क्या हम नकारात्मक, निराशावादी हैं। क्या हमारा स्वयं पर से विश्वास उठ गया है? मेरे कॉलेज में पिछले साल एक quiz हुआ था। 40 प्रश्न में से तकरीबन दस से पंद्रह प्रश्न ऐसे थे जिनमें भारत विश्व में प्रथम स्थान रखता था, वह फाइल अगर मिली तो उसे साझा करुंंगी। बच्चे तो बच्चे हमें भी नहीं पता था कि भारत इतना सशक्त है।
चूंकि कार्यक्रम की आयोजक मैं थी तो मुझे उन प्रश्नों के उत्तर पता थे, जैसा कि स्वाभाविक था बच्चों ने उन सब प्रश्नों में अन्य विकल्प फ्रांस, अमेरिका, जर्मनी, जापान को चुना और अंक गवाएं, जब उन्हें पता चला कि भारत इसमें शीर्ष पर है तो उनके मुंह खुले के खुले रह गए, मैंने कार्यक्रम के अंत में कहा कि सारी दुनिया की जानकारी रखने वाले हम, हमारे देश के बारे में कितना कम जानते हैं। हमें विश्वास ही नहीं होता कि भारत इतना कुछ कर सकता है।
बच्चों ने एक स्वर में कहा मैडम हमें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि भारत में इतना कुछ है, मैंने उन्हें बताया, बच्चे थे समझ गए कि भारत में बहुत ऊर्जा है, लेकिन बड़े बुद्धिजीवी भारत को किसी काबिल नहीं समझते, यह आत्म दैन्य, यह हीनता ग्रंथि है या ज़िद कि हम सारी दुनिया को मान देंगें, अपने देश को नहीं।
बेशक घर की दरारों की चिंता हो, भूख गरीबी को हटाने के प्रयास हों लेकिन उस भयावह दृश्य के अतिरिक्त बहुत कुछ ऐसा भी है जो सौंदर्य से भरा है, जो गर्व करने लायक है। हम उसे देखना छोड़ चुके हैं, तो क्या हमारी दृष्टि का दोष नहीं है यह।
यह दोष पिछले कुछ सालों में और बढ़ा जब एक व्यक्ति के विरोध की सनक ने देश को छोटा कर दिया। व्यक्ति का विरोध देश का विरोध कब बन गया पता ही नहीं चला, हम उसके विरोध में ऐसे अंधे हुए कि अपनी संभावनाओं पर ग्रहण लगा दिया, हमारा चिंतन एक दिशा में बहने लगा, विरोध हमारी रचनात्मकता पर भारी पड़ने लगा।
हम अधीर हुए प्रतिक्रिया देने में, तेरा विरोध मेरे विरोध से ज्यादा तीखा हो इसकी प्रतियोगिता प्रारंभ हुई, भाषा की मर्यादा, एक दूसरे का लिहाज़, शालीनता सभ्यता सब निर्वासित हो गई, हमारी नफ़रत की बाढ़ ने एक विक्षिप्त परिदृश्य रचा, और जानते हैं हासिल क्या हुआ जिसकी नफ़रत का बोझ लिए आप घूम रहे हैं उसे कोई फर्क नहीं पड़ा, पड़ना भी नहीं चाहिए, लेकिन हां इस नफ़रत ने कहीं आपको मनोरोगी तो नहीं बना दिया। कहीं सारी दुनिया आपको अपनी विरोधी और शत्रु तो नज़र नहीं आने लगी, कहीं आप अपना संतुलन तो नहीं खो बैठे, संभालिए, संभालिए नफ़रत वह विष है जो करने वाले को ही लील जाता है।
कहीं आपका विरोध शेर आया, शेर आया जैसा तो नहीं कि किसी दिन आप सचमुच किसी गंभीर मुद्दे को उठाएं और लोग आपकी बात पर विश्वास ही न कर पाएं। आपकी बात की विश्वसनीयता क्या हो, कितनी हो यह आपको तय करना है।