जयंती पटनायक के नेतृत्व में राष्ट्रीय महिला आयोग की टीम ने भी इस जघन्य कांड की जांच की।
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महिलाओं ने पुलिसकर्मियों पर उनके हाथों की घड़ियां, गले की सोने की चेन और नकदी लूटने का आरोप भी लगाया। इस काण्ड और जांच के बीच काफी समय गुजर जाने के कारण बलात्कार और लज्जाभंग के आरोपों की पुष्टि में कोई मेडिको-लीगल साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए। सीबीआई से 37 चश्मदीद गवाहों ने महिलाओं से छेड़छाड़ की बात स्वीकार की।
कुछ पत्रकार, जो कि घटना के समय वहां मौजूद थे तथा निकटवर्ती एक होटल के मालिक ने बताया कि पुरुष पुलिसकर्मी आन्दोलनकारी तलाशी के नाम पर महिलाओं के शरीर टटोल रहे थे। रामपुर तिराहे के निकटवर्ती गावों के 70 चश्मदीद गवाहों ने बताया कि महिला आन्दोलनकारियों ने उन्हें पिछली रात उनके साथ हुई छेड़छाड़ और अशोभनीय पुलिस व्यवहार की जानकारी दी थी।...’’
राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा मुजफ्फरनगर काण्ड की जांच
जयंती पटनायक के नेतृत्व में राष्ट्रीय महिला आयोग की टीम ने भी इस जघन्य कांड की जांच की। पुस्तक ‘‘उत्तराखण्ड का नवीन राजनीतिक इतिहास’’ में दिए गए विवरण के अनुसार इस टीम में अध्यक्ष के अलावा पद्मा सेठ, बोनोज सेनापति और श्रीमती इंदिरा मिश्रा शामिल थीं। इस टीम ने गोपेश्वर, श्रीनगर, टिहरी और देहरादून को 13 से 16 अक्तूबर 1994 तक दौरा किया और एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जिसमें 1 और 2 अक्तूबर 1994 की रात्रि को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा की उस भयानक रात के विवरण का एक छोटा सा अंश इस प्रकार हैः-
‘‘रामपुर तिराहे पर अंधेरे में खड़ी बसों के अन्दर धुप अंधेरे में महिलाएं सांस रोके बैठी थीं। महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से बसों के अंदर की लाइटें बंद कर दी गई थीं। इस सन्नाटे के बावजूद पुलिस द्वारा आंसू गैस छोड़ा गया। आतंकित महिलाएं खुली हवा में सांस के लिए बसों से बाहर निकलीं तो उन्हें गन्ने के खेतों की ओर खींच कर ले जाया गया जहां उनकी साड़ियां खींची गईं। एक महिला ने बताया कि पुलिस की लाठियों से बचने के लिए जैसे ही वह भागी तो उसका पैर एक साड़ी से उलझ गया। वहां पर कुछ कपड़े पड़े थे।
स्पष्टतया ये कपड़े रैली में शामिल उन महिलाओं के थे जिन्हें निर्वस्त्र कर दिया गया होगा। उस महिला ने साड़ी से अपना पैर छुड़ाया और फिर वहां से भाग सकी। बदहवासी में वह एक नाले में गिर गई जहां उसके कपड़े कीचड़ में लतपथ हो गए। वह किसी तरह ऋषिकेश पहुंचने में कामयाब हो गई। वह बदहवासी में ही ऋषिकेश पहुंची थी इसलिए लोगों ने पूछा कि आखिर ऐसा क्या हो गया। उसकी दशा को देख कर ही पता चल रहा था कि कुछ अनहोनी हो चुकी है।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार घटनास्थल पर कुछ महिलाऐं केवल पेटीकोट में बदहवास भाग रही थीं। पुलिसकर्मी महिलाओं को मां बहन की गालियां दे रहे थे तथा लड़कियों को हरामी कह रहे थे। यही नहीं पुलिसकर्मी लड़कियों को बलात्कार की धमकियां भी दे रहे थे।
आयोग के समक्ष दो महिलाओं ने अपने साथ बलात्कार होने की बात कही। उनमें से एक पीड़िता ने बताया कि 1 अक्तूबर की रात या 2 अक्तूबर तड़के एक आंसू गैस का गोला उनकी बस के अन्दर गिरा। गोला गिरते ही उसमें सवार अन्य लोग बस से बाहर भाग निकले मगर उस पर गोला सीधे गिरा था इसलिये वह अर्धचेतनावस्था में होने के कारण बस से बाहर नहीं निकल सकी। इतने में दो पुलिसकर्मी बस के अंदर घुसे और उन्होंने उसे निर्वस्त्र कर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया।
यह रैली की बसों की पंक्ति में आगे से दसवीं बस थी। बलात्कारियों के बहसीपन से पीड़िता बेहोश हो गई थी और जब उसे होश आया तो उसके सारे शरीर पर दातों के काटने के निशान थे और .... बस की फर्स पर पड़ा था। दूसरी दुष्कर्म पीड़िता ने बताया कि उसे पुलिसकर्मी खींच कर गन्ने के खेत में ले गए और उसके निजी अंगों पर उन्होंने रायफल की बटों से प्रहार किया। घायल करने के बाद उसके साथ भी दुष्कर्म किया गया।
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