फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मुजफ्फरनगर कांड: सामूहिक बलात्कार में 30 साल बाद मिला "अधूरा न्याय"

सार

2 अक्तूबर 1994 के मुजफ्फरनगर काण्ड के सिलसिले में मसूरी की उत्तराखण्ड संघर्ष समिति की ओर से याचिकाकर्ताः- सुधीर थपलियाल, जोत सिंह एवं देवराज कपूर द्वारा इलाहाबाद हाइकोर्ट में 7 अक्टूवर 1994 को न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवि एस. धवन एवं न्यायमूर्ति ए.बी.श्रीवास्तव की बेंच में याचिका दायर की थी।
विज्ञापन
कोर्ट ने प्रत्येक दोषी पर 50-50 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया है। - फोटो : Istock
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

सन् नब्बे के दशक में पृथक राज्य के लिए भड़के उत्तराखण्ड आन्दोलन के दौरान मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर पुलिस द्वारा दुष्कर्म, छेड़छाड़ और लूटपाट के मामले में उन्नीसवीं सदी में 4 बार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे विलियम एवार्ट ग्लेडस्टन द्वारा कही गई यह कहावत, कि न्याय में विलम्ब होना न्याय से वंचित होने के समान है, एकदम सटीक साबित हो गई है। इस मामले में मुजफ्फरनगर के सत्र न्यायाधीश- कोर्ट नंबर सात विशेष न्यायाधीश (सीबीआई) ने पीएसी के दो सेवानिवृत्त जवानों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।

विज्ञापन


कोर्ट ने प्रत्येक दोषी पर 50-50 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया है। अर्थदंड की धनराशि क्षतिपूर्ति के रूप में पीड़िता को देने के आदेश दिए गए हैं। अक्तूबर 1994 में हुए रामपुर तिराहा कांड में यह पहला फैसला है। इस मामले में न्याय का एक छोटा सा अंश पाने में ही पूरे 30 साल लग गए। इस सजा के बाद भी आरोपियों के पास न्याय के लिए सुप्रीमकोर्ट तक जाने के लिए लम्बा वक्त बचा हुआ है। इतने बड़े और अभूतपूर्व कांड में केवल ये दो पुलिसकर्मी बलात्कारी नहीं थे। सीबीआई जांच में उत्तराखण्ड मूल के दो पुलिसकर्मी भी आरोपी थे जिन्हें राज्य के गठन के बाद सजा मिलने के बजाय तरक्कियां मिलती गईं।  

हाइकोर्ट ने राज्य प्रायोजित आतंकवाद बताया था पुलिस दमन को

दरअसल 2 अक्तूबर 1994 के मुजफ्फरनगर काण्ड के सिलसिले में मसूरी की उत्तराखण्ड संघर्ष समिति की ओर से याचिकाकर्ता- सुधीर थपलियाल, जोत सिंह एवं देवराज कपूर द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट में 7 अक्टूवर 1994 को न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवि एस. धवन एवं न्यायमूर्ति ए.बी.श्रीवास्तव की बेंच में याचिका दायर की थी। इस याचिका पर इलाहाबाद हाइकोर्ट ने पुलिस दमन को राज्य प्रायोजित आतंकवाद बताया था।

कोर्ट ने पूरे घटनाक्रम की जांच के लिए सीबीआई को आदेश जारी किए थे और सीबीआई ने सम्पूर्ण उत्तराखण्ड आन्दोलन में पुलिस दमन की जांच कर अपनी रिपोर्ट कई खण्डों में अदालत में दाखिल की थी। उन्हीं में से एक रिपोर्ट में आंदोलनकारी महिलाओं के साथ दुष्कर्म, लज्जाभंग, घायल करने और लूटपाट का विस्तृत विवरण था जिसे जयसिंह रावत की सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘‘उत्तराखण्ड का नवीन राजनीतिक इतिहास’’ में दिया गया है। उसी विवरण का एक छोटा सा अंश इस प्रकार हैः-  

