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बस्तर: द नक्सल स्टोरी, 'और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा'

सार

विपुल शाह की ये फिल्म जो कुछ दिखाती है वो देखने के लिए शायद हिम्मत चाहिए और जिस तरह से दिखाती है वो भी देखने के लिए हिम्मत चाहिए।
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आईपीएस ऑफिसर नीरजा माधवन नक्सलवादियों को कैसे खत्म करती हैं, ये कहानी बड़े खौफनाक तरीके से पर्दे पर पेश की गई है। - फोटो : डॉक्टर आशीष कौल
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विस्तार
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‘बस्तर द नक्सल स्टोरी’, इस फिल्म शुरुआत के वक़्त चलने वाला डिस्क्लेमर कहता है कि 'फिल्म के कुछ दृश्य आपको विचलित कर सकते हैं 'कई फिल्म रिव्यु कहते हैं कि ये फिल्म परेशान करने वाली है। पर, मैं जब से फिल्म देखकर आया हूँ कहीं बस्तर के जंगलों में ही खोया हुआ हूँ। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कितने रूपए बटोरती है, वो एक अलग बात है, पर जो ख़ास बात है वो ये कि अब बॉलीवुड भी समझ रहा है कि 'और भी ग़म हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा'। मुझे इस कहानी में वो दिखा जो अब कुछ साल से धीरे धीरे दिखने लगा है।

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बॉलीवुड में जमीनी कहानी कहने का दम और साहस। इस फिल्म ने मुझे वो उम्मीद दी कि अब बॉलीवुड या हिंदी सिनेमा ज़मीनी सच्चाई से भरी कहानियां कहने को बिलकुल तैयार है। वो तैयार है कि जनता जाने कि पिछले कई दशक से जो खबरें उसने अखबारों में दो या तीन कॉलम के समाचारों में पढ़ीं या फिर टॉप 50 खबरों में जो सरपट निकल गयीं, उसकी पूरी कहानी क्या थी, पृष्ठभूमि क्या थी, वो कौन लोग थे जो कह नहीं पाए, वो कौन लोग थे जिनकी आवाज़ सालों साल हम तक पहुंची ही नहीं, या शायद पहुँचने ही नहीं दी गया।  

ऐसा नहीं है कि नक्सलवाद और नक्सलियों पर पहले फिल्म नहीं बनीं, पर उसमें वो सिर्फ कोई पात्र बनकर रह गए। माओवाद और नक्सलवाद पर समाचार चैनलों ने भी कुछ ख़ास न तो समझ बनायी, न खबर दिखाई। जब जब हमले हुए तो कितने मरे, किसने ज़िम्मेदारी ली से आगे समाचार चैनल न तो बढ़ पाए न बढ़ना चाहा जो ख बरें आयीं वो भी फर्ज निभाने के खांचे में ज़्यादा फिट होती दिखाई दी। सरकारों के साथ साथ खबरिया चैनल भी मौन ही तो रहे अक्सर। अब पिछले कुछ सालों से चाहे वो कश्मीर फाइल हो, केरला स्टोरीज हो , माझी हो , लापता लेडीज हो या फिर बस्तर द नक्सल स्टोरी, ये सिर्फ कह नहीं रहे, सवाल भी कर रहे हैं। 
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विपुल शाह की ये फिल्म जो कुछ दिखाती है वो देखने के लिए शायद हिम्मत चाहिए और जिस तरह से दिखाती है वो भी देखने के लिए हिम्मत चाहिए। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे नक्सलियों ने वहां अपनी एक अलग सत्ता बना ली है. कैसे उन्होंने वहां के लोगों की जिंदगी तहस नहस कर दी है।

आईपीएस ऑफिसर नीरजा माधवन (Adah Sharma) नक्सलवादियों को कैसे खत्म करती हैं, कैसे वो देश के सिस्टम से लड़ती हैं और ये कहानी बड़े खौफनाक तरीके से पर्दे पर पेश की गई है। अब जब बॉक्स ऑफिस पर एक के बाद एक ऐसी फिल्में आने लगी हैं तो इन्हें एजेंडा और प्रोपेगैंडा भी कहा जाता है। फिल्म के निर्देशक सुदीप्तो सेन ने आतंक की नक्सली क्रूरता और तंत्र की विवशता के बीच पिस्ते आदिवासियों की कहानी को कहने में यकीनन तगड़ी रिसर्च की होगी ऐसा जान पड़ता है।

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देश के अमृतकाल में ये एक सुखद संकेत है कि पगडण्डी के अंतिम छोर पर खड़े हिन्दुस्तानी की कहानी भी अब जगह बनाने लगी है।   - फोटो : डॉक्टर आशीष कौल
मैं बस्तर: द नक्सल स्टोरी को किसी सियासी चश्मे की बजाये उस सृजनात्मक लेंस से देखना पसंद करूँगा जहां आखिर सुदूर झारखंड, छत्तीसगढ़, केरला के गाओं मोहल्लों के नाम, उनकी समस्याएं, उनकी खुशियां मुंबई-दिल्ली होती हुई समस्त विश्व में पहुँच रही हैं। निर्माता अब सिर्फ रिस्क नहीं ले रहा, वो ऐसी कार्ययोजना भी गढ़ रहा है कि जिस से कम से कम इन मुद्दों पर बातचीत नए सिरे से शुरू हो।  
 
'हम कलाकारों को भी अब इस तरह की कहानियां जोशपूर्ण प्रोत्साहन दे रही हैं, क्यूंकि हमें भी लगता है कि सिर्फ पात्र नया नहीं है, उस पात्र के ज़रिये हम उस पात्र और कहानी को दुनिया तक सही ढंग से ले जाने की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं। 'कहते हुए कंपनी। बुद्धा इन ट्रैफिक जैम , पेज 3 , एक हसीना थी जैसी फिल्मों मके बाद 'बस्तर द नक्सल स्टोरी में आई जी के सचिव 'श्रीवास्तवजी ' का बेहतरीन किरदार निभाने वाले गोपाल के सिंह बड़े दिलचस्प ढंग से कहानी, कलाकार  और चुनौतियों की बात कह जाते हैं।

ये चुनौतियां अब अक्सर कलाकारों को झेलनी होंगी क्यूंकि जनता भी इन ज़मीनी कहानियों में खुद को पहचानने लगी है , फिर चाहे वो बॉलीवुड में बनी'१२वी फेल हो' या OTTपर पंचायत जैसा मीठा कटाक्ष। अब कलाकार भी वो ही चलेगा जो इन जमीनी कहानियों को अपना सा लगेगा। अब वो बात पुरानी हुई कि जो बिक जाये वो हिट। जनता ने अपनी पसंद न पसंद बताकर जता दिया है कि और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा। देश के अमृतकाल में ये एक सुखद संकेत है कि पगडण्डी के अंतिम छोर पर खड़े हिन्दुस्तानी की कहानी भी अब जगह बनाने लगी है।  

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नोट : लेखक डॉक्टर आशीष कौल, वरिष्ठ मीडिया कर्मी होने के साथ साथ शोध कर्मी हैं जिन्होंने सिनेमा और समाज के अन्तर्सम्बन्धों से जुड़े आयामों पर शोध परख काम किये हैं। आशीष कश्मीर से जुडी चार बेस्टसेलर किताबों के लेखक भी हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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