भारत को कभी गांवों का देश कहा जाता था। देश की 80 प्रतिशत आबादी गांवों में निवास करती थी। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह भी कहा करते थे कि देश की तरक्की का रास्ता गांवोंं के खेतो और खलिहानो से होकर गुजरता है।
मगर धीरे-धीरे समय ने करवट बदली। पिछले कुछ सालों से देश में शहरीकरण की रफ्तार तेज हुई है। लोग गांवो से निकलकर शहरों की तरफ पलायन करने लगे। देखते ही देखते शहरों की आबादी बेहताशा ढंग से बढ़ने लगी।
जीविकोपार्जन के चक्कर में लोग गांव छोड़कर शहरों में आकर रहने लगे। जहां ना तो उनके लिए ढंग से रहने की जगह थी ना ही सही ढंग का कोई रोजगार था। मगर शहरों की चकाचौंध से प्रभावित होकर गांव का युवा वर्ग तेजी से शहरों की ओर रुख करने लगा।
गांव से लोगों के शहरों की तरफ पलायन से गांवो में रहने वाले लोगों का भी खेती में रुझान कम होने लगा। गांव की युवा पीढ़ी भी खेती से विमुख होकर शहरों की ओर दौड़ने लगी। मगर अचानक ही आए कोरोना संकट ने शहरों की ओर बेहताश दौड़ रहे लोगों को एक बार फिर से गांवों में आने को मजबूर कर दिया।
गांव से शहरों में रोजगार के लिए गए सभी लोग इस वक्त यही प्रयास कर रहें है कि कैसे भी करके अपने गांव में अपने घर पहुंचा जाए। साधन नहीं मिलने से लाखों लोग सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित अपने घरों को पैदल ही निकल पड़े हैं।
शहरों में रह रहे लोगों को यकायक ही वर्षों पूर्व छोड़ा अपने गांव और घर याद आने लगे हैं। आज देश में शहरों से गांव की ओर तेजी से उल्टा पलायन हो रहा है। जो हमें इस बात का एहसास कराता है कि हमने गांव को छोड़कर शहरों की तरफ जाने कि जो प्रवृत्ति बनाई थी वह सही नहीं थी।
हालांकि लोगों को मजबूरी में गांव छोड़कर शहरों में रोजगार के लिए जाना पड़ा था। लगातार पड़ रहे अकाल, अतिवृष्टि के कारण खेती में गुजर-बसर करने लायक आमदनी नहीं हो पा रही थी। वही गांव के आसपास रोजगार के कोई कल कारखाने या अन्य साधन भी नहीं थे। जहां काम कर लोग अपना पेट भर सके। इसलिए लोगों को मजबूरी में दूसरे प्रदेशों में जाकर काम करना पड़ रहा था।
कोरोना संकट के चलते लाखों लोगों का अपने मूल गांव की तरफ लौटने का सिलसिला अनवरत् जारी है। सरकार द्वारा भी दूसरे प्रदेशों में काम कर रहे प्रवासी श्रमिकों को उनके घरों तक छोड़ने के लिए श्रमिक विशेष रेलगाड़ियां चलाई जा रही है। जिनके माध्यम से बड़ी संख्या में लोग अपने घरों तक पहुंच पा रहे हैं।