विज्ञापन


‘‘सीबीआई की पहली रिपोर्ट के पृष्ठ 22 से लेकर 27 तक में बलात्कार एवं लज्जाभंग और छेड़छाड़ का विवरण दिया गया है। इसके समर्थन में संलग्नक भी दिए गए हैं। प्रथम रिपोर्ट के साथ लगे संलग्नक 6 भागों में तथा 391 पृष्ठों में हैं। इसके भाग तीन में गवाहों के बयान दर्ज हैं। इस रिपोर्ट के भाग तीन में बलात्कार एवं लज्जाभंग की शिकार महिलाओं और प्रत्यक्ष दर्शियों के बयान शामिल है। जिन महिलाओं के साथ बलात्कार एवं लज्जाभंग हुई थी उन्होंने जांचकर्ताओं से निवेदन किया कि लोकलाज के डर से वे अपना नाम सार्वजनिक नहीं करना चाहती हैं।

उनका यह भी कहना था कि उन्होंने घटना वाली रात के अपने वस्त्र वहीं कहीं फेंक दिए थे। उन्होंने इस मामले का ट्रायल भी सार्वजनिक तौर पर करने के बजाय कैमरे में करने का अनुरोध किया और अदालत भी यह उचित नहीं समझती कि उन बलात्कार की शिकार महिलाओं और गवाहों के नाम सार्वजनिक हों। बसों और गन्ने के खेतों में लूटीं महिलाओं की अस्मत उस रात पुलिस के बहसीपन पर सीबीआई द्वारा अपनी रिपोर्ट में दिए गए विवरण का एक छोटा सा अंश इस प्रकार हैः-

‘‘...इन बसों से यात्रा कर रहीं 17 आन्दोलनकारी महिलाओं ने आरोप लगाया कि उस रात पुलिसकर्मियों ने लाठी चार्ज करने के बाद उनसे छेड़छाड़ की और बड़ी संख्या में आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया। लाठीचार्ज के बाद रैली वाले इधर-उधर तितर वितर हो गए थे। कुछ महिलाओं ने बताया कि कुछ पुलिसकर्मियों ने बसों में चढ़ कर महिलाओं से छेड़छाड़ की। कुछ ने कहा कि उनके साथ पुलिसकर्मियों द्वारा बलात्कार किया गया। इनमें से 3 महिलाओं ने कहा कि उनके साथ बसों के अन्दर ही बलात्कार किया गया, जबकि 4 अन्य का आरोप था कि उन्हें बसों से खींच कर नजदीक गन्ने के खेतों में ले जाया गया और वहां बलात्कार किया गया। ये सारी वारदातें मध्य रात्रि 12 बजे से लेकर 2 अक्तूबर सुबह 3 बजे के बीच हुईं। 

विज्ञापन

जयंती पटनायक के नेतृत्व में राष्ट्रीय महिला आयोग की टीम ने भी इस जघन्य कांड की जांच की। - फोटो : Istock
महिलाओं ने पुलिसकर्मियों पर उनके हाथों की घड़ियां, गले की सोने की चेन और नकदी लूटने का आरोप भी लगाया। इस काण्ड और जांच के बीच काफी समय गुजर जाने के कारण बलात्कार और लज्जाभंग के आरोपों की पुष्टि में कोई मेडिको-लीगल साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए। सीबीआई से 37 चश्मदीद गवाहों ने महिलाओं से छेड़छाड़ की बात स्वीकार की।

कुछ पत्रकार, जो कि घटना के समय वहां मौजूद थे तथा निकटवर्ती एक होटल के मालिक ने बताया कि पुरुष पुलिसकर्मी आन्दोलनकारी तलाशी के नाम पर महिलाओं के शरीर टटोल रहे थे। रामपुर तिराहे के निकटवर्ती गावों के 70 चश्मदीद गवाहों ने बताया कि महिला आन्दोलनकारियों ने उन्हें पिछली रात उनके साथ हुई छेड़छाड़ और अशोभनीय पुलिस व्यवहार की जानकारी दी थी।...’’

राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा मुजफ्फरनगर काण्ड की जांच  

जयंती पटनायक के नेतृत्व में राष्ट्रीय महिला आयोग की टीम ने भी इस जघन्य कांड की जांच की। पुस्तक ‘‘उत्तराखण्ड का नवीन राजनीतिक इतिहास’’ में दिए गए विवरण के अनुसार इस टीम में अध्यक्ष के अलावा पद्मा सेठ, बोनोज सेनापति और श्रीमती इंदिरा मिश्रा शामिल थीं। इस टीम ने गोपेश्वर, श्रीनगर, टिहरी और देहरादून को 13 से 16 अक्तूबर 1994 तक दौरा किया और एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जिसमें 1 और 2 अक्तूबर 1994 की रात्रि को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा की उस भयानक रात के विवरण का एक छोटा सा अंश इस प्रकार हैः-

‘‘रामपुर तिराहे पर अंधेरे में खड़ी बसों के अन्दर धुप अंधेरे में महिलाएं सांस रोके बैठी थीं। महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से बसों के अंदर की लाइटें बंद कर दी गई थीं। इस सन्नाटे के बावजूद पुलिस द्वारा आंसू गैस छोड़ा गया। आतंकित महिलाएं खुली हवा में सांस के लिए बसों से बाहर निकलीं तो उन्हें गन्ने के खेतों की ओर खींच कर ले जाया गया जहां उनकी साड़ियां खींची गईं। एक महिला ने बताया कि पुलिस की लाठियों से बचने के लिए जैसे ही वह भागी तो उसका पैर एक साड़ी से उलझ गया। वहां पर कुछ कपड़े पड़े थे। 

स्पष्टतया ये कपड़े रैली में शामिल उन महिलाओं के थे जिन्हें निर्वस्त्र कर दिया गया होगा। उस महिला ने साड़ी से अपना पैर छुड़ाया और फिर वहां से भाग सकी। बदहवासी में वह एक नाले में गिर गई जहां उसके कपड़े कीचड़ में लतपथ हो गए। वह किसी तरह ऋषिकेश पहुंचने में कामयाब हो गई। वह बदहवासी में ही ऋषिकेश पहुंची थी इसलिए लोगों ने पूछा कि आखिर ऐसा क्या हो गया। उसकी दशा को देख कर ही पता चल रहा था कि कुछ अनहोनी हो चुकी है।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार घटनास्थल पर कुछ महिलाऐं केवल पेटीकोट में बदहवास भाग रही थीं। पुलिसकर्मी महिलाओं को मां बहन की गालियां दे रहे थे तथा लड़कियों को हरामी कह रहे थे। यही नहीं पुलिसकर्मी लड़कियों को बलात्कार की धमकियां भी दे रहे थे। 

आयोग के समक्ष दो महिलाओं ने अपने साथ बलात्कार होने की बात कही। उनमें से एक पीड़िता ने बताया कि 1 अक्तूबर की रात या 2 अक्तूबर तड़के एक आंसू गैस का गोला उनकी बस के अन्दर गिरा। गोला गिरते ही उसमें सवार अन्य लोग बस से बाहर भाग निकले मगर उस पर गोला सीधे गिरा था इसलिये वह अर्धचेतनावस्था में होने के कारण बस से बाहर नहीं निकल सकी। इतने में दो पुलिसकर्मी बस के अंदर घुसे और उन्होंने उसे निर्वस्त्र कर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया।

यह रैली की बसों की पंक्ति में आगे से दसवीं बस थी। बलात्कारियों के बहसीपन से पीड़िता बेहोश हो गई थी और जब उसे होश आया तो उसके सारे शरीर पर दातों के काटने के निशान थे और .... बस की फर्स पर पड़ा था। दूसरी दुष्कर्म पीड़िता ने बताया कि उसे पुलिसकर्मी खींच कर गन्ने के खेत में ले गए और उसके निजी अंगों पर उन्होंने रायफल की बटों से प्रहार किया। घायल करने के बाद उसके साथ भी दुष्कर्म किया गया।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें