्य, वफादार और आज्ञाकारी हो सकते हैं।
गधों के महत्व के बारे में जागरूकता आवश्यकता
गधों की घटती आबादी और उनके कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है। सरकार और गैर-सरकारी संगठनों को गधों के प्रति क्रूरता और उपेक्षा को रोकने के लिए सख्त नीतियाँ लागू करनी चाहिए।
पशु चिकित्सा देखभाल और उचित आश्रय प्रदान करना उनकी जीवन प्रत्याशा को बढ़ा सकता है। गधों पर निर्भर समुदायों के लिए वैकल्पिक आजीविका के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए, ताकि उनकी आर्थिक निर्भरता कम हो और गधों का शोषण रुके।
गधों के महत्व और उनकी बुद्धिमता के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए अभियान चलाए जाने चाहिए। यह उनकी सामाजिक धारणा को सुधार सकता है। गधों के प्रजनन और उनके आवास की रक्षा के लिए टिकाऊ प्रथाओं को बढ़ावा देना चाहिए। ईजियाओ (Ejiao) एक पारंपरिक चीनी औषधि है, जो गधे की खाल को उबालकर बनाई गई जिलेटिन (कोलेजन-आधारित पदार्थ) से तैयार की जाती है।
चीनी पारंपरिक औषधि बाजार की माँग को नियंत्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है। गधों की खाल के निर्यात पर प्रतिबंध और वैकल्पिक सामग्रियों को बढ़ावा देना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।