यह आशंका भी जताई जा रही है कि चुनाव आयोग संवैधानिक प्रावधानों की दुहाई देकर निर्धारित तारीखों में चुनाव कराने का फैसला ले सकता है।
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चुनाव आयोग का फैसला और संकट?
यह आशंका भी जताई जा रही है कि चुनाव आयोग संवैधानिक प्रावधानों की दुहाई देकर निर्धारित तारीखों में चुनाव कराने का फैसला ले सकता है। तो विनम्रतापूर्वक निवेदन है कि भारतीय संविधान असाधारण परिस्थितियों में चुनाव टालने की अनुमति भी देता है। जंग की स्थिति में, आंतरिक अशांति या संकट के दरम्यान भी चुनाव टालने का प्रावधान है।
इसी बरस कोरोना के चलते आयोग ने कुछ उप चुनाव तथा राज्यसभा चुनाव टाले भी हैं। भोपाल गैस त्रासदी के समय भी निर्वाचन क्षेत्र में लोकसभा चुनाव टाला गया था।
इसके बाद अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद अशांति के चलते विधानसभा चुनाव टाले गए थे। मध्यप्रदेश में तो सब कुछ शांत और सामान्य हो गया था। फिर भी कई बार किश्तों में राष्ट्रपति शासन राज्य में लगाया जाता रहा। यानी संविधान की दुहाई देकर जबरन चुनाव थोपना अवाम के साथ नाइंसाफी है। लोकतंत्र करोड़ों हिन्दुस्तानियों ने रचा है। संविधान भारतीयों ने बनाया है। केंद्रीय चुनाव आयोग की रिपोर्टिंग उन भारतीयों के प्रति है, किसी सियासी दल या सरकार के प्रति नहीं।
वैसे सियासी पार्टियों के चुनाव समय पर कराने की राय के पीछे की कहानी छिपी नहीं है। वे अब तक करोड़ों रूपए प्रचार अभियान पर फूंक चुकी हैं। चुनाव टालने पर वे मिटटी में मिल जाएंगे। इसके अलावा पक्ष और प्रतिपक्ष के अपने अपने सोच हैं। विपक्ष का ख्याल है कि यह समय बीजेपी को सत्ता से बाहर करने का श्रेष्ठतम अवसर है और पक्ष यानी भारतीय जनता पार्टी का विचार है कि बीते महीनों से प्रधानमंत्री अपनी धुआंधार रैलियों से उसके पक्ष में मानस बना चुके हैं।
चुनाव आगे बढ़ने पर यह मतदाताओं के मानस पटल से यह सब गायब हो जाएगा। जिन योजनाओं का उदघाटन या शुभारंभ प्रधानमंत्री कर चुके हैं, वे अब दोबारा तो नहीं कराए जा सकते। एक अप्रिय आशंका भी यह हो सकती है कि यदि वाकई कोरोना की तीसरी लहर दूसरी से भी भयावह हुई तो फिर भगवान ही मालिक है। वक्त का तकाजा है कि मुल्क के करोड़ों लोगों की हिफाजत को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
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